Posts tagged ‘Mohabbat’

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

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