Posts tagged ‘Bojh’

फ़रवरी 27, 2014

हर सुबह मौत मुझ पे हंसती है

हर शामyadein-001

उदासी भरी आस
दिल के दरवाजे तक

चली आती है यूँ ही
जैसे मौत इक इक कदम कर
और कुछ और करीब आती हो…
चलो आओ तुम अब तो…

के …
अब सहा नहीं  जाता…

इंतज़ार की लंबी रातों का दर्द…

बहुत दुखता है…

बहुत दुखता है…

हर शाम का तेरी यादों को रौशन करना

देहरी तकना…

फिर अँधेरे की चादर भिगोना…

बहुत दुखता है…

देह हर दम जैसे दर्द के बीज बोती है

और अपनी ही फसल के बोझ तले रोती है
आसमां की चादर  हर रोज मुझ पे…

कफ़न होती है …

हर सुबह मौत मुझ पे हंसती है

हर सुबह ज़िन्दगी मुझ को रोती है…

Rajnish sign

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फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

जनवरी 6, 2014

यक्ष प्रश्न

यक्ष प्रश्न हैwomanleavingman-001

क्या पागलपन है?

क्यूँ पागलपन है?

यक्ष प्रश्न है…

उत्तर क्या दें?

उत्तर कैसे दें?

उत्तर किसे दें?

अब न तो शब्द बचे हैं

न जुबां रही है

किस भाषा को वो समझेगा?

अब जुबां क्या बदलेगी हमारी?

न उसका दिल बदलेगा…

प्रश्न बहुत हैं …

उत्तर कम हैं

कम क्या ?

कुछ के उत्तर ग़ुम हैं

जाओ दिल पे बोझ न लादो

अपने मन को मत अपराधो

आज से बस तुम इतना जानो

दोष तुम्हारा तनिक नहीं है

अपना दिल तो है ही पागल

उम्र के साथ नहीं चल पाया

अब तक बचपन में जीता है

टूटे चूड़ी के टुकड़ों को

सिरे गला कर फिर सीता है

दुनियादारी नहीं समझता…

तुमसे आगे नहीं देखता

तुम न होती तब भी इसका

हर हाल में होना ये था

पागल था…पागल है

पागल होना था…

सयानों के साए में इसका

दम घुटता है…

Rajnish sign

जून 14, 2013

तन्हाई में रो दोगे तुम

बेमौसम जब फूल खिले थे

इन्द्रधनुष के रंग मिले थे

तभी लगा था बहुत जल्द ही

इक दिन मुझको खो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

सुनो अकेले मत होना तुम

बोझ अकेले मत ढोना तुम

मित्र! न ऐसा कर पाए तो

बाग बबूल का बो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

तुमने जो उपहार दे दिया

लेने से इनकार कब किया

मैं सब कुछ स्वीकार करूँगा

मुझे खुशी से जो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

सूख नदी का जल जाएगा

औ’ सागर भी घट जाएगा

खुशबू से जो नाम लिख दिया

उसको कैसे धो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 29, 2011

संभाल लो विरासत

 

भारी है कलम का बोझ
कांपती उंगलियां
निद्रा खो चुकी आँखों में
कोई सपना भी नहीं बाकी
जिससे
साकार कर सके कविता
इससे पहले कि मैं सो जाऊँ
इससे पहले कि कलम छुट जाए
टूट जाए मुझसे
जाग्रत ज़हनो, नवोदित विचारों
लो, संभालो इसे

(रफत आलम)

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