Posts tagged ‘Christian’

फ़रवरी 26, 2015

ओशो : मदर टेरेसा और उनके कार्यों का विश्लेषण

Osho kidमदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार मिलने पर ओशो ने मदर टेरेसा के कार्यों का विश्लेषण किया था, जिससे मदर टेरेसा और उनके समर्थक नाराज हो गये थे| मदर ने दिसम्बर 1980 के दिसंबर माह के अंत में ओशो को पत्र लिखा| उस पर ओशो का प्रवचन :-

राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए हैं| राजनेता बाह्य जगत पर राज जमाने की कोशिश करता है और पादरी मनुष्य के अंदुरनी जगत पर|   इन् दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें मिलकर की हैं| कई बार तो अपने अंजाने ही इन् लोगों ने ऐसे कार्य किये हैं| इन्हे खुद नहीं पता होता ये क्या कर रहे हैं| कई बार इनकी नियत नहीं होती गलत करने की पर चेतना से रहित उनके दिमाग क्या सुझा सकते हैं?

अभी हाल में मदर टेरेसा ने मुझे एक पत्र लिख भेजा| मुझे उनके पत्र की गंभीरता पर कुछ नहीं कहना,  उन्होंने निष्ठा से भरे शब्दों से पत्र लिखा है, पर यह चेतना रहित दिमाग की उपज है| उन्हें स्वयं नहीं ज्ञात है कि वे क्या लिख रही हैं| उनका लिखना यांत्रिक है, जैसे रोबोट ने लिख दिया हो|

वे लिखती हैं,” मुझे अभी आपके भाषण की कटिंग मिली| मुझे आपके लिए बेहद खेद हुआ कि आप ने ऐसा कहा (सन्दर्भ – नोबल पुरस्कार)| आपने मेरे नाम के साथ जो विशेषण इस्तेमाल किये उनके लिए मैं पूरे प्रेम से आपको क्षमा करती हूँ|”

वे मेरे प्रति खेद महसूस कर रही हैं…मुझे उनका पत्र पढकर आनंद आया! उन्होंने मेरे दवारा उपयोग में लाये गये विशेषणों को समझा ही नहीं| लेकिन वे चेतन नहीं हैं वरना वे अपने प्रति खेद महसूस करतीं मेरे प्रति नहीं|

उन्होंने मेरे भाषण की कटिंग भी अपने पत्र के साथ भेजी है मैंने जो विशेषण इस्तेमाल किये थे, वे थे –  धोखेबाज ( deceiver), कपटी (charlatan) और पाखंडी या ढोंगी (hypocrite)….

मैंने उनकी आलोचना की थी और कहा था कि उन्हें नोबल पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था| और इस बात को उन्होंने अन्यथा ले लिया| अपने पत्र में वे लिखती हैं “सन्दर्भ : नोबल पुरस्कार”|

यह आदमी, नोबल, दुनिया के सबसे बड़े अपराधियों में से एक था| पहला विश्वयुद्ध उसके हथियारों से लड़ा गया था, वह हथियारों का बहुत बड़ा निर्माता था…

मदर टेरेसा नोबल पुरस्कार को मना नहीं कर सकीं| प्रशंसा पाने की चाह, सारे विश्व में सम्मान पाने की चाह, नोबल पुरस्कार तुम्हे सम्मान दिलवाता है, सो उन्होंने पुरस्कार सहर्ष स्वीकार किया…

इसलिए मैंने मदर टेरेसा जैसे व्यक्तियों को धोखेबाज (deceivers) कहा| वे जानबूझ धोखा नहीं देते, निश्चित ही उनकी नियत धोखा देने की नहीं है, लेकिन यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, अंतिम परिणाम स्पष्ट है| ऐसे लोग समाज में लुब्रीकेंट का कार्य करते हैं ताकि समाज के पहिये, शोषण का पहिया, अत्याचार का पहिया यूँ ही आसानी से घूमता रहे| ये लोग न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी धोखा दे रहे हैं|

