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नवम्बर 13, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1) से आगे…

देखिये कामना जी आप इसे मेरे द्वारा आपका मजाक उड़ाने की चेष्टा के रुप में न लें अतः यहाँ सीधे-सीधे रुप में जोड़ना चाहता हूँ यौन- शिक्षा के मुद्दे को, जो कि सम-सामायिक मसला है और आपकी कहानियों की नायिकाओं के शारीरिक सम्बंधों को लेकर दृष्टिकोण से सीधे-सीधे सम्बंध रखता है।

अनिल जी, यौन शिक्षा एक अलग मामला है। उन्होने आँखें तरेर कर गुस्से से कहा।

पर फिर भी किशोर लड़कियाँ तो शिक्षा लेंगी ही आपकी कहानियों से कि खूब शारीरिक सम्बंध बनाओ, कुछ नहीं होता, सब वैसे ही डराते हैं। और यौन शिक्षा अलग मुद्दा नहीं है। आपने खुद ही अपने एक लेख में एक सर्वे को कोट करते हुये लिखा है कि कैसे गरबा खेलने के महीने के बाद कुछ प्रांतों में गर्भपात करवाने के मामलों में बढोत्तरी हो जाती रही है और इस बरस उन प्रांतों में गरबा के महीने में गर्भ निरोधक सामग्रियों की बिक्री में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गयी है। तो एक तरफ तो इतनी जागरुकता आ रही है और आप जाने क्या कहना चाहती हैं अपनी कहानियों के माध्यम से।

लेखिका ने कुछ हथियार डालते हुये कहा,” आपके कुछ तर्कों से मैं सहमत हूँ पर मौटे तौर पर अभी भी कहूँगी कि कहानी के चरित्र समाज से ही लिये जाते हैं और अगर ये चरित्र समाज को गलत रुप में प्रभावित करते तो अज्ञेय, जैनेंद्र, यशपाल, मण्टो, और मृदुला गर्ग आदि इतने प्रसिद्ध लेखक न बनते। इन लेखकों ने भी स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधों को खुलकर अपनी कहानियों और उपन्यासों का हिस्सा बनाया है। और भी बहुत सारे लेखक एवम लेखिकायें हैं जिन्होने ऐसा किया है।

कामना जी, जैनेंद्र जी का साफ साफ आग्रह अपनी नायिकाओं को घर से बाहर के क्षेत्रों में पुरुषों के समकक्ष स्थापित करने का था। वे ऐसी महिलायें स्थापित करना चाहते थे जो अपने फैसले खुद ले सकें और पुरुषों की ही भाँति समाज निर्माण में भागीदारी कर सकें। अज्ञेय, नदी के द्वीप में अगर रेखा को विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंधों में सलंग्न होते हुये दिखाते हैं तो वे उसे पहले गर्भवती होने और बाद में गर्भपात की यातनामयी वेदना से गुजरते हुये भी दिखाते हैं। वे बहुत जागरुक और जिम्मेदार लेखक के रुप में सामने आते हैं। और आप ऐसा एक भी उदाहरण दे दें जहाँ आपने पाया हो कि कोई पुरुष मण्टो की खोल दो या ठण्डा गोश्त जैसी कहानियाँ पढ़कर कामुकता के भाव से जाग्रत हो गया हो।

लेखिका इस विश्लेषण पर कुछ और गुस्से से भर गयीं| उन्हें आभास हो गया कि उनके लेखन की तुलना इन्ही लेखकों के लेखन से आने ही वाली है| वे चुप रहीं|

कामना जी,  दर्पण झूठ नहीं बोला करता| आप कहती हैं कि कहानियां और चरित्र समाज से ही लिए जाते हैं और कहानियां समाज को दर्पण दिखाती हैं| कहानियां समाज को दर्पण तब दिखाती हैं जब वे एक जिम्मेदार भूमिका निभाएं| क्षमा कीजियेगा आपकी ज्यादातर कहानियां आजकल के सनसनी फैलाने के तौर तरीकों का अनुसरण करती ज्यादा दिखाई देती हैं| आप अपनी किसी भी एक कहानी का उदाहरण दे दें जहां आपकी कहानी की नायिका या नारी चरित्र ने विवाह पूर्व और विवाह से बाहर जाकर पुरुष से शारीरिक संबंध बनाए हों और आपने उस चरित्र को ऐसी संभावना के आसपास से भी गुजारा हो जहां इस तरह के संबंधों से उत्पन्न दुष्परिणामों से उनका पाला पड़ता हो| आपने तो ऐसे संबंधों के इर्दगिर्द आनंद का ऐसा मिथ्या वातावरण रचा है जैसा कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोर पाठकों के लिए झूठे रोमांटिक किस्से कहानी और उपन्यास रचते रहे हैं|

