Posts tagged ‘Mahatma Gandhi’

अगस्त 9, 2016

रूरल डेवेलपमेंट … (महात्मा गाँधी)

“भारत गाँवों में बसता है, अगर गाँव नष्ट होते हैं तो भारत भी नष्ट हो जायेगा|

इंसान का जन्म जंगल में रहने के लिए नहीं हुआ बल्कि समाज में रहने के लिए हुआ है|

एक आदर्श समाज की आधारभूत ईकाई के रूप में हम एक ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं जो कि अपने आप में तो स्व-निर्भरता से परिपूर्ण हो, पर जहां लोग पारस्परिक निर्भरता की डोर से बंधे हुए हों| इस तरह का विचार पूरे संसार में फैले मानवों के बीच एक संबंध कायम करने की तस्वीर प्रस्तुत करता है|

ऐसा कुछ भी शहरों को उत्पादित करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए जो कि हमारे गाँव उत्पादित कर सकते हों|

स्वतंत्रता बिल्कुल नीचे के पायदान से आरम्भ होनी चाहिए|

और इसीलिए हरेक गाँव को स्व:निर्भर होना ही चाहिए और इसके पास अपने सभी मामले स्वंय ही सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए|

गांवों की ओर लौटना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है|

मेरा आदर्श गाँव मेरी कल्पना में वास करता है|

एक ग्रामीण को ऐसे जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए जैसे किसी मलिन अँधेरे कमरे में कोई जानवर रहता है|

मेरे आदर्श गाँव में मलेरिया, हैजा और चेचक जैसी बीमारियों के लिए कोई जगह नहीं होगी| वहाँ कोई भी सुस्ती, काहिली से घिरा और ऐश्वर्य भोगने वाला जीवन नहीं जियेगा|

मेरा स्पष्ट विचार है कि यदि भारत को सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और भारत के माध्यम से पूरे संसार को सच्ची स्वतंत्रता का स्वाद चखना है तो हमें गाँवों में झोंपडों में ही रहना होगा न कि महलों में|

गाँव की पंचायत स्थानीय सरकार चलाएगी| और इनके पास पूर्ण अधिकार होंगे| पंचायत के पास जितने ज्यादा अधिकार होंगे उतना लोगों के लिए अच्छा होगा|

पंचायतों का दायित्व होगा कि वे ईमानदारी कायम करें और उधोगों की स्थापना करें|

पंचायत का कर्तव्य होगा कि वह ग्रामीणों को सिखाये कि वे विवादों से दूर रहें और उन्हें स्थानीय स्तर पर ही सुलझा लें|

यदि हमने सच्चे रूप में पंचायती राज की स्थापना कर दी तो हम देखेंगें कि एक सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा और जहां पर कि सबसे नीची पायदान पर खड़ा भारतीय भी ऊँचे स्थानों पर बैठे शासकों के समां बर्ताव और अधिकार पायेगा|

मेरे आदर्श गाँव में परम्परागत तरीके से स्वच्छता के ऊँचे मानदंड स्थापित होंगे जहां मानव और पशु जनित कुछ भी ऐसी सामग्री व्यर्थ नहीं फेंकी जायेगी जो कि वातावरण को गंदा करे|

पांच मील के घेरे के अंतर्गत उपलब्ध सामग्री से ही ऐसे घर बनाए जायेंगें जो कि प्राकृतिक रूप से ही हवा और रोशनी से भरपूर हों| इन घरों के प्रांगणों में इतनी जगह होगी कि ग्रामीण वहाँ अपने उपयोग के लिए सब्जियां उगा सकें और अपने पशु रख सकें|

गावों की गालियाँ साफ़ सुथरी और धूल से मुक्त होंगी|  हर गाँव में पर्याप्त मात्रा में कुंएं होंगे जिन तक हर गांववासी की पहुँच होगी|

सभी ग्रामीण बिना किसी भेदभाव और भय के पूजा अर्चना कर सकें ऐसे पूजा स्थल होंगें| सभी लोगों के उठने बैठने के लिए एक सार्वजनिक स्थान होगा| पशुओं के चारा चरने के लिए मैदान होंगे| सहकारी डेरी होगी| प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल होंगे जहां व्यावहारिक क्राफ्ट्स और ग्राम-उधोगों की पढ़ाई मुख्य होगी| गाँव की अपनी एक पंचायत होगी जो इसके सभी मामले सुलझाएगी| हरेक गानव अपने उपयोग के लिए दूध, अनाज, सब्जियों, फलों और खाड़ी एवं सूती वस्त्रों का उत्पादन करेगा|