और मैं ऐसे लोगों को कपटी (charlatans) भी कहता हूँ, क्योंकि एक सच्चा धार्मिक आदमी, जीसस जैसा आदमी, नोबल पुरस्कार पायेगा?  असंभव है यह! क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि सुकरात को नोबल पुरस्कार दिया जाए, या कि अल-हिलाज मंसूर को इस पुरस्कार से नवाजे सत्ता? अगर जीसस को नोबल नहीं मिल सकता, और सुकरात को नोबल नहीं मिल सकता, और ये लोग सच्चे धार्मिक, चेतन मनुष्य हैं, तब मदर टेरेसा कौन हैं? …

सच्चा धार्मिक व्यक्ति विद्रोही होता है, समाज उसकी आलोचना करता है, निंदा करता है|जीसस को समाज ने अपराधी करार दिया और मदर टेरेसा को संत कह रहा है| यह बात विचारणीय है, अगर मदर टेरेसा सही हैं तो जीसस अपराधी हैं और अगर जीसस सही हैं तो मदर टेरेसा एक कपटी मात्र हैं उससे ज्यादा कुछ नहीं| कपटी लोगों को समाज बहुत सराहता है क्योंकि ये लोग समाज के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, समाज की जैसी भ्रष्ट व्यवस्था चली आ रहे एहोती है उसे वैसे ही चलने देने में ये लोग बड़ी भूमिका निभाते हैं|

Mother Teresa मैंने जो भी विशेषण इस्तेमाल किये वे सोच समझ कर इस्तेमाल किये| मैंने बिना विचारे कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करता| और मैंने पाखंडी या ढोंगी (hypocrites) शब्द का इस्तेमाल किया| ऐसे लोग पाखंडी हैं क्योंकि इनकी आधारभूत जीवन शैली बंटी हुयी है, सतह पर एक रूप और अंदर कुछ और रूप|

वे लिखती हैं,” ‘प्रोटेस्टेंट परिवार को बच्चा गोद लेने से इसलिए नहीं रोका गया था कि वे प्रोटेस्टेंट थे बल्कि इसलिए कि उस समय हमारे पास कोई बच्चा नहीं था जो हम उन्हें गोद दे सकते थे”|

अब उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए दिया गया है कि वे हजारों अनाथों की सहायता करती हैं और उनकी संस्था में हजारों अनाथालय हैं| अचानक उनके अनाथालय में एक भी बच्चा उपलब्ध नहीं रहता? और भारत में कभी ऐसा हो सकता है कि अनाथ बच्चों का अकाल पड़ जाए? भारतीय तो जितने चाहो उतने अनाथ बच्चे जन्मा सकते हैं बल्कि जितने तुम चाहो उससे भी कहीं ज्यादा!

और उस प्रोटेस्टेंट परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था| यदि एक भी अनाथ बच्चा उपलब्ध नहीं था और उनके सारे अनाथालय खाली हो गये थे तो मदर टेरेसा सात सौ ननों का क्या कर रही हैं? इन ननों का काम क्या है? सात सौ ननें? वे किसकी माताओं की भूमिका निभा रही हैं? एक भी अनाथ बच्चा नहीं – अजीब बात है! – और वो भी कलकत्ता में!  सड़क पर कहीं भी तुम्हे अनाथ बच्चे दिखाई दे जायेंगे – तुम्हे कूड़ेदान तक में बच्चे मिल सकते हैं| उन्हें सिर्फ बाहर देखने की जरुरत थी और उन्हें बहुत से अनाथ बच्चे मिल जाते| तुम आश्रम से बाहर जाकर देखना, अनाथ बच्चे मिल जायेंगें| तुम्हे खोजने की भी जरुरत नहीं, वे अपने आप आ जायेंगें!

अचानक उनके अनाथालय में अनाथ बच्चे नहीं मिलते|… और अगर उस परिवार को एकदम से इंकार किया जाता तब भी बात अलग हो जाती| लेकिन परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था, उनसे कहा गया था,”हाँ, आपको बच्चा मिल सकता है, आवेदन पत्र भर दीजिए”|  आवेदन पत्र भरा गया था| जब तक कि परिवार ने अपने सम्प्रदाय का नाम जाहिर नहीं किया था तब तक उनके लिए बच्चा उपलब्ध था पर जैसे ही उन्होने आवेदन पत्र में लिखा कि वे प्रोटेस्टेंट चर्च को माने वाले मत के हैं, अचानक से मदर टेरेसा की संस्था के अनाथालयों में अनाथ बच्चों की किल्लत हो गयी, बल्कि अनुपस्थिति हो गयी|

और असली कारण प्रोटेस्टेंट परिवार को बताया पर कैसे? अब यही पाखण्ड है! यही धोखेबाजी है| यह गन्दगी से भरा है|  कारण भी उन्हें इसलिए बताना पड़ता है क्योंकि बच्चे वहाँ थे अनाथालयों में| कैसे कहते कि अनाथ बच्चे नहीं हैं? उनकी तो हरदम प्रदर्शनी लगी रहती है वहाँ|

उन्होंने मुझे भी आमंत्रित किया है: आप किसी भी समय आ सकते हैं और आपका स्वागत है हमारे अनाथालय और हमारी संस्था देखने आने के लिए| उनका सदैव ही प्रदर्शन किया जाता है|

बल्कि, उस प्रोटेस्टेंट परिवार ने पहले ही एक अनाथ बच्चे का चुनाव कर लिया था| अतः वे कह नहीं पायीं ,” हमें खेद है, बच्चे नहीं हैं अनाथालय में”|

उन्होंने परिवार से कहा.” इन अनाथ बच्चों को रोमन कैथोलिक चर्च के रीति रिवाजों और विधि विधान के मुताबिक़ पाला पोसा गया है, और इनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए यह बहुत बुरा होगा अगर उन्हें इस परम्परा से अलग हटाया गया| आपको उन्हें गोद देने का असर उन पर यह पड़ेगा कि उनके विकास की गति  छिन्न भिन्न हो जायेगी| हम उन्हें आपको गोद नहीं दे सकते क्योंकि आप प्रोटेस्टेंट हैं|”

वही असली कारण था| और बच्चा गोद लेने का इच्छुक परिवार कोई मूर्ख नहीं था| पति यूरोपियन यूनिवर्सिटी में प्रोफसर है – और वह स्तब्ध रह गया, उसकी पत्नी स्तब्ध रह गयी| वे इतनी दूर से बच्चा गोद लेने आए थे पर उन्हें इंकार कर दिया गया क्योंकि वे प्रोटेस्टेंट थे| यदि उन्होंने आवेदन पत्र में ‘कैथोलिक’ लिखा होता तो उन्हें तुरंत बच्चा मिल जाता| परिवार

एक और बात समझ लेने की है : ये बच्चे मूलभूत रूप से हिंदू हैं| अगर मदर टेरेसा को इन बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास और हित की इतनी चिंता है तो इन बच्चों का पालन पोषण हिंदू धर्म के अनुसार करना चाहिए| पर उन्हें कैथोलिक चर्च के अनुसार पाला गया है| और इस सबके बद उन्हें प्रोटेस्टेंट परिवार को गोद देना, और प्रोटेस्टेंट कोई बहुत अलग नहीं है कैथोलिक लोगों से| क्या अंतर है कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में? केवल कुछ मूर्खतापूर्ण अंतर… !

कुछ ही रोज पहले भारतीय संसद में धर्म की स्वतंत्रता के ऊपर एक बिल प्रस्तुत किया गया| बिल प्रस्तुत करने के पीछे उद्देश्य था कि किसी को भी अन्यों का धर्म बदलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए : जब तक कि कोई अपनी मर्जी से अपना धर्म छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाना न चाहे| और मदर टेरेसा पहली थीं जिन्होने इस बिल का विरोध किया| अब तक के अपने पूरे जीवन में उन्होंने कभी किसी बात का विरोध नहीं किया, यह पहली बार था और शायद अंतिम बार भी| उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और उनके और प्रधानमंत्री के बीच एक विवाद उत्पन्न हो गया| उन्होंने कहा,” यह बिल किसी भी हालत में पास नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से हमारे काम के खिलाफ जाता है| हम लोगों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और लोग केवल तभी बचाए जा सकते हैं जब वे रोमन कैथोलिक बन जाएँ”|

उन्होंने सारे देश में इतना हल्ला मचाया – और राजनेता तो वोट की फिराक में रहते ही हैं, वे ईसाई मतदाताओं को नाराज करने का ख़तरा नहीं उठा सकते थे – सो बिल को गिर जाने दिया गया| बिल को भुला दिया गया…