लेखिका का चेहरा क्रोध से अजीब से भूरेपन से रंग गया था| वे कुछ कहना चाहती थीं पर शायद उन्हें शब्द नहेने मिल पा रहे थे या वे अपने गुस्से के कारण नहीं बोल पा रही थीं| उनके हाव भाव ऐसे हो चले थे मानो आँखों से ही भस्म कर देंगी|

उनकी एक शिष्या उनके बचाव में मैदान में कूदी और तीखे तेवर के साथ बोली|

कहानी समाज के घटनाक्रमों से उठायी जाती हैं और लेख इनके व्यक्तिगत विचार को प्रकट करते हैं| अतः आपके द्वारा इनकी आलोचना गलत है|

महोदया पहले तो आप एक सुधार कर लें मैं इनकी आलोचना कर रहा हूँ| में कुछ प्रश्न उठाना चाहता हूँ जैसा कि मैंने शुरू में भी निवेदन किया था कि कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर महिला रचनाकारों को खोजने चाहियें| आज सुबह ही कार्क्रम में मंच से तो कामना जी भी औरों के लिखे हुए पर पचास किस्म के प्रश्न उठा रही थीं|

शिष्या के तेवर कुछ कमजोर पड़े और वह पहले से धीमे स्वर में बोली|

लेखक का दायित्व समाज सुधार का तो होता नहीं|

महोदया, हो सकता है आपकी बात सही हो पर मुझे लगता है कि यह बात तभी तक सच है जब तक कि लेखक कल्पित संसार में विचरण कर रहा है और इसी संसार में कविता,कहानी और उपन्यासों के रचनाशील कर्म में सलंग्न है पर अगर वही लेखक लेखों के द्वारा नैतिक-अनैतिक के सवाल पर समाज में चीख पुकार मचा रहा है और अपने को नैतिकता का ठेकेदार के रूप में प्रचारित कर रहा है तो समाज को भी देखना होगा कि ऐसा रचनाकार असल में रच क्या रहा है और समाज एं अपने लेखन से क्या फैला रहा है| अभी तो हो क्या रहा है कि नशा बेचने वाले खुद ही ढोल पीट रहे हैं कि  लोग नशे के आदि हो रहे हैं| अरे इतना ख्याल है समाज का तो नशा बेचना और बनाना बंद करो पहले|

शिष्या ने अपनी गुरु के तमतमाते चेहरे को देखा और नये शब्दों से आक्रमण करना चाहा, पर तर्क के अभाव में कम शब्दों के साथ शिकायती बन गयी|

यह तो लेखक की व्यक्तिगत आलोचना हो गयी|

…जारी

…[राकेश]

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नवम्बर 10, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1)

विरोध की हल्की सी झलक पाते ही लेखिका कम सम्पादक कम विभागाध्यक्ष महोदया – प्रोफ़ेसर कामना बिफर उठीं। चेहरा आवेश में लाल हो गया। मेज पर रखे मोबाइल को उठाकर उसमें कुछ देखा और फिर उसे वापस मेज पर रखते हुये बोलीं,” देखिये अनिल जी, कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी समाज को दर्पण दिखाती है और लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों को प्रकट करते हैं।”

कुछ हद तक आपका कहना ठीक है कामना जी परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आप सोचकर बतायें कि क्या कहानी के पात्र स्वतंत्र होते हैं? कौन उन्हे विचार देता है? क्या वे अपनी मनचाही दिशा में भ्रमण करने के लिये स्वतंत्र होते हैं? या लेखक उन पर उनकी प्रत्येक किस्म की गति, चाहे वह किसी भी दिशा में क्यों न हो, पर अपना पूरा नियंत्रण रखता है?

