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मई 12, 2016

अज्ञेय से … (शमशेर बहादुर सिंह)

अज्ञेय से

जो नहीं है
जैसे कि ‘सुरुचि’
उसका गम क्‍या?
वह नहीं है।

किससे लड़ना?

रुचि तो है शान्ति,
स्थि‍रता,
काल-क्षण में
एक सौन्दर्य की
मौन अमरता।

अस्थिर क्‍यों होना
फिर?

जो है
उसे ही क्‍यों न सँजोना?
उसी के क्‍यों न होना!-
जो कि है।

जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका गम क्‍या?
वह नहीं है।

* * * * *

एक पीली शाम
 

 

एक पीली शाम
पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता
शान्त
मेरी भावनाओं में तुम्‍हारा मुखकमल
कृश म्‍लान हारा-सा
(कि मैं हूँ वह
मौन दर्पण में तुम्‍हारे कहीं?)     वासना डूबी
शिथिल पल में
स्‍नेह काजल में
लिये अद्भुत रूप-कोमलताअब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू
सान्‍ध्‍य तारक-सा
अतल में।

आओ

1
क्‍यों यह धुकधुकी, डर, –
दर्द की गर्दिश यकायक साँस तूफान में गोया।
छिपी हुई हाय-हाय में
सुकून
की तलाश।

                 बर्फ के गालों में है खोया हुआ
या ठंडे पसीने में खामोश है
शबाब।

तैरती आती है बहार
पाल गिराए हुए
भीने गुलाब – पीले गुलाब
के।
तैरती आती है बहार
खाब के दरिया में
उफक से
जहाँ मौत के रंगीन पहाड़
है।
जाफरान
जो हवा में है मिला हुआ
साँस में भी है।
मुँद गयी पलकों में कोई सुबह
जिसे खून के आसार कहेंगे।
– खो दिया है मैंने तुम्‍हें।

2
कौन उधर है ये जिधर घाट की दीवार… है?
वह जल में समाती हुई चली गयी है;
लहरों की बूँदों में
करोड़ों किरनों
की जिन्दगी
का नाटक-सा : वह
मैं तो नहीं हूँ।

फिर क्‍यों मुझे (अंगों में सिमिट कर अपने)
तुम भूल जाती हो
पल में :
तुम कि हमेशा होगी
मेरे साथ,
तुम भूल न जाओ मुझे इस तरह।  * *

एक गीत मुझे याद है।
हर रोम के नन्‍हें-से कली-मुख पर कल
सिहरन की कहानी मैं था;
हर जर्रे में चुम्‍बन के चमक की पहचान।
पी जाता हूँ आँसू की कनी-सा वह पल।

ओ मेरी बहार!
तू मुझको समझती है बहुत-बहुत – – तू जब
यूँ ही मुझे बिसरा देती है।

खुश हूँ कि अकेला हूँ,
कोई पास नहीं है –
बजुज एक सुराही के,
बजुज एक चटाई के,
बजुज एक जरा-से आकाश के,
जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर
(बजुज उसके, जो तुम होतीं – मगर हो फिर भी
यहीं कहीं अजब तौर से।)

तुम आओ, गर आना है
मेरे दीदों की वीरानी बसाओ;
शे’र में ही तुमको समाना है अगर
जिन्दगी में आओ, मुजस्सिम…
बहरतौर चली आओ।
यहाँ और नहीं कोई, कहीं भी,
तुम्‍हीं होगी, अगर आओ;
तुम्‍हीं होगी अगर आओ, बहरतौर चली आओ अगर।
(मैं तो हूँ साये में बँधा-सा
दामन में तुम्‍हारे ही कहीं, एक गिरह-सा
साथ तुम्‍हारे।)

3
तुम आओ, तो खुद घर मेरा आ जाएगा
इस कोनो-मकाँ में,
तुम जिसकी हया हो,
लय हो।

उस ऐन खमोशी की – हया-भरी
इन सिमतों की पहनाइयाँ मुझको
पहनाओ!
तुम मुझको
इस अंदाज से अपनाओ
जिसे दर्द की बेगानारवी कहें,
बादल की हँसी कहें,
जिसे कोयल की
तूफान-भरी सदियों की
चीखें,
कि जिसे ‘हम-तुम’ कहें।

(वह गीत तुम्‍हें भी तो
याद होगा?)

