Posts tagged ‘Shabd’

जून 4, 2014

आखिरी ख़त

बहुत देर से शब्द मिल नहीं रहे हैं…tum-001

खाली कुएं से तो अपनी ही आवाज़ लौटेगी न

अब किसको आवाज़ दूं?

किसको पुकारूं??

दिल का खला भरा नहीं अब तक

तेरे इंतज़ार में आँखें पत्थर हो गयीं

आवाज़ भी अपनी ग़ुम गयी जैसे

दिल के कुएं से टकरा के वापस जो नहीं आई…

सोचता हूँ कि आखिरी ख़त भी लिख रखूं

तुम इस का जवाब मत देना

मैं मुन्तजिर न रहूँगा

ये सिलसिला-ऐ-तबादला-ऐ- ख्याल रुक जाये अब

बेवज़ह गर्म ख्यालों का जवां रहना ठीक तो  नहीं

ये सिलसिला सौ नए अरमानो का वायस बनता है

ये नहीं टूटेगा तो लाजिमी दिल टूट जायेंगे

बंद करना ही होगा हर रास्ता

हर झरोखे के मुंह पे पत्थर रखना ही होगा

मुलाकात की हर वज़ह मिटानी ही  होगी

मिटाने होंगे

इस किराये के मकां के पते के निशां

कल से मैं तुम्हे नहीं मिलूँगा यहाँ…

Rajnish sign

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जनवरी 9, 2014

मानिनी हठ-धारिणी

जब बहुत कुछ हो कहने कोsimi-001

और शब्द गले तक भर गए हों

आपाधापी में  कोई बाहर नहीं आ पाता

कुछ बह निकलते हैं आँखों की राह

कुछ रह जाते हैं फंस कर वहीँ

टूटे टूटे कुछ बेतरतीब कुछ कहे

कुछ अनकहे…

कुछ अक्सर दिखने वाले लेकिन समझ के परे

रात के सपने से …

जिनमे मैंने तुम्हे अक्सर देखा है

उद्दीप्त…उष्ण…आवेशित…

प्यार के मौन आमंत्रण लिए अपनी आँखों में

कभी खुद से सकुचाती…

कंचुकी की गाँठ टटोलते…

संभालते…

बार -बार

कभी यौवन भार से झुकी जाती

कभी उन्नत मस्तक रूप गर्विता

कभी स्वयमेव समर्पिता

कभी मानिनी हठ-धारिणी

कुछ वैसे ही जैसे हतप्रभ बिजली गिरने से

न ये समझे कि दिशा कौन जाए हिरनी!

Rajnish sign

जनवरी 6, 2014

यक्ष प्रश्न

यक्ष प्रश्न हैwomanleavingman-001

क्या पागलपन है?

क्यूँ पागलपन है?

यक्ष प्रश्न है…

उत्तर क्या दें?

उत्तर कैसे दें?

उत्तर किसे दें?

अब न तो शब्द बचे हैं

न जुबां रही है

किस भाषा को वो समझेगा?

अब जुबां क्या बदलेगी हमारी?

न उसका दिल बदलेगा…

प्रश्न बहुत हैं …

उत्तर कम हैं

कम क्या ?

कुछ के उत्तर ग़ुम हैं

जाओ दिल पे बोझ न लादो

अपने मन को मत अपराधो

आज से बस तुम इतना जानो

दोष तुम्हारा तनिक नहीं है

अपना दिल तो है ही पागल

उम्र के साथ नहीं चल पाया

अब तक बचपन में जीता है

टूटे चूड़ी के टुकड़ों को

सिरे गला कर फिर सीता है

दुनियादारी नहीं समझता…

तुमसे आगे नहीं देखता

तुम न होती तब भी इसका

हर हाल में होना ये था

पागल था…पागल है

पागल होना था…

सयानों के साए में इसका

दम घुटता है…

Rajnish sign

जनवरी 4, 2014

Paulo Coelho तुम्हे पढकर

कहीं जब कोई शब्द paulo

वाक्य के सरल प्रवाह में बहकर

आँखों से ह्रदय में जाकर

फिर मन को हल्का कर देता है!