यदि मदर टेरेसा सच में ही ईमानदार हैं और वे यह विश्वास रखती हैं कि किसी व्यक्ति का मत परिवर्तन करने से उसका मनोवैज्ञानिक ढांचा छिन्न भिन्न हो जाता है तो उन्हें मूलभूत रूप में मत-परिवर्तन के खिलाफ होना चाहिए| कोई अपनी इच्छा से अपना मत बदल ले तो बात अलग है|

अब उदाहरण के लिए तुम स्वयं मेरे पास आए हो, मैं तुम्हारे पास नहीं गया| मैं तो अपने दरवाजे से बाहर भी नहीं जाता…

मैं किसी के पास नहीं गया, तुम स्वयं मेरे पास आए हो| और मैं तुम्हे किसी और मत में परिवर्तित भी नहीं कर रहा हूँ| मैं यहाँ कोई विचारधारा भी स्थापित नहीं कर रहा हूँ| मैं तुम्हे कैथोलिक चर्च के catechism के एतारह धार्मिक शिक्षा की प्रश्नोत्तरी भी नहीं दे रहा,  किसी किस्म का कोई वाद नहीं दे रहा| मैं तो सिर्फ मौन हो सकने में सहायता प्रदान कर रहा हूँ| अब, मौन न तो ईसाई है, न मुस्लिम, और न ही हिंदू ; मौन तो केवल मौन है| मैं तो तुम्हे प्रेममयी होना सिखा रहा हूँ, प्रेम न ईसाई है न हिंदू, और न ही मुस्लिम| मैं तुम्हे जाग्रत होना सिखा रहा हूँ| चेतनता सिर्फ चेतनता ही है इसके अलावा और कुछ नहीं और यह किसी की बपौती नहीं है| चेतनता को ही मैं सच्ची धार्मिकता कहता हूँ|

मेरे लिए मदर टेरेसा और उनके जैसे लोग पाखंडी हैं, क्योंकि वे कहते एक बात हैं, पर यह सिर्फ बाहरी मुखौटा होता है क्योंकि वे करते दूसरी बात हैं| यह पूरा राजनीति का खेल है – संख्याबल की राजनीति|

और वे कहती हैं,” मेरे नाम के साथ आपने जो विशेषण इस्तेमाल किये हैं उनके लिए मैं आपको प्रेम भरे ह्रदय के साथ क्षमा करती हूँ”| पहले तो प्रेम को क्षमा की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि प्रेम क्रोधित होता ही नहीं| किसी को क्षमा करने के लिए तुम्हारा पहले उस पर क्रोधित होना जरूरी है|

मैं मदर टेरेसा को क्षमा नहीं करता, क्योंकि मैं उनसे नाराज नहीं हूँ| मैं उन्हें क्षमा क्यों करूँ? वे भीतर से नाराज होंगीं…| इसीलिये मैं तुमको इन बातों पर ध्यान लगाने के लिए कहना चाहता हूँ| कहते हैं, बुद्ध ने कभी किसी को क्षमा नहीं किया, क्योंकि साधारण सी बात है कि वे किसी से कभी भी नाराज ही नहीं हुए| क्रोधित हुए बिना तुम कैसे किसी को क्षमा कर सकते हो? यह असंभव बात है| वे क्रोधित हुए होंगीं| इसी को मैं अचेतनता कहता हूँ, उन्हें इस बात का बोध ही नहीं कि वे असल में लिख क्या रही हैं…उन्हें भान भी नहीं है कि मैं उनके पत्र के साथ क्या करने वाला हूँ!

वे कहती हैं,” ‘मैं महान प्रेम के साथ आपको क्षमा करती हूँ’ – जैसे कि प्रेम भी छोटा और महान होता है| प्रेम तो प्रेम है, यह न तो तुच्छ हो सकता है और न ही महान| तुम्हे क्या लगता है कि प्रेम गणनात्मक है? यह कोई मापने वाली मुद्रा है?- एक किलो प्रेम, दो किलो प्रेम| कितने किलो का प्रेम महान प्रेम हो जाता है? या कि टनों प्रेम चाहिए?