सबको इस बात में गर्व महसूस करना चाहिए कि वे कहीं भी और कभी भी उन उपलध वस्तुओं का प्रयोग करते है जो गाँवों में निर्मित की गयी हैं| अगर ठीक ढंग से प्रबंधन किया जाए तो गाँव हमारी जरुरत की सभी वस्तुएं हमें बना कर दे सकते हैं| अगर हम एक बार गानव को अपने दिल और दिमाग में स्थान दे देंगें तो हम पश्चिम का अंधा अनुकरण नहीं करेंगें और मशीनी औधोगीकरण की ओर अंधे बन कर नहीं भागेंगें|”

 

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जुलाई 11, 2016

नारी … (महात्मा गाँधी)

“नारी” पुरुष की सहचर है, सहगामी है, संगी है, साथी है, और उसकी क्षमताएं किसी भी मायने में पुरुष से कमतर नहीं हैं|

नारी के पास पुरुष की गतिविधियों की बारीकियों में सम्मिलित होने का अधिकार है, और उसके पास, जैसे पुरुष के पास स्त्री के प्रति है, पुरुष जैसी ही स्वतंत्रता और छूट है|

सेवा और त्याग की आत्मा के जीते जागते उदाहरण के रूप में मैंने नारी को पूजा है|

प्रकृति ने जैसे नारी को स्वहित से परे की सेवा की आत्मिक शक्ति से नारी को परिपूर्ण किया है, उस शक्ति की बराबरी पुरुष कभी भी नहीं कर सकता|”

मई 17, 2016

प्रकृति एवं जैव-विविधता – महात्मा गाँधी

Gandhiहम प्रकृति के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पारिस्थितिकी आंदोलन (इकॉलोजी मूवमेंट) तब तक नहीं चला सकते जब तक कि अहिंसा के नियम मानव सभ्यता के केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाते|

इंसान के पास जीवन को रचने की शक्ति नहीं है और इसीलिये उसके पास जीवन को नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है|

किसी भी समाज को इस कसौटी पर जांचा जा सकता है कि उसका जानवरों के प्रति व्यवहार कैसा है?

यह कहना एक अहंकारजनित अवधारणा है कि मानव के पास बाकी जीव जंतुओं का स्वामितव है और वह उनका भगवान है| इसके उलट, प्रकृति दवारा मानव जीवन को दिए गये वरदानों के कारण, मानव को एक ट्रस्टी के रूप में जीव-जंतुओं की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी चाहिए|

वन्य जीवन जंगलों में कम होता जा रहा है लेकिन शहरों में यह बढ़ता ही जाता है|

जीवन में हम अपने आसपास जितनी भी विविधता देखते हैं प्रकृति ने एक मूल एकता के सूत्र से हम सबको आपस में जोड़ रखा है|

मुझे प्रकृति के सिवा कहीं और से प्रेरणा लेने की आवश्यकता नहीं होती| प्रकृति ने कभी मुझे निराश नहीं किया| प्रकृति के रहस्य नित नये रूप में सामने आते हैं,  और वह मुझे हमेशा ही आश्चर्यचकित करती है| प्रकृति ही है जिसने मुझे आनंद की पराकाष्टा का अनुभव अकसर ही कराया है|

 

 

फ़रवरी 24, 2016

महात्मा गांधी एवं परमहंस योगानंद

 

अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

मई 24, 2014

गांधी के समय में अगर आज जैसा मीडिया होता?

Gandhi Channel

मई 5, 2014

मोदी और दलित : प्रो. तुलसी राम

 Modi IT Senaसैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।

मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।

इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।

मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।

सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया।

नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।

इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

Modi media ambaniइस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।

गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस

हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।

इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।ModiVsUPA

मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए।

उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं।

इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

प्रसिद्द  दलित चिंतक प्रो. तुलसी राम, अपनी आत्मकथा “मुर्दहिया” के कारण भी सर्वत्र जाने जाते हैं|

साभार : जनसत्ता (4 मई, 2014)

अप्रैल 9, 2014

अरविंद केजरीवाल: “आप” बचा पायेगी भारतीय राजनीति को कोर्पोरेट के औपनिवेशिक हमले से?

