Posts tagged ‘Ichchha’

फ़रवरी 16, 2017

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे…

छोटी मगर गहरे भाव और अर्थ अपने में समाहित की हुयी कविता का उदाहरण देखना हो तो प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल की कविता “जो मेरे घर नहीं आयेंगें” तुरंत सामने आ जाती है|

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा

एक उफनती नदी कभी नहीं आयेगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों  से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टान, तालाब

असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव – गाँव, जंगल- गलियाँ जाऊँगा|

जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फुरसत से नहीं

उनसे एक जरूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा|

(विनोद कुमार शुक्ल)

Advertisements
फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

जनवरी 11, 2014

ठूंठ जीवन

पतित है वह RKap-001

या कि चेतना उसकी

है सुप्त प्राय:

दिवस के प्रारम्भ से

अवसान तक

धुंधलका सा है

– सोच में भी

– कर्म में भी

-देह में भी

तिरती घटिकाएं

प्रात: की अरुनोदायी आभा

या कि तिमिर के उत्थान की बेला

शून्यता की चादर से हैं लिपटीं

सूनी आखों से तकती है

समय के रथ की ओर!

अल्हड यौवन की खिलखिलाहट

गोरे तन की झिलमिलाहट

युगल सामीप्य की उष्णता

युवा मानों की तरंगित उर्जस्विता

को-

सराहकर भी अनमना सा,

अन्यमनस्क शुतुरमुर्ग!

पहिये की रफ़्तार से

संचालित जीवन

जैसे कि हो पहिये ही का एक बिन्दु

एक वृत्ताकार पथ पर

अनवरत गतिमान

पर दिशाहीन!

– कोई इच्छा नहीं

– कोई संकल्प नहीं-कोई माया नहीं

-कोई आलोड़न नहीं

बस एक मशीन भर!

एहसास है कचोटता

जीवन चल तो रहा है

पर कहीं बुझ रही है आग

धीरे-धीरे, मर-मर कर

आत्मा की चमक

होती जाती है मंद

क्षण-प्रतिक्षण!

Yugalsign1

%d bloggers like this: