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मई 5, 2014

मोदी और दलित : प्रो. तुलसी राम

 Modi IT Senaसैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।

मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।

इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।

मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।

सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया।

नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।

इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

Modi media ambaniइस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।

गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस

हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।

इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।ModiVsUPA

मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए।

उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं।

इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

प्रसिद्द  दलित चिंतक प्रो. तुलसी राम, अपनी आत्मकथा “मुर्दहिया” के कारण भी सर्वत्र जाने जाते हैं|

साभार : जनसत्ता (4 मई, 2014)

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दिसम्बर 12, 2013

‘आप’ 1920-30 की कांग्रेस जैसा आन्दोलन बन रही है…

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किस्मत की खूबी देखिये टूटी कहाँ कमंद,

दो  चार हाथ जब के लबे बाम रह गया|

कमल के फूल के निशान के साथ राजनीतिक जीवन जीने वाले जाने कितने ही नेता उपरोक्त्त  शेर से परिचित होंगे तो इसे बार बार दुहरा रहे होंगे|

आम आदमी पार्टी” ने अगर पवित्र लोकतंत्र की अवधारणा की कल्पना, जहां जोड़ तोड़ की राजनीति से परहेज हो, जहां पारदर्शी तरीके से राजनीति की जाए,  भारतीय परिवेश में न चलाई होती

तो बड़े राजनीतिक दलों के लिए सरकार बनाने के लिए आठ दस विधायकों या सांसदों का प्रबंध करना बाएं हाथ का खेल बन चुका था|

आप’ के रचे माहौल का ही असर है कि भाजपा लगभग नारे लगाने की आवाज में घोषित कर रही है कि वह विपक्ष में बैठने को तैयार है पर जोड़-तोड़ से सरकार नहीं बनाएगी|

काश कि ऐसा संयम वे आगामी लोकसभा चुनाव में भी अपना सकें|

कांग्रेस हो, भाजपा हो या तीसरा मोर्चा हो, देश ने सभी किस्म के दलों को विगत में जोड़तोड़ से सरकारें बनाते पाया है| यह अवसरवादी राजनीति ऐसे ही चलती रहती अगर भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर ‘आप‘ का उभार न हुआ होता|

गर्त की ओर तेजी से अग्रसर भारतीय राजनीति पर पहली बार ऐसा कुठाराघात हुआ है कि यह दबाव में सही अच्छा दिखने के लिए अभिनय करती दिखाई दे रही है| आज अभिनय हो रहा है कल यह अच्छापन जरुरत बन जाएगा तो असल में बड़े राजनीतिक दलों को शुचिता का पालन करना पडेगा|

आप‘ के असर से दिल्ली की सियासत की बिसात के पैदल से लेकर रानी और मंत्री और तमाम महत्वपूर्ण मोहरे बदल गये हैं और अगर शीघ्र ही बड़े दलों के अंदर बड़े संगठनात्मक बदलाव देखने को मिल जाएँ तो कुछ आश्चर्य नहीं होना चाहिए| कांग्रेस ने तो इसकी बाकायदा शुरुआत भी कर दी है| इन्डियन एक्सप्रेस में छपा मणि शंकर अय्यर का लिखा हुआ लेख बहुत कुछ इंगित करता है| अब अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि कांग्रेस संभवतः राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेगी| आगामी चुनाव में फिर किसी और कांग्रेसी नेता को आगे किया जाएगा| मीरा कुमार (महिला+दलित) भी एक ऐसा नाम हो सकता है जिन्हें आगे बढ़ा कर चुनाव लड़ा जाए|  अभी तो नंदन नीलकेणी जैसे कई नाम हवा में गुंजाये जायेंगे, जनता का मन टटोलने के लिए| मणि शंकर अय्यर ने अखबार में लेख लिख कांग्रेसी  संगठन को मजबूत करने के अरसे से रुके प्रोजेक्ट  को जगजाहिर करके राहुल गांधी की संभावित भूमिका की ओर इशारा कर ही दिया है| राहुल गांधी ने भी ‘आप‘ की अप्रत्याशित सफलता (उनके लिए) देख पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे ऐसे बदलाव कांग्रेस संगठन में करेंगे जिसकी कल्पना भी लोग नहीं कर सकते|