टूटी हुई, बिखरी हुई


टूटी हुई बिखरी हुई चाय
की दली हुई पाँव के नीचे
पत्तियाँ
मेरी कविता
बाल, झड़े हुए, मैल से रूखे, गिरे हुए, गर्दन से फिर भी
चिपके… कुछ ऐसी मेरी खाल,
मुझसे अलग-सी, मिट्टी में
मिली-सीदोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतजार की ठेलेगाड़ियाँ
जैसे मेरी पसलियाँ…
खाली बोरे सूजों से रफू किये जा रहे हैं…जो
मेरी आँखों का सूनापन हैं

ठंड भी एक मुसकराहट लिये हुए है
जो कि मेरी दोस्‍त है।

कबूतरों ने एक गजल गुनगुनायी . . .
मैं समझ न सका, रदीफ-काफिये क्‍या थे,
इतना खफीफ, इतना हलका, इतना मीठा
उनका दर्द था।

आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं…
न जाने कहाँ।

मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार –
जिसके स्‍वर गीले हो गये हैं,
छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है…
छप् छप् छप्व

वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्‍यु को सँवारने वाला है।
वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्‍वाइजन’ का लेबुल लिए हुए
दवाइयाँ हँसती हैं –
उनके इंजेक्‍शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है।

वह मुझ पर हँस रही है, जो मेरे होठों पर एक तलुए
के बल खड़ी है
मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं
और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह
खुरच रहे हैं
उसके एक चुम्‍बन की स्‍पष्‍ट परछायीं मुहर बनकर उसके
तलुओं के ठप्‍पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है
उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है।

मुझको प्‍यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।
मुझको सूरज की किरनों में जलने दो –
ताकि उसकी आँच और लपट में तुम
फौवारे की तरह नाचो।
मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,
ताकि उसकी दबी हुई खुशबू से अपने पलकों की
उनींदी जलन को तुम भिगो सको, मुमकिन है तो।
हाँ, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाजे की शर्माती चूलें
सवाल करती हैं बार-बार… मेरे दिल के
अनगिनती कमरों से।

हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
…जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।

आईनो, रोशनाई में घुल जाओ और आसमान में
मुझे लिखो और मुझे पढ़ो।
आईनो, मुसकराओ और मुझे मार डालो।
आईनो, मैं तुम्‍हारी जिंदगी हूँ।

एक फूल उषा की खिलखिलाहट पहनकर
रात का गड़ता हुआ काला कम्‍बल उतारता हुआ
मुझसे लिपट गया।

उसमें काँटें नहीं थे – सिर्फ एक बहुत
काली, बहुत लम्बी जुल्‍फ थी जो जमीन तक
साया किये हुए थी… जहाँ मेरे पाँव
खो गये थे।

वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को
अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर
एक जिन्‍दा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा –

और तब मैंने देखा कि मैं सिर्फ एक साँस हूँ जो उसकी
बूँदों में बस गयी है।
जो तुम्‍हारे सीनों में फाँस की तरह खाब में
अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी।

मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा न बन सका,
क्‍योंकि मेरे झुकते न झुकते
उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर
खो गयी थी।

जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफाफा
तुम्‍हारे हाथ आया।
बहुत उसे उलटा-पलटा – उसमें कुछ न था –
तुमने उसे फेंक दिया : तभी जाकर मैं नीचे
पड़ा हुआ तुम्‍हें ‘मैं’ लगा। तुम उसे
उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर
मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे
यों ही मिल लिया था।

मेरी याददाश्‍त को तुमने गुनाहगार बनाया – और उसका
सूद बहुत बढ़ाकर मुझसे वसूल किया। और तब
मैंने कहा – अगले जनम में। मैं इस
तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में
डूबते पहाड़ गमगीन मुसकराते हैं।

