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फ़रवरी 28, 2017

जंग न होने देंगें …अटल बिहारी बाजपेयी

gurmehar विश्व शांति के हम साधक हैं,
जंग न होने देंगे!
कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी,
खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी,
आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा,
एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी,
युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा,
मुँह में शांति,
बगल में बम,
धोखे का फेरा,
कफन बेचने वालों से कह दो चिल्लाकर,
दुनिया जान गई है उनका असली चेहरा,
कामयाब हो उनकी चालें,
ढंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हमें चाहिए शांति,
जिंदगी हमको प्यारी,
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी,
हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से,
आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी।
हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे जंग न होने देंगे।
भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई,
कितना महँगा सौदा,
रूसी बम हो या अमेरिकी,
खून एक बहना है।
जो हम पर गुजरी,
बच्चों के संग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
(अटल बिहारी बाजपेयी)

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फ़रवरी 9, 2015

प्यारे बच्चों…

प्यारे बच्चो, हम तुम्हारे काम नहीं आ सके । तुम चाहते थे हमारा क़ीमती
समय तुम्हारे खेलों में व्यतीत हो । तुम चाहते थे हम तुम्हें अपने खेलों
में शरीक करें । तुम चाहते थे हम तुम्हारी तरह मासूम हो जाएँ ।

प्यारे बच्चो, हमने ही तुम्हें बताया था जीवन एक युद्धस्थल है जहाँ
लड़ते ही रहना होता है । हम ही थे जिन्होंने हथियार पैने किये । हमने
ही छेड़ा युद्ध हम ही थे जो क्रोध और घृणा से बौखलाए थे । प्यारे
बच्चो, हमने तुमसे झूठ कहा था ।

यह एक लम्बी रात है । एक सुरंग की तरह । यहाँ से हम देख सकते
हैं बाहर का एक अस्पष्ट दृश्य । हम देखते हैं मारकाट और विलाप ।

बच्चो, हमने ही तुम्हें वहाँ भेजा था । हमें माफ़ कर दो । हमने झूठ कहा
था कि जीवन एक युद्धस्थल है ।

प्यारे बच्चो, जीवन एक उत्सव है जिसमें तुम हँसी की तरह फैले हो ।
जीवन एक हरा पेड़ है जिस पर तुम चिड़ियों की तरह फड़फड़ाते हो ।

जैसा कि कुछ कवियों ने कहा है जीवन एक उछलती गेंद है और
तुम उसके चारों ओर एकत्र चंचल पैरों की तरह हो ।

प्यारे बच्चो, अगर ऐसा नहीं है तो होना चाहिए ।

(मंगरेश डबराल)

दिसम्बर 18, 2014

क्रूरता…

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगाkidcartoon
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अम्बुज)

मई 18, 2014

पथहारा वक्तव्य… अशोक वाजपेयी

हमें पता थाashok vajpai-001

कि खाली हाथ और टूटे हथियार लिए

शिविर में लौटना होगा:

यह भी कि हम जैसे लोग

कभी जीत नहीं पाए-

वे या तो हारते हैं

या खेत रहते हैं-

हम सिर्फ बचे हुए हैं

इस शर्म से कि हमने चुप्पी नहीं साधी,

कि हमने मोर्चा सम्हालने से पहले या हारने के बाद

न तो समर्पण किया, न समझौता:

हम लड़े, हारे और बचे भर हैं!

यह कोई वीरगाथा नहीं है:

इतिहास विजय की कथाएं कहता है,

उसमें प्रतिरोध और पराजय के लिए जगह नहीं होती।

लोग हमारी मूढ़ता पर हंसते हैं-

हमेशा की तरह

वे विजेताओं के जुलूस में

उत्साह से शामिल हैं-

हम भी इस भ्रम से मुक्त होने की कोशिश में हैं

कि हमने अलग से कोई साहस दिखाया:

हम तो कविता और अंत:करण के पाले में रहे

जो आदिकाल से युद्धरत हैं, रहेंगे!

हम पथहारे हैं

पर पथ हमसे कहीं आगे जाता है।

 

[अशोक वाजपेयी)

 

साभार : जनसत्ता

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