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नवम्बर 11, 2013

कहाँ हैं इस किताब के खरीदार

किताबों से भरी दुकान थी –books-001

मेरी जेब खाली थीं

खाली जेब की उपयोगिता पढ़ी थी

कुछ किताबों में ही!

किताबें कई थीं –

सुन्दर, अच्छी, गंदी, फूहड़…

उस गंदे से आदमी ने खरीदी

एक गंदी सी किताब|

युवती ने पर्स खोलकर

 सुंदर किताबों के मूल्य चुकाए|

गंदे बहुत से,

किताबें भी …

उनके पास नोट थे,

कागज़ के मैले-कुचले, मुड़े-तुड़े

पर दुकानदार को तो नोट से मतलब था

ग्राहक को चित्रों से|

दूकान के बाहर मैंने चर्चा की “देश” की|

अच्छी किताब है, अच्छी किताब है, पर ‘मोटी’ है –

लोगों ने ‘हाँ’ भी की थी,

सब सहमत थे मुझसे –

फिर सब अपनी अपनी पसंद की किताबों

की तरफ बढ़ गये

कन्याओं के एक झुण्ड ने

सुंदर चित्रों वाली फैशन की किताबें खरीदीं

मैं…खड़ा रहा… गुमसुम…

मैं किताब न खरीद सका…

मेरी जेबें खाली थीं…

भरी जेबों ने वह किताब नहीं खरीदी!

शायद,

उन्हें मनोरंजन की तलाश थी!

Yugalsign1

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सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

मई 26, 2011

सुंदरता अभिशाप बना दी जाती है!

पँखों का महत्व
पिंजरे में कैद पंछी के लिए
अर्थहीन है,
उसकी घायल चोँच
आज़ादी का सपना लिए
लोहे के तारों से लड़ रही है।

दो पल बहलने का सामान है
पँखों के रुपहले रंग,
लहू टपकाती चोँचों का क्रंदन
मनमोहक लगता है
संवेदनहीन अहसास को।

सुंदरता सदा से अभिशाप है!

वरना क्यों हरम भरे जाते
कहाँ रनवासों में मुरझाते
बेमिसाल हुस्न?
अपने पौरुष का दंभ भरने वाले भूपति
नपुंसकों की टोलियों से
अश्गाहों की रखवाली क्यों करवाते?

आह!
किस तरह लुटे होंगे
मासूम अरमान!

आज भी रईसों की जामत
कमसिन सोंदर्य की
वही बाइज्ज़त खरीदार है,
कला का नाम देकर
नग्नता का नाच देख रही हैं
अय्याशों की मदमस्त आँखें।

ये उन्मुक्तता यदि प्रगति का पैमाना है
क्यों आत्महत्या कर लेती है
सफलतम मॉडल?

(रफत आलम)

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