जोड़-तोड़ की राजनीति के माहिर नेताओं के सामने इस बात को पचाने में मुश्किल खड़ी हो गई है कि अब साफ़-सुथरी राजनीति भारत में भी जड़े जमा सकती है क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो इन्हें अपनी दुकान बंद करके निर्वासन पर जाना होगा| इसलिए विभिन्न दलों के नेता अपने अपने तरीके से ‘आप‘ पर चौतरफा आक्रमण कर रहे हैं| ऐश्वर्य का जीवन छोड़ कर सामान्य देशवासी जैसा जीवन जीने की कल्पना ही भयावह हो सकती है नेताओं के लिए| ‘आप‘ के नेताओं की साधारण जीवनशैली अपना कर राजनीति करने की घोषणा बाकी दलों के नेताओं के लिए अभी से कष्टकारी सिद्ध हो रही है|

आप‘ ने फंड एकत्रित करने और उसका ब्योरा देने में जो पारदर्शिता दिखाई है वह भारतीय राजनीति में अभूतपूर्व है और व्यावहारिक राजनीति में यही एक कदम ‘आप‘ को साफ़-साफ़ अन्य राजनेतिक दलों से ज्यादा पाक साफ़ निर्धारित कर देता है|

आप‘ को क्षणिक उभार मान लेना न तो नेताओं के हित में है और न ही राजनीतिक विश्लेषकों के लिए उचित| दिल्ली के चुनाव के अनुभव से इतना तो राजनीतिक दलों और राजनीतिक विश्लेषकों को मान ही लेना चाहिए कि

अब 2014 के लोकसभा चुनाव में एजेंडा और मूल्य ‘आप‘ निर्धारित करेगी और  बाकी दलों को ‘आप‘ द्वारा घोषित बातों पर प्रतिक्रया स्वरूप ही कुछ करना होगा|

भाजपा दिल्ली में ‘आप‘ के मेनिफेस्टो की कॉपी कैट बन कर रह गयी थी और जो कुछ ‘आप‘ ने सोमवार को घोषित किया उसे मंगल बुध तक भाजपा ने अपनी लाइन घोषित कर दिया| अब नैतिक रूप से ‘आप‘ भारत में लोगों के अंदर आशा का संचार करने वाली सबसे प्रभावशाली पार्टी बनती जा रही है|

आप‘ उस लहर पर सवार हो गई है, जो राजनेता मात्र के प्रति जनता के आक्रोश से उपजी है और अब जनता का यही आक्रोश ‘आप‘ को दिल्ली से निकाल कर देशव्यापी फिनोमिना बनाएगा|

भूलना नहीं चाहिए कि कुछ बड़े कोर्पोरेटस के सक्रिय दबाव के कारण बड़े मीडिया घरानों ने ‘आप‘ का बायकॉट किया हुआ था और टीवी चैनलों पर कवरेज न मिल पाने का बावजूद ‘आप‘ ने अपना वजूद बना कर दिखाया और अंत में उन्ही चैनलों को उन्हें कवरेज देनी ही पड़ी|

बड़े दल और क्षेत्रीय दल सोच कर अपने आप में ही खुश और निश्चिंत हो सकते हैं कि दिल्ली के बाहर ‘आप‘ की हवा निकल जायेगी पर उन्हें जनता के मौजूदा राजनीति से आक्रोश का अंदाजा नहीं है|

जैसे जैसे ‘आप‘ दिल्ली से बाहर किसी अन्य क्षेत्र में जायेगी वहाँ की हवा धीरे धीरे बदलती जायेगी| ‘आप‘ के पास  भारी-भरकम नाम नहीं होंगे किसी भी जगह पर क्षेत्रीय जनता खुद किसी उचित उम्मीदवार को उभार देगी| दिल्ली की तरह लोकसभा चुनाव में पूरे देश में जमे जमाये राजनीतिक पहलवान धराशायी हो जाएँ तो अप्रत्याशित न होगा|

एक तरह से देखा जाए तो भारतीय जनता का एक बहुत बड़ा तबका राजनेताओं और राजनीतिक दलों के अहंकार से पीड़ित है और जनता को यही अहंकार तोडना है और जनभावना को यह मौक़ा अगामी लोकसभा चुनावों में मिलने जा रहा है| जो जनता के सेवक होने चाहिए थे वे जनता के शासक बन कर बैठ गये हैं और अब इस चक्र को वापसी की ओर घूमना है अब राजनीति से शासक के विदा होने का समय आ गया है|

आप‘ इस जनभावना पर खरी उतरती है और नेताओं और दलों के अहंकार को तोड़ने में जनता का माध्यम बन सकती है बल्कि बन रही है|