मेरी कविता की तुमने खूब दाद दी – मैंने समझा
तुम अपनी ही बातें सुना रहे हो। तुमने मेरी
कविता की खूब दाद दी।

तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया :
और जब लपेट न खुले – तुमने मुझे जला दिया।
मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे : और वह
मुझे अच्‍छा लगता रहा।

एक खुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह
बस गयी है, जैसे तुम्‍हारे नाम की नन्‍हीं-सी
स्‍पेलिंग हो, छोटी-सी प्‍यारी-सी, तिरछी स्‍पेलिंग।

आह, तुम्‍हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गयी थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है।

अगर मुझे किसी से ईर्ष्‍या होती तो मैं
दूसरा जन्‍म बार-बार हर घंटे लेता जाता :
पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ –
तुम्‍हारी बरकत!

बहुत-से तीर बहुत-सी नावें, बहुत-से पर इधर
उड़ते हुए आये, घूमते हुए गुजर गये
मुझको लिये, सबके सब। तुमने समझा
कि उनमें तुम थे। नहीं, नहीं, नहीं।
उसमें कोई न था। सिर्फ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं। फकत।

 

 

 

 

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नवम्बर 13, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1) से आगे…

देखिये कामना जी आप इसे मेरे द्वारा आपका मजाक उड़ाने की चेष्टा के रुप में न लें अतः यहाँ सीधे-सीधे रुप में जोड़ना चाहता हूँ यौन- शिक्षा के मुद्दे को, जो कि सम-सामायिक मसला है और आपकी कहानियों की नायिकाओं के शारीरिक सम्बंधों को लेकर दृष्टिकोण से सीधे-सीधे सम्बंध रखता है।

अनिल जी, यौन शिक्षा एक अलग मामला है। उन्होने आँखें तरेर कर गुस्से से कहा।

पर फिर भी किशोर लड़कियाँ तो शिक्षा लेंगी ही आपकी कहानियों से कि खूब शारीरिक सम्बंध बनाओ, कुछ नहीं होता, सब वैसे ही डराते हैं। और यौन शिक्षा अलग मुद्दा नहीं है। आपने खुद ही अपने एक लेख में एक सर्वे को कोट करते हुये लिखा है कि कैसे गरबा खेलने के महीने के बाद कुछ प्रांतों में गर्भपात करवाने के मामलों में बढोत्तरी हो जाती रही है और इस बरस उन प्रांतों में गरबा के महीने में गर्भ निरोधक सामग्रियों की बिक्री में बहुत ज्यादा वृद्धि देखी गयी है। तो एक तरफ तो इतनी जागरुकता आ रही है और आप जाने क्या कहना चाहती हैं अपनी कहानियों के माध्यम से।

लेखिका ने कुछ हथियार डालते हुये कहा,” आपके कुछ तर्कों से मैं सहमत हूँ पर मौटे तौर पर अभी भी कहूँगी कि कहानी के चरित्र समाज से ही लिये जाते हैं और अगर ये चरित्र समाज को गलत रुप में प्रभावित करते तो अज्ञेय, जैनेंद्र, यशपाल, मण्टो, और मृदुला गर्ग आदि इतने प्रसिद्ध लेखक न बनते। इन लेखकों ने भी स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबधों को खुलकर अपनी कहानियों और उपन्यासों का हिस्सा बनाया है। और भी बहुत सारे लेखक एवम लेखिकायें हैं जिन्होने ऐसा किया है।

कामना जी, जैनेंद्र जी का साफ साफ आग्रह अपनी नायिकाओं को घर से बाहर के क्षेत्रों में पुरुषों के समकक्ष स्थापित करने का था। वे ऐसी महिलायें स्थापित करना चाहते थे जो अपने फैसले खुद ले सकें और पुरुषों की ही भाँति समाज निर्माण में भागीदारी कर सकें। अज्ञेय, नदी के द्वीप में अगर रेखा को विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंधों में सलंग्न होते हुये दिखाते हैं तो वे उसे पहले गर्भवती होने और बाद में गर्भपात की यातनामयी वेदना से गुजरते हुये भी दिखाते हैं। वे बहुत जागरुक और जिम्मेदार लेखक के रुप में सामने आते हैं। और आप ऐसा एक भी उदाहरण दे दें जहाँ आपने पाया हो कि कोई पुरुष मण्टो की खोल दो या ठण्डा गोश्त जैसी कहानियाँ पढ़कर कामुकता के भाव से जाग्रत हो गया हो।