10000CRORbjpदिल्ली में और कई अन्य स्थानों पर कल 10 अप्रैल को चुनाव होना है और आज 9 अप्रैल को कई बड़े कांग्रेसी नेता ट्वीट आदि माध्यमों से बताते रहे कि भाजपा (मोदी) 10,000 करोड़ रूपये खर्च कर चुके हैं| इतनी अथाह धनराशी के बलबूते भारत को एक प्रोपेगंडा में डुबाकर नरेंद्र मोदी की नकली लहर का भ्रम पैदा करने वाली भाजपा के सामने 20 करोड़ के चंदे के साथ खड़ी “आप” कैसे लड़ पायेगी? क्या पैसा सच्चाई को हरा देगा?

देश को देखना और सिद्ध करना है कि लोकतंत्र में पैसा ही सब कुछ नहीं| आखिर जो लोग 10,000 करोड़ रूपये  चुनाव जीतने के लिए खर्च कर रहे हैं वे सत्ता में आने के बाद इस खर्चे की भरपाई भी तो करेंगे ही और वह वह जनता का शोषण किये बगैर तो हो नहीं सकती|

क्या कांग्रेस चुनाव होने से पहले ही हार मान चुकी है? दिल्ली में कुछ अरसा पहले राहुल गांधी के भी पोस्टर लगे थे पर ज्यादातर उन्ही स्थानों पर अब मोदी के पोस्टर लग गये हैं और राहुल गांधी के पोस्टर लगभग गायब हो गये हैं| कांग्रेस कहीं भी ढंग से चुनाव प्रचार करती नहीं दिखाई दे रही| क्या कांग्रेस कोर्पोरेट आकाओं का आदेश मान कर चुप है कि – इस बार मोदी की सरकार बन जाने दो?
अरविंद केजरीवाल जो कहते हैं उसकी तीव्र और तीखी प्रतिक्रया देश भर में होती है और मीडिया और राजनीतिक नेता उन पर आक्रमण कर देते हैं पर कुछ समय बाद ही अरविंद के कथन सच साबित होने लगते हैं| इस बार भी कुछ महीनों में ही स्पष्ट हो जायेगा कि अरविंद वाकई सच बोल रहे थे कि कोर्पोरेट इस देश पर कब्जा कर चुके हैं और कांग्रेस और भाजपा सरकारों की अदला बदली केवल जनता की आँखों में धूल झोंकने का प्रयास मात्र है|

AKatRajghatकल फिर अरविंद केजरीवाल पर हमला हुआ और सोशल मीडिया पर मोदी समर्थक जश्न मनाते दिखाई दिए और कांग्रेस समर्थक चुटकियाँ लेते|

भारत में मोदी समर्थक बहुतायत में सेडिस्ट हैं और यह बार बार सिद्ध हो रहा है| इतनी बड़ी संख्या में मानसिक रुग्णता इस देश का अहित करेगी ही करेगी| मोदी जैसों के मूड न भी हों पर यह भीड़ अपने अंदर की पाशविक हिंसा की संतुष्टि के लिए उन जैसे नेताओं को तानाशाह बना कर ही चैन पायेगी क्योंकि तब इस भीड़ के लिए अपने विरोधियों से बदला चुकाना और निबटना आसान हो जायेगा|

बड़े आनंद की बात है कि विजय मल्होत्रा जैसे निरर्थक हो चुके नेता को सारी कीमियागिरी पता है कि अरविंद केजरीवाल पर हमले उनकी खुद की रची नौटंकी है, तब वे क्यों नहीं ऐसा नाटक करके वर्तमान राजनीति में सार्थक बन जाते? दूसरा आनंद का विषय है कि जब ये थप्पड़-मुक्के मारने वाले नाटक के पात्र बनते हैं तो क्या पिटने के लिए भी तैयार होकर आते हैं? समर्थक तो ऐसे अचानक उत्पन्न हुए हालात में रोकते रोकते भी दो चार रसीद कर ही देते हैं|

भाजपाइयों की थकी हुयी बुद्धि के अनुसार “आप” और अरविंद केजरीवाल सब कुछ मीडिया का ध्यान पाने के लिए करते हैं| भाजपाइयों की मूर्खतापूर्ण सोच के साथ यही सिद्ध होता है पहले दिल्ली विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा के पैरों के नीचे से कालीन खींच कर “आप” ने सोचा कि अब सरकार बनाने के बाद तो मीडिया उन्हें पूछेगा नहीं सो उन्होंने आनन्-फानन में विनोद कुमार बिन्नी को लुभाया और उससे कहा कि अब तू “आप” से विद्रोह करने का नाटक कर और रोज मुझे और “आप” को गालियाँ दे| तू भी मीडिया में रहेगा और हम भी| और देखना कहीं भाजपाइयों और कांग्रेसियों के साथ रसगुल्ले खाते हुए न पकड़ा जाना वरना तेरा सारा खेल चौपट और तेरे साथ हमारा भी|

