Posts tagged ‘Naram’

नवम्बर 19, 2013

मेरे दिल में कितनी गहरी खाई खोद गईं तुम!

मेरे तुम्हारे बीच के फासलों पेmansnow-001
बर्फ की एक चादर बिछी है!
दूरियां पहले भी इतनी ही थीं
लम्बी अब महसूस होती हैं
बीच के ठंडेपन से शायद!
हमारे मध्य
बर्फीले द्वीप तो पहले भी थे,
पर तब मेरे तुम्हारे मध्य की दूरी
पिघल जाती थी
मेरी तुम्हारी गर्म साँसों से
तुम्हारे दिल में उठते
नीम गर्म अहसासों से
मौन कविताएं समेटे,
सतरंगी सपनों की चादर ताने|
बसंत जैसे फूल उठता था चारों ओर
बसंत!
ओह…बसंत…,
याद नहीं कब था पिछली बार
इस पतझड़ से पहले का बसंत
बहुत चाहा कि तेरी बातों से
बहला लूँ खुद को
खींच लूँ साए तेरी यादों के खुद पे…
लेकिन…
कमबख्त अब तो वो भी मुकरने लगे हैं
जैसे अब तुम
सपनो में भी आने से
कतराने लगी हो…
पास आकर फिसल जाने लगी हो…
कुछ होता नहीं फिर भी कुछ तो होता है
जिसके न होने का अहसास रहा करता है
जैसे कुछ था जो नहीं है अब
चारों तरफ से सब कुछ
बस उस खालीपन
की तरफ बह रहा है
भरने को इसे
मगर…
कितने गहरे से निकल कर गयी हो तुम?
(रजनीश)
नवम्बर 10, 2013

दीवाना फिर पी के आया है…

lovers-001तेरे मिलने की तमन्ना है

लहू में इस तरह कुछ

जैसे गिर गयी हो खुल के

सिन्दूर की डिबिया

दूध भरे बर्तन में…

न अब सिन्दूर है…

न दूध है

ये जो भी है देखने में

गुलाबी है बहुत

लेकिन…

ऐसे जहरीले नशे से भरा…

जो उतरे न फिर

जो चढ़ जाए एक बार…

तेरे गुलाबी नर्म होठों का मधु-विष

पीया था मैंने एक बार बस यूँ ही…

‘प्यास से मरता जैसे कोई जल के धोखे  ज़हर  पी ले’

लड़खड़ा रहे हैं कदम दर-ब-दर अभी तक…

लोग कहते हैं  देखो दीवाना फिर

पी के आया है…

(रजनीश)

नवम्बर 8, 2013

चलो एक बार फिर से मिल जाएँ हम

मेरी  सारी  हसरतें…  lovers-001

सारी तमन्नाएँ…

मेरे सारे अरमान…

मेरे सारे सपने

सिल गए हैं …

अस्तित्व से तुम्हारे ही

तुम मेरे शब्-ओ-रोज़ के हर लम्हे में

देखे अनदेखे

ख्वाबों की चलती फिरती तस्वीर हो…

कहे अनकहे लफ़्ज़ों की जिंदा तासीर हो…

मैं शुरू होता हूँ

हर सुबह तुम से…

ख़त्म हो जाता हूँ हर शब तुम में ही…

ढूंढता रहता हूँ तुम्हारे  होठों का स्पर्श…

अपनी उँगलियों  के पोरों  में

तलाशती  रहती हैं आँखें सीने पे

तुम्हारी गर्म साँसों के निशाँ हर लम्हा…

अहसास तुम्हारी छुअन का जिंदा रहता है

मुझमे हर पल…

रखता है मुझे जिंदा हर पल…

आओ

दूरियां समेट दें अपने जिस्मों की हम

संगम हो

मेरे  तुम्हारे वजूद का

ऐसे कि

बहे ज़िन्दगी लहू में फिर से…

वैसे भी तो तुम्हारा प्यार गरम लावे सा

समेटे रखता है मुझे अपने में

बन के चादर गर्म अहसासों  की बिछा रहता है

पूरी तरह मुझ पे …

पूरी पूरी रात …

पूरा पूरा दिन…

(रजनीश)

नवम्बर 8, 2013

तिनकों का समाजवाद और पूंजीवाद

(1)

रोज की तरहstraw-001

कई-कई संकेत कर

आज भी अस्त हुआ

सूर्य!

कई तिनके बीने मैंने

तुमने भी कुछ तिनके उठाये

लोग भी थे

तिनके उठाते |

(2)

धरती बड़ी थी

जमीन उपजाऊ भी

कहीं बंजर भी

यदृच्छया लोग बिखेरे गये थे

बड़ी सी जमीन पर!

मौसम की हवा सर्द भी थी

गर्म भी!

बारिश की फुहारें भी थीं

ओले भी, बाढ़ भी!

सूरज भी पक्षपाती

गरम कहीं, नरम कहीं!

(3)

लोग भी भिन्न थे,

पता नहीं क्यों!

कुछ चपल, कुछ मद्धम

कुछ सुस्त, कुछ रेंगते से

एक ने कहा

तिनके बीनना है, लक्ष्य

यह खोज है,

संकेत है प्रगति का!

सब जुट गये,

‘अ’ ने, ‘ब’ ने, ‘स’ ने, ‘द’ ने

कई कई तिनके बीने

गट्ठर बनाए

(4)

तिनके बीनते बीनते,

एक ने पाया

कि,

इस तरह संतुलन बिगड रहा है

कुछ के पास तिनके ज्यादा हैं,

कुछ के पास कम

धरती भी कहीं तिनकों से पटी,

कहीं तिनका विहीन!

कई वाद चले,

तिनकों की ढेरियाँ बनती रहीं

बिगड़ती रहीं|

(5)

तिनकों का मूल्य क्या था?

तिनके क्या थे?

क्यों बीने गये?

कितने वृक्ष कटे?

कितने जंगल जले,

तिनकों के उत्पादन में?

तिनके तिनके थे,

चुभते भी थे,,

जलते भी थे|

(6)

तिनकों ने अपनी चुभन

अपनी जलन

उधार दी आदमी को

आदमी कभी न उतार सका

यह कर्ज!

ब्याज चक्रवृद्धि था

पुश्त दर पुश्त

बढ़ता गया…

(7)

आज फिर तुमने मुझसे बातें की

“‘युगल’

‘अ’ ने तिनके ज्यादा उठाये|”

मैंने मायूसी में सिर हिलाया

कोसा खुद को

चंद बातें की

मुट्ठी बांधी

कि,

कल हम अधिक तिनके उठाएंगे!

तिनके ही क्यों?

तिनके ही क्यों उठाएंगे

न तुम जानते थे,

न मुझे मालूम था|

Yugalsign1

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