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सितम्बर 7, 2011

हिंदू, मुस्लिम सिख, ईसाई – आदमी कहाँ है भाई?

हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में

रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में

नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में

वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में

अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में

साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में

निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में

जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में

फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में

पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है  अब भी उड़ानों में

सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में

असीर -कैदी

(रफत आलम)

 

जुलाई 13, 2011

दिल की लगी

फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

दिल से दुआ हो हर एक मेहमान की
अल्लाह इज़्ज़त रखे मेरे मेज़बान की

किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
वो समझ गया था फितरत इंसान की

कौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की

रिश्ते बहुत थे मगर कौन से रिश्ते थे
हमने जिनके वास्ते दुनिया वीरान की

मुस्कानों का बहरूप धरे अपनी काया
असल में बस्ती है जंगल बयाबान की

गुलशन के उजड़ने में किसका है दोष
मौसम का फरेब के भूल बागबान की

दीवाने तो तिरछी चितवन पे मर मिटे
ज़रूरत कहाँ पड़ी प्यारे, तीर-कमान की

सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के
सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की

यूँ तो ज़मीन माटी का गोला है मगर
उठाए फिर रही है बुलंदी आसमान की

हमने कब कहा ये है गज़ल ऐ आलम
है दिल की लगी जो दिल ने बयान की

(रफत आलम)

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