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कुछ दिन ऐसा चला फिर अरविंद ने अपने कई साथियों को, जो “आप” में रहकर दिल में भाजपा को बसाए रखते थे, कहा कि अब वे एक एक करके उनका और “आप” का विरोध करें और “आप” छोड़ दें या “आप” उन्हें निकाल देगी और इस तरह सभी चरित्र मीडिया में बने रहेंगे| “अश्विन उपाध्याय” को भी भरमाया कि भाई तुम ऐसे ऐसे आरोप लगाओ कि मीडिया दौड़ा चला आए तुम्हारे पास और तुम ऐसे ऐसे संवाद बोलना कि मीडिया सारे सारे दिन तुम्हारे वचन ही दिखाता रहे| फिर अरविंद ने अपने को पिटवाने और शारीरिक क्षति पहुंचाने वाले लोग भी तैयार कर लिए| आखिर मीडिया में बने जो रहना था|

बातों के थप्पड़ सही, और लात-घूंसों के मामले झूठे? वाह भाजपा, वाह  कांग्रेस!

वो (भाजपाईकांग्रेसी) क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती, अरविंद आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम!’ !

सरकार, क़ानून और मीडिया और कांग्रेस + भाजपा क्या अरविंद केजरीवाल और “आप” द्वारा एफ.आई.आर करवाने का ही मुँह ताकते रहते हैं? किसी ने शारीरिक हमला किया, जमाने ने देखा, हमलावर को पकड़ो, जैसी जांच करवानी है करवाओ, उसे क़ानून के घेरे में लाओं| मीडिया और विपक्षी अपने तौर पर गहरी जांच कर लें कि सच्चाई क्या है| दसियों हजार करोड़ खर्च करने वाली भाजपा के पास क्या लोकल जासूसों को देने के लिए भी पैसे नहीं बचे जो सच्चाई सामने लाकर अरविंद को दुनिया के सामने एक्सपोज कर दें? कहाँ गये मीडिया के स्टिंग धुरंधर? ज़रा सामने तो आओ, अपनी कला का नमूना दिखाओ| या भय यह है कि अगर असली मास्टर माइंड तक पहुँच गये लोग तो किरकिरी हो जायेगी?

अरविंद तो खुद ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर श्री बी.एस.बस्सी के पास गये कि उन पर हो रहे लगातार हमलों की जांच करवाई जानी चाहिए जिससे कि पता लग सके इन् सब हमलों के पीछे कौन मास्टर माइंड है?

अरविंद अपने पर आक्रमण करने वाले से मिलने उसके घर गये तो AK laliभाजपा को तो छोड़ ही दें संघ को भी समस्या होने लगी कि वे क्यों अपने पर हमले करने वालों को माफ करे दे रहे हैं|

“लगे रहो अरविंदभाई” गांधीगिरी में, बदलाव आएगा ही आएगा!

जन्म से ही कोई महान नहीं होता, अलबत्ता उसमें ऐसी संभावनाओं के बीज जरुर छिपे रहते हैं पर उसे सप्रयास इन् बीजों को अंकुरित करके पहले पौधे और बाद में फल-फूल से भरा वृक्ष बनाना पड़ता है और यह एक लंबा और सतत चलने वाला और बेहद कठिन और परिश्रमबद्ध कार्य होता है| इस कार्य में परिस्थितियाँ और विरोधी लोग बार-बार अपमान करते हैं, शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाते हैं, पर कठिन परिस्थितियों और बेहद कठिन कसौटियों से गुजर कर ही जन-नायकों का उदय होता है| महात्मा गांधी की आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” में अतुल्य हीरा बनने की यात्रा का बेहद असरदार वर्णन है| गांधी जब अपने अंतस पर नियंत्रण पाकर, जनता के दुख दर्द तो आत्मसात करके उनके हित की ही बात करके जीने का प्रण लेकर द.अफ्रीका से भारत आए तो वे 45 साल के थे| और अगले कुछ दशकों में उन्होंने गुलामी के कारण थक-हार कर घिसट-घिसट कर जीवन जीते भारत की न केवल आत्मा को जगाया बल्कि निहत्थे, गरीब और कमजोर भारतीयों को इतने  तेज से भर दिया कि वे पूरे देश में अंग्रेजों और उनकी अथाह ताकत के सामने सिर उठा कर खड़े हो गये और अंग्रेजों को यहाँ से अपना अत्याचारी राज खत्म करके वापिस अपने देश जाना पड़ा|