दिल्ली चुनाव में ‘आप‘ की सीमित सफलता से एक बात और पता चलती है कि बहुत दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि ‘आप‘ के उम्मीदवार की न तो लोगों ने जाति देखी न धर्म, न व्यवसाय और न ही क्षेत्रीय पहचान|

भारत में कितने लोग होंगे जो इस बात के प्रति उत्सुक हैं कि ‘अरविन्द केजरीवाल‘ की जातिगत या क्षेत्रीय पहचान क्या है? और यही बात ‘आप‘ की सबसे बड़ी खूबी बनने वाली है|

यह भी ध्यान देने योग्य पहलू है कि बहुजन समाज पार्टी के मैदान में होने के बावजूद और मायावती के रैली करने के बावजूद ‘आप‘ ने कई सुरक्षित सीटें दिल्ली में जीती हैं|

भारत भिन्न राजनीतिक दलों की कुटिल और तुच्छ राजनीति के कारण जाने कितने टुकड़ों में बाँट चुका है|

 ‘आप‘ का उदय भारत को फिर से एक सूत्र में पिरोने के लिए भी हुआ है|

स्थापित राजनीतिक दल या तो किन्ही परिवार विशेषों के नियंत्रण वाले व्यक्तिगत दल बन चुके हैं या कुछ खास लोग उन्हें संचालित कर रहे हैं और साधारण स्तर से उठकर किसी का इन दलों में नेता बन जाना लगभग असंभव है क्योंकि रिक्त स्थान नेताओं के परिवार वालों के लिए सुरक्षित है|

आप‘ यहाँ भी शून्य को भरती है और स्वच्छ राजनीति करने के इच्छुक नये लोग ‘आप‘ के माध्यम से राजनीति में प्रवेश करके देशसेवा कर सकते हैं|

एक तरह से देखा जाए तो ‘आप’ को अब पिछली सदी के बीस और तीस के दशक वाली कांग्रेस की भूमिका मिलती जा रही है| वह भी एक आंदोलन था यह भी एक आंदोलन है|

बस ‘आप‘ के पास गांधी, सुभाष, नेहरू, पटेल जैसे बड़े नाम नहीं हैं पर ‘आम‘ आदमी खुद अपना स्तर ऊपर उठाकर इस कमी को महसूस ही नहीं होने देगा|

गांधी भी ‘आप‘ के उदय से बेहद खुश होते|

ऐसा नहीं है कि ‘आप‘ का रास्ता एकदम सुगम है| अभी तो एक शुरुआत भर हुयी है और अथाह समुद्र बाकी है पार करने को|

अभी तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि

अभी तो ली अंगडाई है

आगे असली लड़ाई है

मई 16, 2011

किसान: मैथिलीशरण गुप्त झूठे थे!

कविवर मैथिली शरण गुप्त झूठे थे। उन्होने पता नहीं क्या-क्या देख लिया भारत के किसानों में?

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आँच में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
है शीत कैसा पड़ रहा, और थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है।

ज़रा उनकी मूर्खता तो देखिये क्या क्या कसीदे उन्होने किसानों के नाम कढ़ दिये।

किसान भी भला कुछ करता है क्या? निठल्ला किस्म का मानव होता है किसान।

न काम का न काज का दुश्मन विकास का।

देश ब्रांडेड चीजों को अपना रहा है और ये देहाती किसान देश को पीछे ढ़केल रहे हैं। न इन्हे ढ़ंग से रहने की तमीज होती है और न ही इन्हे बातचीत का ढ़ंग ही आता है। ये देश के मखमली भविष्य पर टाट के पैबंद सरीखे हैं।

भला इंडिया में किसानों का क्या काम? वे खुद आत्महत्या करके न मरते हों तो नेताओं के इशारे पर चलने वाली राज्यों की पुलिस तो है ही उन्हे निबटाने के लिये।

किसान खत्म हो जायेंगे भारत से तो इसे धनी इंडिया बनने से बाकी के सारे देश मिल कर भी न रोक पायेंगे। किसान का भारत से मिट जाना ही श्रेयकर है।

कुछ नेताओं, और बहुत सारे बिल्डरों, कोरपोरेट इंडिया और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने मिलकर यह पवित्र काम करने का ठेका ले लिया है। जाति, सम्प्रदाय, द्वेष की परम्परा का ईमानदारी से पालन करते राजनीतिक दलों के पिछलग्गू लोग भी इस यज्ञ में अपना योगदान दे सकते हैं। बहुत से दे ही रहे हैं।

कुछ दलों की तो नीति भी तय हो गयी है।

किसान है मक्कार
इसे लगाओ जूते चार

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