लेखिका इस विश्लेषण पर कुछ और गुस्से से भर गयीं| उन्हें आभास हो गया कि उनके लेखन की तुलना इन्ही लेखकों के लेखन से आने ही वाली है| वे चुप रहीं|

कामना जी,  दर्पण झूठ नहीं बोला करता| आप कहती हैं कि कहानियां और चरित्र समाज से ही लिए जाते हैं और कहानियां समाज को दर्पण दिखाती हैं| कहानियां समाज को दर्पण तब दिखाती हैं जब वे एक जिम्मेदार भूमिका निभाएं| क्षमा कीजियेगा आपकी ज्यादातर कहानियां आजकल के सनसनी फैलाने के तौर तरीकों का अनुसरण करती ज्यादा दिखाई देती हैं| आप अपनी किसी भी एक कहानी का उदाहरण दे दें जहां आपकी कहानी की नायिका या नारी चरित्र ने विवाह पूर्व और विवाह से बाहर जाकर पुरुष से शारीरिक संबंध बनाए हों और आपने उस चरित्र को ऐसी संभावना के आसपास से भी गुजारा हो जहां इस तरह के संबंधों से उत्पन्न दुष्परिणामों से उनका पाला पड़ता हो| आपने तो ऐसे संबंधों के इर्दगिर्द आनंद का ऐसा मिथ्या वातावरण रचा है जैसा कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोर पाठकों के लिए झूठे रोमांटिक किस्से कहानी और उपन्यास रचते रहे हैं|

लेखिका का चेहरा क्रोध से अजीब से भूरेपन से रंग गया था| वे कुछ कहना चाहती थीं पर शायद उन्हें शब्द नहेने मिल पा रहे थे या वे अपने गुस्से के कारण नहीं बोल पा रही थीं| उनके हाव भाव ऐसे हो चले थे मानो आँखों से ही भस्म कर देंगी|

उनकी एक शिष्या उनके बचाव में मैदान में कूदी और तीखे तेवर के साथ बोली|

कहानी समाज के घटनाक्रमों से उठायी जाती हैं और लेख इनके व्यक्तिगत विचार को प्रकट करते हैं| अतः आपके द्वारा इनकी आलोचना गलत है|

महोदया पहले तो आप एक सुधार कर लें मैं इनकी आलोचना कर रहा हूँ| में कुछ प्रश्न उठाना चाहता हूँ जैसा कि मैंने शुरू में भी निवेदन किया था कि कुछ प्रश्न हैं जिनके उत्तर महिला रचनाकारों को खोजने चाहियें| आज सुबह ही कार्क्रम में मंच से तो कामना जी भी औरों के लिखे हुए पर पचास किस्म के प्रश्न उठा रही थीं|

शिष्या के तेवर कुछ कमजोर पड़े और वह पहले से धीमे स्वर में बोली|

लेखक का दायित्व समाज सुधार का तो होता नहीं|

महोदया, हो सकता है आपकी बात सही हो पर मुझे लगता है कि यह बात तभी तक सच है जब तक कि लेखक कल्पित संसार में विचरण कर रहा है और इसी संसार में कविता,कहानी और उपन्यासों के रचनाशील कर्म में सलंग्न है पर अगर वही लेखक लेखों के द्वारा नैतिक-अनैतिक के सवाल पर समाज में चीख पुकार मचा रहा है और अपने को नैतिकता का ठेकेदार के रूप में प्रचारित कर रहा है तो समाज को भी देखना होगा कि ऐसा रचनाकार असल में रच क्या रहा है और समाज एं अपने लेखन से क्या फैला रहा है| अभी तो हो क्या रहा है कि नशा बेचने वाले खुद ही ढोल पीट रहे हैं कि  लोग नशे के आदि हो रहे हैं| अरे इतना ख्याल है समाज का तो नशा बेचना और बनाना बंद करो पहले|