AAP49daysगांधी का अंतिम सपना “स्वराज” का था परन्तु ऐसे लोग जो अंग्रेजों के शासन में अपनी ज्यादा भलाई समझते थे, उनके ऐसे किसी भी लक्ष्य के विरोधी थे और अंततः साम्प्राद्यिक राजनीति की कुत्सित विचारधारा में पाले बढे अपराधी मानसिकता के लोगों ने गांधी की ह्त्या कर दी| जिन्होने देश को सम्भाला अंग्रेजों के बाद, उनका लक्ष्य “स्वराज” नहीं था, और अपनी तमाम भलमनसाहत के बावजूद वे इस बात के लिए सही तरीके से शिक्षित नहीं थे कि सोच विचार कर गांधी के लक्ष्य को पूरा करने के मार्ग पर चल सकें और बाद के नेताओं की पीढियां तो अपने घर भरने में ही लगी रहीं और भ्रष्टाचार को इस कदर पचने वाला तत्व बना दिया गया भारतीय समाज में भारतीय राजनेताओं द्वारा कि ऐसा माने जाना लगा कि ईमानदारी की बात करने वाला आदमी “पागल” होता है|
दशकों भारत में भ्रष्टाचार का अँधेरा व्याप्त रहा है अब जाकर कुछ रोशनी की किरण चमकी है और इस आशा को जगाने में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ है, परन्तु यह आंदोलन किसी खास राजनीतिक दल के खिलाफ सीमित नहीं हो सकता और इसीलिए जो लोग इस आंदोलन से अपने राजनीतिक हित साधने के लिए जुड़े थे वे धीरे धीरे करके अपने अपने राजनीतिक आकाओं के पाले में जाकर बैठ गये हैं और खुलकर भारतीय राजनीति में ईमानदारी लेन वाले निष्पक्ष योद्धाओं के खिलाफ मोर्चा संभाल रहे हैं|

AKpolice
45 साल के अरविंद केजरीवाल को भी हम लोग अपने को निरंतर अपने को गढते, तराशते और तैयार करते देख रहे हैं और उनके बहुत से अन्य साथी भी इस कार्य में लगे हुए हैं| और यही एक बात बहुत बड़ी आशा बंधाती है| ऐसा कभी किसी काल में नहीं हुआ कि सिर्फ अपना हित देखने वाले भ्रष्टाचारी, बुरी ताकतों के खिलाफ कोई आवाज उठाये और ये ताकतें उस आंदोलनकारी का पुरजोर विरोध न करें| वे करेंगे और उनका लक्ष्य ऐसे विरोध को कुचलने का और संभव हो तो ऐसे नेता को नष्ट करने का होता है| यही सब कुत्सित प्रयास हमारे इर्द-गिर्द चल रहे हैं| पर बुराई के साथ साथ अच्छाई का जन्म और विकास भी प्रकृति में चलता ही रहता है और हर बार प्रकृति यह स्थापित करके दिखाती है कि अंततः अच्छाई बुराई पर विजय प्राप्त कर ही लेती है| यह जीत आज मिले या दस साल बाद या बीस साल बाद मिले पर भारतीय राजनीति के उद्धार की जो प्रक्रिया शुरू हुई है यह अब रुकने वाली है नहीं| आर्थिक और सुविधाओं के लिहाज से समाज के सबसे नीचे तबके से लेकर सबसे ऊपर के तबके में सुगबुगाहट है और एक मंथन चल रहा है और हर स्तर से लोग इस आंदोलन के समर्थन (और विरोध में भी) में सामने आयेंगे या मौन रहकर अपना मत देकर समर्थन देंगे| इस आंदोलन के कारवाँ के यात्रियों को हमेशा एक बात स्मृति में रखने की जरुरत है कि वे अकेले नहीं हैं और उन जैसी भावनाओं वाले करोड़ों भारतीय देश के कोने कोने में इस महान यात्रा में उनके सहभागी हैं| भारत सुधार की ओर अग्रसर है, सो स्पष्ट है कि भ्रष्ट ताकतें अपने हमलों की तीव्रता और शक्ति बढाएंगी ही पर यही उनकी हताशा का सूबूत भी होगा|

