Posts tagged ‘Insaaf’

अक्टूबर 5, 2011

झुकी मूँछ

मुझमें पत्थर पड़े हैं क्या
लोग हीरे के बने हैं क्या

अँधे, बहरे और बस चुप
ये हादसों के बचे हैं क्या

फुटपाथ पर बड़ी है भीड़
कहीं झोपड़े जले हैं क्या

आपको भाती है जिंदगी
हवा महल में बसे हैं क्या

नमक क्यों लाए हो यार
घाव अब भी हरे हैं क्या

जिंदगी-मौत, धुंआ–खुशबु
ये किसी के सगे हैं क्या

माहौल काला सा क्यों है
बस्ती में पेड़ कटे हैं क्या

हाथों के पत्थर किसलिए
शहर में शीशे बचे हैं क्या

भला लगने की बात जुदा
लोग सच में भले हैं क्या

इन्साफ का पता पूछते हैं
आप शहर में नए हैं क्या

मूँछ झुकी कैसे है आलम
बेटी  के बाप बने हैं क्या

(रफत आलम)

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सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

मार्च 1, 2011

अंजान खिलाड़ी का तमाशा

अमीरों के घरों में दावतें दिन चार हो  रही हैं
मालिक तू भी खूब बंदों का इम्तिहान लेता है
ऐसे मंज़रों पर तेरा इंसाफ जागता क्यों नहीं
दूध का न होना गरीब बच्चे की जान लेता है
……..

तेरा इन्साफ जाने कहाँ सो रहा है और
देख रहा हूँ हज़ार बन्दों का खुदा होना
किसी को शराब किसी को पानी भी नहीं
अर्थहीन है मालिक तेरा होना ना होना
…….

जजमान के घरों चाहे दाल आटा न हो
मुर्गा–मोदक मुल्ला–पंडे को मिलता है
बिना कर्म के फल की चाह रखने वालो
बिना हवा के कहीं पत्ता भी हिलता है
…….

सभी मुसाफिरों के मन में मंजिल की धुन है
जबके जिंदगी एक अबूझ रास्ते का कारवाँ है
सफर के पड़ावों में उलझ जाने वाली दुनिया
क्या तुझको पता नहीं आखिरी मंजिल कहाँ है
………

सांसों के दम पर चलता हुआ जिंदगी का खेल
माटी के मोहरों से सजी रंगशाला है ये दुनिया
बिसात से उठते देखे प्यादा हो के कोई फरजी
अंजान एक खिलाड़ी का तमाशा है ये दुनिया

(रफत आलम)

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