शिष्या ने अपनी गुरु के तमतमाते चेहरे को देखा और नये शब्दों से आक्रमण करना चाहा, पर तर्क के अभाव में कम शब्दों के साथ शिकायती बन गयी|

यह तो लेखक की व्यक्तिगत आलोचना हो गयी|

…जारी

…[राकेश]

मार्च 12, 2013

गीत गुनगुनाने दो

 

सपने हैं शीशे से साफ़ करो इनको

सपनों की गलती क्या माफ करो इनको |

मन में कुछ आने दो कुछ मन से आने दो

गीत गुनगुनाने दो …|

मोहक हर दर्पण था मोह गया मन को

आकर्षण बंधन का तोड़ गया तन को |

सुख को तुम माने दो दुख में कुछ गाने दो

गीत गुनगुनादे दो…|

मन को तो रोक लिया मिलने से उनको

भीतर के जग में अब रोकोगे किनको |

सृष्टि है लुभाने दो दो दृश्य हैं रमाने दो

गीत गुनगुनाने दो…|

दूर जा चुके हैं सब जाना था जिनको

अब किसे पुकारें हम आना है किनको |

अब दिया बुझाने दो दर्द को सुलाने दो

गीत गुनगुनाने दो…|

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 17, 2013

सारा सावन पिघल न जाए

वही कहानी मत दुहराओ

मेरा मन हो विकल न जाए

भावुकता की बात और है

प्रीत निभाना बहुत कठिन है

यौवन का उन्माद और है

जनम बिताना बहुत कठिन है

आँचल फिर तुम मत लहराओ

पागल मन है मचल न जाए

दर्पण जैसा था मन मेरा

जिसमें तुमने रूप संवारा

तुम्हे जिताने की खातिर में

जीती बाजी हरदम हारा

मेघ नयन में मत लहराओ

सारा सावन पिघल न जाए

तोड़ा तुमने ऐसे मन को

पुरवा जैसे तोड़े तन को

सोचो मौसम का क्या होगा

बादल यदि छोड़े सावन को

मन चंचल है मत ठहराओ

अमरित ही हो गरल न जाए

कदम कदम पर वंदन करके

यदि में तुमको जीत न पाया

कमी रही होगी कुछ मुझमे

जो तुमने संगीत न पाया

तान मगर अब मत गहराओ

जीवन हो फिर तरल न जाए

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 10, 2012

तुम्ही बताओ क्या होगा?

जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

रजनी-गंधा देह तुम्हारी
मन गंगा का पानी
जी चाहे तुम पर मैं लिख दूं
कोई प्रेम कहानी |

जब ऐसा अदभुत रूप नयन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

बेले में है खुशबू तुमसे
रूप में रंग तुम्हारा
रंग और खुशबू का बोलो कैसे हो बंटवारा
जब इतनी कठिन घड़ी उपवन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

केश तुम्हारे रेशम – रेशम
भौंह लचकती डाली
मधु- प्याले से नयन तुम्हारे
ओठ उषा की लाली
जब इतनी रूप-राशि दर्पण के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?
जब धरती जैसी प्रिया गगन के आगे हो…

यह तो शायद तुम ही जानो कौन बसा है तुम में
तुम्हे देख कर मैं यह मानूं
अघट नशा है मुझमें
जब बारिश की दो बूँद तपन के आगे हो तो तुम्ही बताओ क्या होगा?

{ कृष्ण बिहारी }

सितम्बर 19, 2011

तुम बताओ साँस थम न जायेगी

काली रात के काले अंधेरे में
तुम्हारे रुप का उजला उजाला
जब भी मेरे सामने होगा कभी
तुम बताओ नींद कैसे आयेगी!

मृगनयनी तुम्हारी आँख का दर्पण
कोटरों में कैद करके यदि तुम्हे
केवल तुम्हारी प्यास दिखलाये
तुम बताओ प्यास बढ़ न जायेगी!