प्रेम गणनात्मक नहीं वरन गुणात्मक है और गुणात्मक को मापा नहीं जा सकता| न यह गौण है न ही महान| अगर कोई तुमसे कहे, “ मैं तुमसे बड़ा महान प्रेम करता हूँ|” तो सावधान हो जाना| प्रेम तो बस प्रेम है, न उससे कम न उससे ज्यादा|

और मैंने कौन सा अपराध किया है कि वे मुझे क्षमादान दे रही हैं? कैथोलिक्स की मूर्खतापूर्ण पुरानी परम्परा- और वे क्षमा करे चली जाती हैं! मैंने तो किसी अपराध को स्वीकार नहीं किया फिर उन्हें मुझे क्यों क्षमा करना चाहिए?

मैं इस्तेमाल किये गये विशेषणों पर कायम हूँ, बल्कि मैं कुछ और विशेषण उनके नाम के साथ जोड़ना पसंद करूँगा – कि वे मंद और औसत बुद्धि की मालकिन हैं, बेतुकी हैं| और अगर किसी को क्षमा ही करना है तो उन्हे ही क्षमा किया जाना चाहिए क्योंकि वे एक बहुत बड़ा पाप कर रही हैं| अपने पत्र में वे कहती हैं,” मैं गोद लेने की परम्परा को अपना कर गर्भपात के पाप से लड़ रही हूँ”| अब आबादी के बढते स्तर से त्रस्त काल में गर्भपात पाप नहीं है बल्कि सहायक है आबादी नियंत्रित रखने में| और अगर गर्भपात पाप है तो पोलोक पोप और मदर टेरेसा और उनके संगठन उसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि ये लोग गर्भ-निरोधक संसाधनों के खिलाफ हैं, वे जन्म दर नियंत्रित करने के हर तरीके के खिलाफ हैं, वे गर्भ-निरोधक पिल्स के खिलाफ हैं| असल में यही वे लोग हैं जो गर्भपात के लिए जिम्मेदार हैं| गर्भपात की स्थिति लाने के सबसे बड़े कारण ऐसे लोग ही हैं| मैं इन्हे बहुत बड़ा अपराधी मानता हूँ!

बढ़ती आबादी से ग्रस्त धरती पर जहां लोग भूख से मर रहे हों, वहाँ गर्भ-निरोधक पिल का विरोध करना अक्षम्य है| यह पिल आधुनिक विज्ञान का अक बहुत बड़ा तोहफा है आज के मानव के लिए| यह पिल धरती को सुखी बनाने में सहायता कर सकती है|

मैं गरीब लोगों की सेवा नहीं करना चाहता, मैं उनकी मैं गरीबी को समाप्त करके उन्हें समर्थ बनाना चाहूँगा| बहुत हो चुकीं ऐसी बेतुकी बातें| मेरी रूचि उन्हें गरीब बनाए रखने में नहीं है जिससे कि मैं उनकी सेवा करके लोगों की निगाह में पुण्य कमाऊं| उनकी गरीबी दूर होना मेरे लिए ज्यादा आनंद का विषय है| दस हजार सालों से मूर्ख गरीब लोगों की सेवा करते आए हैं पर इससे कुछ नहीं बदला| अब हमारे पास समर्थ टैक्नोलौजी हैं जिससे हम गरीबी समाप्त करने में सफलता पा सकें|

तो अगर किसी को क्षमा किया जाना चाहिए तो इसके पात्र ये लोग हैं| पोप, मदर टेरेसा, आदि इत्यादी लोगों को क्षमा किया जाना चाहिए| ये लोग अपराधी हैं पर इनका अपराध देखने समझने के लिए तुम्हे बहुत बड़ी मेधा और सूक्ष्म बुद्धि चाहिए|

और ज़रा इनका अहंकार देखिये, दूसरों से बड़ा होने का अहं| वे कहती हैं,”मैं तुम्हे क्षमा करती हूँ, मुझे तुम्हारे लिए बड़ा खेद है”| और वे प्रार्थना करती हैं,” ईश्वर की अनुकम्पा आपके साथ हो और आपका ह्रदय प्रेम से भर जाए”|

बकवास है यह सब!