और-

कहीं कोई शब्द

वाक्य के सरल प्रवाह में बहकर

आँखों से ह्रदय में जाकर

फिर मन को भारी कर देता है!

शब्दों की सरलता

जो कभी मन को कर देती है हल्का

और कभी कर देती है भारी

मन-प्राण को कहीं छू-कर, सहला कर

कहीं किसी कृत्रिमता को पिघला देती है

और यह पिघला द्रव

कहीं आसुंओं के साथ धो देता है, मन को

और इसे कर देता है,

निर्मल और स्वच्छ!

Yugalsign1

नवम्बर 28, 2013

कह तो दूँ …शब्द कहाँ हैं

love story-001दे तो दूँ

अभिव्यक्ति

उन  अहसासों को

प्रथम छुअन के

स्पंदन को

इंतज़ार की

धडकनों को

उष्ण देह की

तपन को

होठों की

लरजन को

ठन्डे बदन की

कम्पन को

पर तुम ही कहो

शब्द कहाँ  से लाऊं?

Rajnish sign

नवम्बर 23, 2013

गीत क्या खाक बनेंगे?

अगर मैं लिख सकताtabu-001

तो एक गीत ज़रूर लिखता

गीत लिखता…

तुम्हारे नाम

रसपूर्ण…

भावपूर्ण…

स्नेहसिक्त …

प्रेममय…

गीत,

जो होता अभिव्यक्ति…

तुम में मेरी श्रद्धा का…

मेरे मित्रवत स्नेह  का…

मेरे उद्दाम प्रेम का…

गीत,

जो जगाता  तुम्हारे मन को…

हौले से

जो खोलता…

हृदय कपाटों को

जो कानो में घुल के

उतर  जाता गहरे मन में

गीत,

लिखता…

तुम्हारे रक्तिम होंठो पे

गहरे झील से नयनो पे

उठती गिरती चितवन पे

तुम्हारे  उन्नत यौवन पे

साँसों के आन्दोलन पे

भावनाओ के ज्वार पे

और दिल में दबे प्यार पे

पास आओ तो शायद शब्द ढल जाएँ

गीत में

तुम्हारे बिना तो

शब्द

खोखले हैं

बेमानी हैं

गीत क्या खाक बनेंगे?

(रजनीश)

नवम्बर 10, 2013

कितना कुछ ज़िंदा रहता

गाल पे गिर आई लट को तर्ज़नी से लपेटतेguru-001
अपनी आँखों की शफक से मेरी पलकों को झपकाते
पूछा था तुमने,
-बहुत दिनों से तुम्हारा लिखा कुछ पढ़ा नहीं
क्या हुआ?
लिखना बंद कर दिया क्या?
क्यों कर दिया?-
चाहा तो बहुत
कह  दूँ
तुम जो नहीं थी…
तुम मेरी प्रेरणा
तुम मेरी कविताओं की  धुरी
तुम जब गयी थी
तब ले गयी थी न
मेरे शब्द
मेरी कलम
मेरी जुबान
मेरे गर्म अहसास
मेरे जीवन का ताप
मेरी साँसों से अपनी महक
मेरे बदन से अपने बदन के  छुअन की दहक
एक बर्फ सी जमी है तब से मेरे वजूद पे
कौन लिख सकता है ठंडी अकड़ी हुयी उँगलियों से?
पिघला दो मुझे अपने आगोश में लेके
रख दो अपने गर्म होंठ मेरे होंठों पे
बदल दो रंग इन का
नीले पड़े होंठो से कविता नहीं निकलेगी
मेरे हाथों को अपने हाथों में लेके
इन्हें इन के ज़िंदा होने का अहसास लौटा दो
अब तुम हो लेकिन शायद
हम दोनों के बीच इस बर्फ के सिवा कोई और भी है
लेकिन सच ये भी है कि
अगर कह पाता तुमसे कुछ
तो ये बर्फ भी नहीं होती
ये तीसरे का अहसास भी न होता
मेरे होंठ नीले न होते
मेरी उंगलियाँ ज़िंदा होती…
(रजनीश)
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