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जनवरी 14, 2014

दोपहर, साथ, नींद और पलायन

इस तरह तो न थे, हम-तुम! avishkar-001

दुश्वारियां जिंदगी की तो पता थीं

कल भी|

ये फिरकते वृत्त है रौशनी के

किनारियाँ अंधेरों की तो पता थीं

कल भी|

बुद्धू बुद्ध की नींद भी गहरी

लाचारियाँ असमंजसों की तो पता थीं

कल भी|

सयानेपन की तुम्हारे भी सीमाएं हैं

पारियां बचपने की मेरी तो पता थीं

कल भी|

निर्वात तोडता है देह का चुम्बक

सीढियां लम्बी समाधानों की तो पता थीं

कल भी|

रिश्ते हैं कई मेरे और तुम्हारे तईं

गारियाँ सर्द अबोलों की तो पता थीं

कल भी|

कई तो हैं संजोग, ऐसे-वैसे

कलाकारियाँ कायनात की तो पता थीं

कल भी|

सिर्फ बोलों के आईने में रिश्तों का सच

दीवारियाँ रंग-ऐ-नस्ल की तो पता थीं

कल भी|

अपने-अपने सुखों में चटख आए दुख

बीमारियाँ सुखों -दुखों की तो पता थीं

कल भी|

प्यार भरे वो तरंगित, शर्मीले स्पंदन

यारियाँ दिल से दिल की तो पता थीं

कल भी|

Yugalsign1

नवम्बर 28, 2013

कह तो दूँ …शब्द कहाँ हैं

love story-001दे तो दूँ

अभिव्यक्ति

उन  अहसासों को

प्रथम छुअन के

स्पंदन को

इंतज़ार की

धडकनों को

उष्ण देह की

तपन को

होठों की

लरजन को

ठन्डे बदन की

कम्पन को

पर तुम ही कहो

शब्द कहाँ  से लाऊं?

Rajnish sign

नवम्बर 13, 2013

चांदनी शर्मा के ओट में छिप गई

moonlovers-001रोज यही एक सपना देखता हूँ मैं

जागी अधखुली आँखों से…

श्वेत  चाँदनी  में लिपटी तुम चल रही हो

साथ साथ मेरे…..

मैं थाम लेता हूँ हाथ तुम्हारा हौले से…

महसूस कर सकता हूँ तुम्हारी सिहरन को

सहलाता हूँ तुम्हारी उँगलियों को,

छूता हूँ  पोरों को…

दूर कहीं दूर…निर्जन में

बैठ जाते हैं हम तीनो…

तुम, मैं और तुम्हारे बदन से लिपटी चाँदनी…

बैठे रहते हैं चुपचाप पास-पास

एक दूसरे के सर से सर जोड़े

कभी चेहरा लिए हाथों में

एक दूसरे की आँखों में खोये

सुनते हैं साँसों की मौन भाषा को…

बस खोये से रहते हैं एक दूसरे में

मैं सहलाता रहता हूँ तुम्हारी अनावृत बाहें

और  महसूस करता रहता हूँ तुम में

उठते स्पंदन को

तुम कुछ और  सिमट आती हो नज़दीक मेरे

हमारे बीच की चाँदनी असहज होने लगती है

रहती है पर निशब्द…

कानों की लौ गर्म होने लगी है

किसी तीसरे से बेखबर हम बस एक दूजे में गुम…

साँसों की लय पे उठते गिरते सीने को आँखों में समेटते

एक दूसरे की नज़रों को नज़रों से चूमते

होंठ कांपते हैं मेरे

तुम्हारे भी…

थरथरा रहे हैं दोनों के बदन…

जैसे दे रहे हों  मौन आमंत्रण…

साँसे असंयमित होने लगती है…

और बहुत उष्ण भी

पिघलने लगती है चाँदनी हम दोनों के बीच की

दूर उतर कर खड़ी  हो जाती है तुम्हारे बदन से

रख देता हूँ कांपते होंठ तुम्हारे जलते होंठो पे

चाँदनी शर्मा के किसी ओट में छुप जाती है

तीन से दो होने के लिए

या फिर दो से एक होने के लिए…

रात की चादर के तले…

बस यही एक ख्वाब मैं हर वक़्त देखता रहता हूँ

जागी अधखुली आँखों से

(रजनीश)

नवम्बर 5, 2013

उफ़! कभी यूँ भी तो हो

mausam1-001उफ ये जागती आँखों के सपने!

आँखों में चुभते हैं किरच किरच…

अभी देखा एक ख्वाब मैंने खुली आँखों से

देखो तो ज़रा कितना गहरा जा धंसा है…

तुम्हारा दौड़ते हुए आना मुझ तक

उलझे हुए श्यामल रेशम बाल

एक लय में उठता गिरता सीना

माथे पर चुहचुहाती बूंदे पसीने की

आरक्त गालों पर शर्म से जन्मी लाली की छटा

एक दूसरे से लडती उलझती साँसे

नशे से झुकती हुयी सी आँखे

तुम्हारा आके लिपट जाना मुझसे

फिर शर्मा के कुछ और सिमट जाना मुझमे

मेरा तुम्हे कुछ चिढाना और

तुम्हारा मुक्का बनाके डराना मुझको

देखो उस मुक्के का निशान

चस्पा है अब तक यहाँ मेरे सीने पे…

उफ़ तुम्हारा मौन निमंत्रण!

पढ़ सके जिसे मेरे लरजते होंठ…

वो जुड़ना अधरों का

वो फिसलना बाहों का

वो पोर पोर चुम्बन

वो सीने का स्पंदन

वो दो दिलों का मिल के धडकना

वो मेरा नशा नशा बहकना

न तुम्हारा कुछ सुनना

न अपना कुछ कहना

गर्म होना साँसों का

और कसना बांहों का

देखो तुम्हारे निशान

यहाँ मेरे सीने पे…

सपना जो उतरा खुली आँखों में

आओ पढ़ लो उसके गहरे धंसने के निशान

यहाँ मेरे सीने पे…

अभी भी फिर रही हैं तुम्हारी

बाहें जैसे मेरे बदन पे हर ओर

पोर पोर हैं स्पंदित अभी भी

सपना किरच किरच होने पे भी…

कभी यूँ भी तो हो कि दिल चाहे और तुम आ जाओ

पीछे से आके मेरी आँखों  को अपने हाथों से ढक

मुझे आनंद की यात्रा पर भेज दो मुझको…

स्पर्श तुम्हारे हाथों का कभी ख्वाब से निकल कर

हकीकत तो बने…

खुशबू तुम्हारे सीने की

एक बार तो आ बसे साँसों में…

कभी यूँ भी तो हो…

और कभी ऐसा भी हो

छुअन कांपते हाथों की सिमट जाए मुझमे

लरजते, थरथराते होंठों की तपन

रह जाये मेरे साथ तेरे बाद भी

मैं पा जाऊं वो सब जो अभी अभी खवाब में

तुमने दिया है मुझे…

कभी हो ऐसा भी…

(रजनीश)

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