मैं किसी ऐसे ईश्वर में विश्वास नहीं करता जो मानव जैसा होगा, जब ऐसा ईश्वर है ही नहीं तो वह कृपा कैसे करेगा मुझ पर या किसी और पर? ईश्वरत्व को केवल महसूस किया जा सकता है, ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है जिसे पाया जा सके या जीता जा सके| यह तुम्हारी ही शुद्धतम चेतनता है| और ईश्वर को मुझ पर कृपा क्यों करनी चाहिए? मैं ही तुम्हारी कल्पना के सारे ईश्वरों पर कृपा बरसा सकता हूँ| मुझे किसी की कृपा के लिए प्रार्थना क्यों करनी चाहिए? मैं पूर्ण आनंद में हूँ मुझे किसी कृपा की आवश्यकता है ही नहीं| मुझे विश्वास ही नहीं है कि कहीं कोई ईश्वर है| मैंने तो हर जगह देख लिया मुझे कहीं ईश्वर के होने के लक्षण नजर नहीं आए| यह ईश्वर केवल सत्य से अंजान लोगों के दिमाग में वास करता है| ध्यान रखना मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर मैं आस्तिक भी नहीं हूँ|

ईश्वर मेरे लिए कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक उपस्थिति है, जिसे केवल ध्यान की उच्चतम और सबसे गहरी अवस्था में ही महसूस किया जा सकता है| उन्ही क्षणों में तुम्हे सारे अस्तित्व में बहता ईश्वरत्व महसूस होता है| कोई ईश्वर कहीं नहीं है लेकिन ईश्वरत्व है!

मैं गौतम बुद्ध के बारे में कहे गये H. G. Wells के बयान को प्रेम करता हूँ| उसने कहा था,” गौतम बुद्ध सबसे बड़े ईश्वररहित व्यक्ति हैं लेकिन साथ ही वे सबसे बड़े ईश्वरीय व्यक्ति हैं|

यही बात तुम मेरे बारे में कह सकते हो: मैं इश्वर्राहित व्यक्ति हूँ लेकिन मैं ईश्वरीयता को जानता हूँ|

ईश्वरीयता एक सुगंध जैसी है, परम आनंद का अनुभव, परम स्वतंत्रता का अनुभव| तुम ईश्वरीयता के सामने प्रार्थना नहीं कर सकते| तुम इसका चित्र नहीं बना सकते| तुम यह नहीं कह सकते – कि ईश्वर तुम्हारा भला करे- और ऐसा तो खास तौर पर नहीं कह सकते – कि ईश्वर की कृपा तुम्हारे साथ रहें पूरे 1981 के दौरान! तब 1982 का क्या होगा?

महान साहस! महान साझेदारी! ऐसी उदारता!

“…और तुम्हारा ह्रदय प्रेम से भर जाए”| मेरा ह्रदय प्रेम के अतिरेक से पहले ही भरा हुआ है| इसमें किसी और के प्रेम के लिए जगह बची ही नहीं| और मेरा ह्रदय किसी और के प्रेम से क्यों भरे? उधार का प्रेम किसी काम का नहीं| ह्रदय की अपनी सुगंध होती है|

लेकिन इस तरह की बकवास को बहुत धार्मिक माना जाता है| वे इस आशा से यह सब लिख रही हैं कि मैं उन्हें बहुत बड़ी धार्मिक मानूंगा| लेकिन जो मैं देख पा रहा हूँ वे एक बेहद साधारण, औसत इंसान हैं जो कि आप कहीं भी पा सकते हैं| औसत लोगों से अटी पड़ी है धरती|

मैं उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारता रहा हूँ पर मुझे उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारना बंद करना चाहिए क्योंकि हालांकि मैं कतई सज्जन नहीं हूँ पर मुझे समुचित जवाब तो देना ही चाहिए| उन्होंने मुझे लिखा है- मि. रजनीश, तो अब से मुझे भी उन्हें मिस टेरेसा कह कर संबोधित करना चाहिए| यही सज्जनता भरा व्यवहार होगा|

अहंकार पिछले दरवाजे से आ जाता है| इसे बाहर निकाल फेंकने का प्रयत्न मत करो|

कलकत्ते से मुझे एक न्यूज-कटिंग मिली है| पत्रकार ने बताया कि वह मदर टेरेसा के बारे में मेरे बयान – कि वे बेतुकी हैं- की कटिंग लेकर मदर टेरेसा के पास गया और वे कटिंग देखते ही गुस्से में आग बबूला हो गयीं और उन्होंने कटिंग फाड़ कर फेंक दी| वे इतनी क्रोधित थीं कि कोई बयान देने के लिए तैयार नहीं हुईं| पर बयान तो उन्होने दे दिया- कटिंग को फाड़ कर|

