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फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

सितम्बर 11, 2011

अपना वजूद तलाशता व्यक्ति

व्यक्ति अपने जीवन की
सारी उर्जा
अपने वजूद को
तलाशने में लगा देता है
परन्तु
जब उसकी ऊर्जा
उससे जुदा होती है तो
न वह ‘वह’ रहता है
और न उसका वह वजूद।

जीवन भर..
वह धन-संपत्ति, जोरू और ज़मीन का
मालिक कहलाने
मालिक के पीछे
बड़े नाम होने की
लड़ाई लड़ता है
इनसे गौरवान्वित होता है
परन्तु उसकी उर्जा चले जाने पर
न वह ‘मालिक’ रहता है
और न उसका नाम।

जीवन भर वह नहीं जान पाता कि
जब वह अपने,
मन, शरीर और आत्मा का ही
मालिक नहीं
वही उसके नियंत्रण में नहीं
तो वह..
और किसका और कैसे
‘मालिक हो सकता है?
और नाम भी फ़िर
जो ‘वह’  के लिए मिला है
‘वह’ न रहने पर, कहाँ रहेगा?

जीवन भर व्यक्ति
यह नहीं जानता कि
वह उस ‘वजूद की
लड़ाई लड़ रहा है
जो उसके पास है
उसको पाना तो वह है
जो उसके पास नहीं है
वह  नहीं जानता कि
उर्जा रुप आत्मा उसके पास है
उसे पाना तो सद्कर्म है
जो उसके पास नहीं
इस तरह
उसका जीवन
जो उसकी उर्जा से है
उसी को न तलाश सकने में
व्यर्थ ही नष्ट होता है
और जो उसके पास नहीं
वह उसे नहीं पा पाता।

और इस तरह वह
जन्म दर जन्म
अपने वजूद को तलाशता हुआ
कष्टों, दुखों और
कुछ ही सुख के
गोल जन्म चक्र में
घूमता है तब तक
जब तक वह
यह नहीं जान पाता कि
कि उसका ‘वजूद’
उसके नाम में नहीं
और न और कहीं है
वह तो उसे केवल
अपने कर्म में तलाशना है!

(अश्विनी रमेश)

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