दिल्ली में और कई अन्य स्थानों पर जहां कल चुनाव होगा, “आप” कि स्थिति बहुत बेहतर है कांग्रेस और भाजपा की तुलना में, और ऐसा हुआ है भाजपा और कांग्रेसी षड्यंत्रों के बावजूद|

Vote4AAP
रात में एक आरामपूर्ण नींद के बाद सुबह उठकर ताजगी भरे मन से देश की सफाई की शुरुआत करने की बेहद महत्वपूर्ण घड़ी लोगों के सामने कल सुबह 7 बजे आ जायेगी और पूरे दिन यह शुभ उपलब्ध रहेगा| देश की सफाई के लिए “झाडू” को शक्ति देना एक पुनीत कार्य में हाथ बंटाना है| पहली बार वोट देने वालों ने इतना थ्रिल पहले कभी महसूस नहीं किया होगा जीवन में जैसा वे कल सुबह करेंगे “झाडू” को वोट देते हुए|
“आरम्भ” होती है “आप” की देश-सफाई -यात्रा कल सुबह से! कल का वोट देश में बड़े बदलाव लाने का पहला और बेहद महत्वपूर्ण कदम है|

 

मार्च 10, 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति : प्रभाष जोशी की दृष्टि में

prabhasjoshiजनसत्ता के यशस्वी संपादक  प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन?

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)

….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.

सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.

(साभार- जनसत्ता)

अगस्त 14, 2011

तिरंगा : किस मुँह से फहराओगे, किस मुँह से देखोगे?

केसरिया रंग

हमारे तिरंगे का मुकुट
कट्टरता का प्रतीक बन गया है
पार्कों-स्कूल के मैदानों पर
तिरंगे का काम ही क्या?

भगवा झंडों के साये में
अस्त्र-शस्त्र चालन प्रक्षिक्षण शिविर
गवाह हैं जगाई जाती नफरतों के
जहाँ से केसर की खुशबु फैलनी चाहिये थी
बमों के विस्फोट हो रहे हैं
स्वर्ग को नरक बना दिया है नफरतों ने।

सफेद रंग

हमारे तिरंगे का ह्रदय
काले को सफ़ेद करने का जादू भर है आज
मोती तोंद वाले सफेदपोश
सिल्क खादी की जगमगाहट के पीछे
अपनी तमाम काली करतूतें
आसानी से छिपाए हुए हैं
सफेद वो सियाही है
जिसके लिखे स्विस खातों के नम्बर
किसी से नहीं पढ़े जाते
हाँ,

बीच का चक्कर

ज़रूर घूम रहा है
दलाली, कमीशन और घोटालों की
पहचान बन कर
दरसल आज़ादी के ये ही रसफल
हमसे चुनाव लड़वाते हैं
हिस्ट्रीशीटरों को नेता बनवाते हैं।

हरा रंग

हमारे तिरंगे की बुनियाद
गाँवों से लाता था हरियाली की मजबूती
खेतों में मासूमियत की खाद से
गहराती थी अपने पाक संस्कारों की जड़ें
उस विशाल वृक्ष तले अपनत्व की शीतल छाँव थी
शहरियत के कंक्रीट जंगल ने
मशीनी धुंआं फेंकते दानवों का
शोर उगा दिया है
पक्षियों की कलरव के स्थान पर
अपने-अपने सीमेंट के दडबों में बंद हुआ आदमी
भूल चला है सभी संवेदनाए
राजा हरीश चन्द्र का किस्सा अब किसे लुभाता है
आज नए  दौर के हीरो राजा–राडिया-कलमाड़ी-रेड्डी-येद्दयुरप्पा हैं
बेईमानी के हमाम में सभी नंगे
घोटालों–घूसखोरी की फसलें काट रहे हैं
रूपये-डालर-मार्क–येन-मार्क-पौंड का हिसाब
स्विस बैंको में है दफन।

एक बूढ़ा नैतिकता की बात कर रहा है
नूराकुश्ती में मग्न पक्ष भी, विपक्ष भी
सब होंठों तले हंस रहे हैं।

मेरे दोस्तों! स्वतत्रता दिवस बहुत मुबारक
क्या तुम्हे कल ज़रा भी ख्याल आएगा
किस मुँह से पी.एम.फहरायेंगे तिरंगा?
किस मुँह से तुम देखोगे तिरंगे को?

(रफत आलम)

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