लेखिका कुर्सी पर बैठे बैठे बिलबिलाने लगीं, उनका क्रोध और बढ़ गया। ऊँचे स्वर में कहने लगीं।

लेखक समाज में से ही तो चरित्रों को लेता है, वह उन्हे संवाद और मनोस्थिति देता है पर वह उन्हे ऐसी दिशा में ही नियंत्रित करता है जिससे समाज को कुछ बातें कह सके।

कामना जी, अगर कहानी समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने का ही नाम है फिर तो यह काम एक साधारण पत्रकार बहुत सस्ते में कर देता है और अपने लिखे पर उसे ऐसा बहुत ज्यादा गर्व भी नहीं होता जैसा कि अपनी एक भी कहानी कहीं छपने वाला लेखक दर्शाने लगता है। पत्रकार के व्यवहार में तो यह चाह भी नहीं दिखायी देती कि उसे चिंता है कितने लोग उसके लिखे को पढ़ेंगे और इस पर उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं।

अनिल जी, मैं आप से फिर से कह रही हूँ कि कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी में जहाँ लेखक का कोई सामाजिक दायित्व नहीं होता वहीं लेख में वह अपने नितांत व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत कर सकता है।

तो फिर कामना जी, डबल स्टैंडर्ड वाली बात कहाँ तक झूठ है? एक तरफ तो आपकी कहानियों के चरित्र खासकर महिला चरित्र विवाहपूर्व और विवाहेत्तर सभी प्रकार के शारीरिक संबंधों में सलंग्न रहते हैं और दूसरी ओर आपके लेख हद दर्जे की चिंता में घुले जाते हैं कि लड़कियों को इन सब तरह के शारीरिक सम्बंधों से दूर रहना चाहिये। आपकी लगभग हर कहानी की नायिका विवाह से पूर्व और विवाह के बाद वैवाहिक जीवन से बाहर शारीरिक सम्बंध बनाने में सलंग्न दिखायी देती है पर वास्तविक जीवन की तरह वह कभी भी गर्भवती नहीं होती। ऐसा क्यों? अब यह मानने का तो कोई कारण है नहीं कि आपकी कहानियों में एकदम से स्थापित इन शारीरिक सम्बंधों की मुठभेड़ों से निबटने के लिये आपके नायक या नायिका अपने साथ गर्भ निरोधक साधन साथ लेकर घूमते होंगे? आपकी कहानियाँ ऐसा तो कोई संकेत नहीं देतीं। क्या किशोर पाठक आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसी प्रेरणा नहीं लेगें कि ठीक बात है कि विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंध हानिकारक नहीं हैं लड़कियों के लिये।

अनिल जी, मेरी नायिकायें पच्चीस की वय को पार कर चुकी वयस्क नारियाँ हैं जो अपना भला बुरा बखूबी समझती हैं।

कामना जी सच पूछें और मुझे सच बोलने की अनुमति दें तो मेरी इच्छा हो रही है कि मैं इस बात का जवाब कुछ यूँ दूँ कि एकदम से हुये इन सैक्स एनकाऊंटर्स में नारी पात्रों की परिपक्वता गर्भ निरोधक का कार्य तो करेगी नहीं। शुक्राणु और अंडाणु को क्या मतलब नर-नारी की मानसिक परिपक्वता से? वे तो मिलन का मौका छोड़ने से रहे और देखा तो ऐसा गया है कि अगर युगल अविवाहित हैं तो इनके मिलन कुछ जल्दी ही हो जाते हैं।

अनिल ने लेखिका की ओर देखा तो वे गुस्से से उसकी ओर ही देख रही थीं और उनके इर्द गिर्द बैठी और खड़ी उनकी शिष्यायें भी गुस्से से भरी साँसें और क्रुद्ध दृष्टिपात उसकी ओर फेंक रही थीं।

उन्हे हल्के मूड में लाने के लिये अनिल ने मुस्कुराते हुये कहा।

आपने देखा ही होगा प्रकाश झा की राजनीति में कि भारत में स्त्री-पुरुष की फर्टीलिटी पॉवर कितनी ज्यादा है! इस फिल्म की तीन स्त्रियाँ एक ही बार के संसर्ग में गर्भवती हो गयीं और विवाह पूर्व बनाये ऐसे संबध ने कितना बड़ा हत्याकांड करवा दिया। प्राचीन काल से ही महाभारत आदि भी इस बात की गवाही देते रहे हैं।

अनिल के इस उदाहरण से न चाहते हुये भी लेखिका और उनकी शिष्य मंडली के मुख मंडलों पर तिर्यक रेखायें खिंच गयीं पर वे ढ़ील देना नहीं चाहती थीं सो गम्भीर मुद्रा ही बनाये रहीं।

…जारी

…[राकेश]

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

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