Posts tagged ‘bhav’

दिसम्बर 18, 2014

क्रूरता…

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगाkidcartoon
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अम्बुज)

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नवम्बर 20, 2013

लोअर माल रोड

आडू बेचता युवकfruit-001

खूब मोलभाव करता है-

चिथड़े कपडे,

तन मैला,

मेरी आँखों के दर्पण में :

अनरोमांटिक,

सुबह से शाम तक

ठण्डी सी इस सड़क के उजले कोने में|

अब,

उसकी बीवी

पास आ बैठ गई है

सहेजती है आड़ू

लाल-लाल ऊपर

पीली रंगत नीचे|

सड़क पर आवाजाही नहीं है

किसी गिरफ्तारी के विरोध में

बंद है बाजार

सन्नाटा है परसा,

हर ओर,

और उनके बीच भी|

Yugalsign1

मई 20, 2010

मातृत्व की विरासत

माँ,
क्या कभी भी बड़ी हो पाती है अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ?
क्यों उसके अन्दर आधुनिक जमाने की समझदारी नहीं आती?

बड़े होकर बच्चे अपनी अपनी राह पकड़ कर चल देते हैं
वे आगे चले जाते हैं अपनी जिन्दगी जीने
माँ को पीछे छोड़कर।

माँ जानती है इस बात को शुरु से
पर फिर भी वह क्यों नहीं अपनी जिन्दगी जीती?

वह तो खाना भी वही खाती है
जो उसके दूध के रास्ते बच्चे को नुकसान न पहुँचाये।

बड़े होते बच्चे इस बात को नहीं समझ पाते कि
माँ ने कितनी ही रातों की नींद त्याग दी थी
उन्हे शांति से सुलाने के लिये।

वे नहीं जान पाते इस बात को कि
माँ बिस्तर के उस हिस्से पर लेटी रहीं
जो उन्होने गिला किया था
और उन्हे सूखे में आराम से सुला दिया गया था।

जब भी प्रश्न बच्चों का आता है,
मेरा, अपना, सिर्फ मेरे लिये जैसे शब्दों से
हरदम घिरी रहने वाली दुनिया में
माँ ही क्यों इन शब्दों को महत्व नहीं देती?

इस रहस्य को लोग तब समझ पाते हैं
जब उनके अपने बच्चे हो जाते हैं
तब वे समझ पाते हैं कि
किसी माँ के लिये अपने
बच्चों के जीवन को ऊपजाऊ बनाने के लिये
खुद को खाद बनाने का मतलब क्या होता है?

…[राकेश]

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