पत्रकार ने कहा,” मैं तो हैरान हो गया उनका बर्ताव देखकर| मैंने उनसे कहा कि कटिंग तो मेरी थी और मैं तो उस बयान पर उनकी प्रतिक्रिया जानने उनके पास गया था”|

और ये लोग समझते हैं कि वे धार्मिक हैं| वास्तव में कटिंग फाड़ कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मैंने जो कुछ उनके बारे में कहा था वह सही था : कि वे औसत और बेतुकी हैं| अब कटिंग फाड़ना एक बेतुकी बात है|

अब मुझे तो दुनिया भर से इतने ज्यादा कॉम्प्लीमेंट्स – “इनवर्टेड कौमाज़” वाले- मिलते हैं कि अगर मैं उन सबको फाड़ने लग जाऊं तो मेरी तो अच्छी खासी एक्सरसाइज इसी हरकत में हो जाए और तुम्हे पता ही है एक्सरसाइज मुझे कितनी नापसंद है|

 

(अंग्रेजी प्रवचन से अनुवादित)

मई 5, 2014

मोदी और दलित : प्रो. तुलसी राम

 Modi IT Senaसैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।

मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।

इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।

मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।

सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया।

नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।

इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

Modi media ambaniइस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।

गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस

हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।

इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।ModiVsUPA

मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए।

उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं।

इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

प्रसिद्द  दलित चिंतक प्रो. तुलसी राम, अपनी आत्मकथा “मुर्दहिया” के कारण भी सर्वत्र जाने जाते हैं|

साभार : जनसत्ता (4 मई, 2014)

जून 2, 2013

ओशो : यशपाल (वामपंथी लेखक)

Osho Yashpalमेरे एक कम्यूनिस्ट मित्र थे- वे वास्तव में बड़े बौद्धिक थे| उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखीं, सौ के आसपास, और सारी की सारी कम्यूनिस्ट थीम से भरी हुई, पर अपरोक्ष रूप से ही, वे उपन्यासों के माध्यम से यह करते थे|  वे अपने उपन्यासों के माध्यम से कम्यूनिस्म का प्रचार करते थे और इस तरीके से करते कि तुम उपन्यास से प्रभावित होकर कम्यूनिज्म की तरफ मुड जाओ| उनके लिखे उपन्यास प्रथम श्रेणी के हैं, वे बहुत अच्छे रचनात्मक लेखक थे, लेकिन उनके लिखे का अंतिम परिणाम यही होता है कि वे तुम्हे कम्यूनिज्म की तरफ खींच रहे होंगे|

उनका नाम ‘यशपाल’ था| मैंने उनसे कहा,”यशपाल, आप हरेक रिलीजन के खिलाफ हो” – और कम्यूनिज्म हर रिलीजन के खिलाफ है, यह नास्तिक दर्शन है, ” लेकिन जिस तरह आप व्यवहार करते हो और अन्य कम्यूनिस्ट लोग व्यवहार करते हैं वह सीधे-सीधे यही सिद्ध करता है कि कम्यूनिज्म भी एक रिलीजन ही है|”
उन्होंने पूछा,” आपका मतलब क्या है?”

मैंने कहा,” मेरे कहने का तात्पर्य सीधा सा है कि आप भी उतने ही कट्टर हो जितना कि कोई भी मुसलमान, या ईसाई हो सकता है| आपके अपने त्रिदेव हैं : मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन| आपकी अपनी मक्का है – मास्को, आपका अपना काबा है – क्रेमलिन, आपकी अपनी पवित्र किताब है – दस केपिटल, और हालांकि ‘दस केपिटल’ सौ साल पुरानी हो चुकी है पर आप तैयार नहीं हैं उसमे एक भी शब्द का हेरफेर करने के लिए| सौ साल में अर्थशास्त्र पूरी तरह बदल गया है, ‘दस केपिटल’ पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुकी है|”

वे तो लड़ने को तैयार हो गये|

मैंने कहा,” यह लड़ने का प्रश्न नहीं है| यदि आप मुझे मार भे डालते हैं तब भी यह सिद्ध नहीं होगा कि आप सही हैं| वह सीधे सीधे यही सिद्ध करेगा कि मैं सही था और आप मेरे अस्तित्व को सह नहीं पाए| आप मुझे तर्क दें|”

“कम्यूनिज्म के पास कोई तर्क नहीं हैं|”

मैंने उनसे कहा,” आपका पूरा दर्शन एक विचार पर आधारित है कि पूरी मानव जाति एक समान है| यह मनोवैज्ञानिक रूप से गलत है| सारा मनोविज्ञान कहता है कि हरेक व्यक्ति अद्वितीय है| अद्वितीय कैसे एक जैसे हो सकते हैं?”
लेकिन कम्यूनिज्म कट्टर है| उन्होंने मुझसे बात करनी बंद कर दी| उन्होंने मुझे पत्र लिखने बंद कर दिए| मैं मैं उनके शहर लखनऊ से गुजरकर जाया करता था और वे स्टेशन पर मुझसे मिलने आया करते थे, अब उन्होंने स्टेशन पर आकर मिलना बंद कर दिया|

जब उन्होंने मेरे कई पत्रों का जवाब नहीं दिया तो मैंने उनकी पत्नी को पत्र लिखा| वे एक सुलझी और स्नेहमयी महिला थीं| उन्होंने मुझे लिखा,”आप समझ सकते हैं| मुझे आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि वे एक कट्टर व्यक्ति हैं| और आपने उनकी सबसे बड़ी कमजोरी को छू दिया है| यहाँ तक कि मैं भी सचेत रहती हूँ कि कम्यूनिज्म के खिलाफ कुछ न बोलूं| मैं कुछ भी कर सकती हूँ| उनके खिलाफ कुछ भी कह सकती हूँ| पर मुझे कम्यूनिज्म के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि वे यह स्वीकार ही नहीं कर सकते कि कोई कम्यूनिज्म के खिलाफ भी हो सकता है|”
यशपाल ने एक बार मुझसे कहा,” हम सारे संसार को नियंत्रित करने जा रहे हैं|”

मैंने कहा'”आपका लक्ष्य छोटा है, यह पृथ्वी तो बहुत छोटी है| आप मेरे लक्ष्य में क्यों नहीं भागीदार बन जाते?”

उन्होंने पूछा,” आपका लक्ष्य क्या है?”

मैंने कहा,” मेरा लक्ष्य बहुत साधारण है| मैं तो एक साधारण रूचि का व्यक्ति हूँ और बहुत आसानी से संतुष्ट हो जाता हूँ| मैं तो केवल ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने जा रहा हूँ| इतनी छोटी पृथ्वी की क्या चिंता करनी, यह तो ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा हिस्सा भर है| इसके बारे में चिंता क्या करनी|”

लेकिन कम्यूनिस्ट इस बात में विश्वास रखते हैं कि वे सारी पृथ्वी को अपने कब्जे में कर लेंगे| आधी पृथ्वी को उन्होंने कर ही लिया है|

उनकी कट्टरता अमेरिका को कट्टर ईसाई बनाएगी| यही अमेरिकियों को एकमात्र विकल्प लगेगा लेकिन उन्हें नहीं पता कि कम्यूनिज्म से बचे रह सकते हैं पर कट्टर ईसाइयत से बचना मुश्किल है|

एक खतरे से बचने के लिए तुम ज्यादा बड़े खतरे में गिर रहे हो|

खुद को और पूरे संसार को कम्यूनिज्म से बचाने का एक उपाय है और अति सरल उपाय है| लोगों को और ज्यादा धनी बना दो| गरीबी को मिट जाने दो| गरीबी मिट जाने के साथ ही कम्यूनिज्म भी मिट जाएगा| 

सितम्बर 7, 2011

हिंदू, मुस्लिम सिख, ईसाई – आदमी कहाँ है भाई?

हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में

रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में

नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में

वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में

अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में

साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में

निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में

जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में

फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में

पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है  अब भी उड़ानों में

सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में

असीर -कैदी

(रफत आलम)

 

%d bloggers like this: