Posts tagged ‘Din’

दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

नवम्बर 25, 2013

मेरे सपनो की ताबीर

एक ख़याल पे मुहर धर दीwoman-001

कल रात ने,

मेरी सुबह ओ’ शाम-

बस जैसे तुम्हारा जगना, सोना

तुम्हारी सुबह-

मेरी तमन्नाओं का जगना

तुम्हारी रात-

मेरे ख्वाबों को पर लगना

लेकिन कल

स्याही गहरी हुयी

एक और हकीकत की भी –

न तुम थीं,

न तुम हो,

न तुम होगी,

मेरे लिए

मेरी,

मेरे सपनो की ताबीर कभी…

अक्सर मैं तुम्हारी

बेजारी पढता हूँ…

तुम ढँक नहीं पाती

झल्लाहट,

खिजलाहट…

तुम न चाहो तो भी

लफ्ज़

कोई न कोई

कर ही जाता है

इन्हें बयाँ…

Rajnish sign

नवम्बर 24, 2013

प्रथम प्रेम-मिलन

तब क्या होगाsilentlove-001

जब मुखातिब होंगे

हम तुम,

होंठो पे जमी बर्फ को

कैसे पार करेंगे लफ्ज़ तब?

बहुत समय से लफ्ज़ जमे हैं लब पे

तपते हुए लबों से अपने पिघला सको तो

पी सकोगे इन्हें

पर देह के कम्पन अनुनाद में

पुल टूट नहीं जायेंगे क्या?

थरथराते लब

क्या इतनी ही आसानी से

कह सकेंगे तब –

मुझे तुमसे प्यार है…

होगी दरकार आवाज़ की मौन को

या कि

मौन खुद ही आवाज़ बनेगा?

अगर सुनोगी मेरे सीने पे अपना सर  रखकर

तुम अपना नाम

मेरी आती जाती साँसों में

ये तो झंझावत में न

बदल जायेंगी क्या?

तुम्हारी मादक  देह गंध

रहने देगी ज़मीन पैरों तले क्या?

गिरने से कैसे बचाएंगी बाहें तुम्हारी?

क्या होगी उतनी ही तेज़ तुम्हारी सांसें भी?

उठाना गिरना वक्ष का कैसे सिमट पायेगा आँखों में?

हाथ में रखा हाथ कापेंगें नहीं क्या?

शिकायत

इनकार

इज़हार

मनुहार

रूठना

मनाना

लाज शर्म

मिलन विरह

पास दूर

सारे ये शब्द खो नहीं  जायेंगे क्या

आवेशित हृदयों के स्पंदन में?

प्रथम प्रेम मिलन में होगा क्या?

इसी सब में

घिरा बैठा रहता हूँ

दिन रात आजकल…

Rajnish sign

नवम्बर 21, 2013

आदत में पिन्हा तुम…मजबूर अपनी से हम

रात की कालिख बहुत घनी थीtum-001

बहुत लड़ा

तेरी यादों का रौशन दिया

आँख में रात भर धंसती रहीं

सपनो की किरचें

हर पल करवटों का

रात सलवटों की गूंगी गवाह

बहुत रोये

बहुत माँगा

मगर…

रात

एक कतरा भी नींद का

तुमने लेने न दिया…

दिन को बुनता हूँ जो भी ,

हर रात उसका  भरम तोड़ती रहो तुम

अपनी आदत में पिन्हा रहो तुम

मजबूर अपनी से रहेंगे हम!

(रजनीश)

नवम्बर 16, 2013

चिराग जिस्मों के

होता  है अहसास बहुत अलग सा  dreamwo-001

जब

आँखे खोलते हैं

सपने मेरे

तुम्हारी बाहों में…

अजब सी इक सिहरन

जैसे

छू  गयी हो लपक के बिजली आसमान की

दिल दिमाग सुन्न बस…

  वश में तुम्हारे सब|

एक ही ख्वाहिश रह जाती है

बस कि

चैन पाएं

मुंह छुपा कर

तुम्हारे सीने में…

सपने मेरे हद बेचैन

जागा करते हैं रात भर

आओ कि

इन्हें चैन से  नींद तो आये

रौशन रहे रात

चिरागों की तरह जलते जिस्मों की बदौलत

आओ कि

फिर चाहे सुबह न उगे

चाहे तो आए

कि फिर न दिन आए…

(रजनीश)

नवम्बर 8, 2013

चलो एक बार फिर से मिल जाएँ हम

मेरी  सारी  हसरतें…  lovers-001

सारी तमन्नाएँ…

मेरे सारे अरमान…

मेरे सारे सपने

सिल गए हैं …

अस्तित्व से तुम्हारे ही

तुम मेरे शब्-ओ-रोज़ के हर लम्हे में

देखे अनदेखे

ख्वाबों की चलती फिरती तस्वीर हो…

कहे अनकहे लफ़्ज़ों की जिंदा तासीर हो…

मैं शुरू होता हूँ

हर सुबह तुम से…

ख़त्म हो जाता हूँ हर शब तुम में ही…

ढूंढता रहता हूँ तुम्हारे  होठों का स्पर्श…

अपनी उँगलियों  के पोरों  में

तलाशती  रहती हैं आँखें सीने पे

तुम्हारी गर्म साँसों के निशाँ हर लम्हा…

अहसास तुम्हारी छुअन का जिंदा रहता है

मुझमे हर पल…

रखता है मुझे जिंदा हर पल…

आओ

दूरियां समेट दें अपने जिस्मों की हम

संगम हो

मेरे  तुम्हारे वजूद का

ऐसे कि

बहे ज़िन्दगी लहू में फिर से…

वैसे भी तो तुम्हारा प्यार गरम लावे सा

समेटे रखता है मुझे अपने में

बन के चादर गर्म अहसासों  की बिछा रहता है

पूरी तरह मुझ पे …

पूरी पूरी रात …

पूरा पूरा दिन…

(रजनीश)

नवम्बर 5, 2013

देह-संगम

बोलने दो आँखों को कभी…

सुनने दो अधरों से कभी…

रेशमी बंध खुल जाने दो

सपनों  को संवरने दो कभी…

मैंने बरसों जिसे तराशा है

उस आग-रेशम बदन की लौ में

जल जाने दो मुझे…

खुद में बिखरने दो  कभी…
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तेरी मादक नशीली गंध उठाती है

मेरे बदन में जो उन्मत्त लहरें

अपने सीने  में से हो के…

इनको  गुजरने दो कभी…

मैं तेरे सीने से लिपट के

बाकी उम्र यूँ ही बिता दूंगा

कभी बस आ…

के तसव्वुर की इस इक रात की

तकदीर संवर जाए कभी…

ज़रुरत क्या रहेगी लफ़्ज़ों की फिर…

जुबां को काम दो सिर्फ प्यार का

खामोश लम्हों…

और नीम अंधेरों

को दरमियाँ पसरने दो कभी…

ना रात हो ना दिन हो…

न अँधेरा ना उजाला…

कभी जब दिन भर का थका सूरज

रात के सीने पे सिर रख

सोने को बेताब जा रहा हो क्षितिज तक मिलने उससे…

बस आओ उसी वक़्त तुम…

बैठे रहें देखते इस अलौकिक प्रतिदिन के मिलन को…

कितना शाश्वत है इनका मिलना…

रोज़ मिलते हैं लेकिन प्यास उतनी ही…

मैं सूरज तो नहीं

लेकिन चैन की नींद आएगी

सिर्फ तुम्हारे सीने पे सिर रख के शायद…

रात कभी कोई सवाल नहीं करती सूरज से…

कोई ज़बाब नहीं मांगती उस के बीते पलों का…

सूरज भी नहीं उठाता कोई प्रश्न रात के अन्धेरेपन पे…

बीते पलों पे न कोई सवाल

न आने वाले समय की कोई फिक्र….

बस एक अद्भुत…

पारलौकिक…

अनंत पुरातन

लेकिन चिर नवीन…

कभी जिस की उष्णता कम नहीं होती

ऐसा मिलन…

ऐसा देह-संगम…

(रजनीश)

मई 4, 2013

सहयात्री के लिए शुभकामनाएँ

वह कामगार मैं कामगार

दोनों लौटते थे घर

कभी वह बैठती मैं खड़ा रहता

कभी मैं बैठता और वह खड़ी रहती थी|

कभी-कभी मैं देख लेता था

उसकी आँखों की ओर

और उतर जाती थी मेरी थकान,

कभी-कभी मैं खोल देता था

उसकी खिड़की का शीशा

उससे जो खुलता न था|

इससे ज्यादा मेरा उससे नाता न था

वह कामगार मैं कामगार

दोनों लौटते थे घर

बहुत दिनों तक वह नहीं दिखी

बहुत दिनों तक खिडकी के पास वाली

वह सीट खाली रही

बहुत दिनों तक याद आती रही उसकी आँखें

आज वह दिखी तो वह वह न थी

आज उसकी आँखें रोज से कुछ बड़ी थी

होंठ रोज से कुछ ज्यादा लाल

पैर रोज से कुछ ज्यादा खूबसूरत

सिर से पाँव तक

सुहाग-सिंदूर में लिपटी ओ स्त्री|

मैं तुम्हारा कोई नहीं था

पर तुम्हारे कुंआरे दिनों का साक्षी हूँ

भले ही ठसाठस भरी बस में

मैं तुम्हारे लिए थोड़ी-सी ही जगह बनाई है

अच्छे-बुरे रास्तों से गुजरा हूँ तुम्हारे साथ|

मैं तुम्हारा कोई नहीं

पर भले दिन रहें हमेशा तुम्हारे साथ

दुख तुम्हारे दरवाजे दस्तक न दे

तुम्हारा आदमी कभी राह न भूले,

और ठौर-कुठौर न चले

तुम्हारा घर और घडा कभी खाली न हो

तुम्हारे भोजन में कभी मक्खी न गिरे

तुम्हारी गृहस्थी में दूध न फटेअचार में फफूंद न पड़े

तुम्हारे फल कभी सड़े नहीं

तुम्हारे पाले पंछे पिंजरों में मरे नहीं

कोई भूखा-प्यासा न जाए तुम्हारे घर से

तुम पहचान लो भीख मांगते

रावण को और देवता को

वह दिन भी आये

जब तुम्हे इस बस का मोहताज न होना पड़े|

(राजेन्द्र उपाध्याय)

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