सोई धूप के नीले समंदर में
धुली कविता-सा तुम्हारा विम्ब तैरे
और लहरों पर मचल जाये अगर
तुम बताओ लहर क्यों न गायेगी?

मेरे हृदय के हर खुले आकाश पर
सोना तुम्हारे रंग का सौदामिनी
पिघलकर शर्म से कभी पागल बने
तुम बताओ साँस थम न जायेगी!

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 5, 2011

अंजान आरम्भ का अनिश्चित अंत

दर्पण ने दशकों तक
तुम्हारे सौन्दर्य को सराहा है,
तीखे नयन नक्श,
सांचे में ढला जिस्म,
मदहोश करते उतार चढाव,
दीवाना बनाते आये हैं दीवानों को।

अब ये किसको है मालूम
कितनी झुर्रिया सिमटवाई हैं तुमने?
कितना सिलिकॉन लटके बदन में भरा है?
कितना दर्द अंगों ने सहा है?
ताकि तुम यौवनमयी बनी रहो!

ये खुदफरेबी
दर्पण को धोखा दे सकती है
मगर ढलती उम्र का चारा नहीं।

सिर्फ समय है सदाबहार
जो ले जाता है,
मुरझाते हुए पलों के साथ
जीवन को जाने कहाँ
अंजान आरम्भ का
अनिश्चित अंत।

(रफत आलम)

जुलाई 20, 2011

प्रेम और इच्छा

प्रेम और इच्छा
एक ही बात नहीं हैं
वे तो बिल्कुल उल्टे हैं
एक दूसरे के।

प्रेम में इच्छा का कोई स्थान नहीं,
इच्छा लोभ है,
इच्छा लालच है
अभीप्सा है,
इच्छा
खाली ह्रदय का खेल है,
इच्छा अतृप्त ह्रदय की
प्रकृति है,
इच्छा भिक्षा मांगने की
प्रवृत्ति है,
इच्छा
केवल स्वहित देखने का
दृष्टिकोण है,
इच्छा केवल पाने भर की
तुच्छ आदत है,
इच्छा
निम्न श्रेणी का भाव है,
इच्छा करने वाला
अपने चारों ओर काँटे
बिखेरता रहता है।

प्रेम इसके विपरित
उच्चतम शिखर पर
बैठा होता है,
प्रेम की इच्छा नहीं की जाती,
प्रेम करने से नहीं होता,
प्रेम कोई प्रयास करके पाने की वस्तु नहीं है,
प्रेम में होने के लिये
अपने को तैयार किया जाता है,
अपने को शुद्ध किया जाता है,
अनुकूल वातावारण देख ही
प्रेम जीवन में उतरता है,
प्रेम में होने के बाद ही,
प्रेममयी ह्र्दय
लबालब भर जाता है
आनंद और देने का भाव
दोनों अंदर जीवित हो जाते हैं
प्रेम में होने वाला
अपने चारों ओर
फूल खिलाता है
सुगंध बिखेरता है।

इच्छा और प्रेम का क्या मेल?
इच्छा दर्पण पर जमी धूल है
यह वासनामयी है।
इच्छा देती प्रतीत तो होती है
पर यह वास्तव में
मानव जीवन से बहुत कुछ ले लेती है।

प्रेम
स्वच्छतम दर्पण है,
जिस पर धूल नहीं जमा करती,
जिसकी चमक कभी कम नहीं हुआ करती,
देना प्रेम का स्वभाव है।

इच्छा को पीछे छुपा कर
प्रेम के बहाने से इसकी पूर्ति
कभी प्रेम के वास्तविक स्वरुप
तक नहीं ले जा सकती,
ऐसा प्रेम अभिनय है,
नकली है,
ढ़कोसला है,
मानव की इसी कुत्सित लुपाछिपी के कारण
इच्छा का घालमेल प्रेम से कराकर
प्रेम को भ्रमित बना दिया गया है,
इसके नकली स्वरुप को असली मानकर और बनाकर
इसे इसके शिखर से नीचे गिरा दिया गया है।

…[राकेश]

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