सीमा रेखा (विष्णु प्रभाकर) : राजतंत्र में बदलता लोकतंत्र!

जब ब्रिटिश राज से भारत ने राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करके भारत में लोकतंत्र की स्थापना की और भारत का संविधान बनाया तो सब कुछ आदर्शवादी तासीर वाला रहा होगा| पर शनैः शनैः लोकतंत्र की मूल भावना से खिलवाड किया जाता रहा और जनप्रतिनिधि जन सेवक न बनकर जनता के राजा बनने लगे और जनता के अधिकार सीमित होते गये| विष्णु प्रभाकर ने आदर्शवाद और कुटिल राजनीति के यथार्थवाद की टक्कर एक ही घर के सदस्यों के आपसी वैचारिक टकराव के माध्यम से दर्शाई है इस एकांकी – सीमा रेखा में| हो सकता है जब यह लिखा गया होगा तब इसे समय से आगे का, या प्रभाकर जी की अति संवेदनशील कल्पना की उपज माना गया होगा पर भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान में हालात देखकर यह एकांकी सार्थक, संगत और महत्वपूर्ण बन गया है|
SeemaRekha1

SeemaRekha2

SeemaRekha3

SeemaRekha4

SeemaRekha5

SeemaRekha6

SeemaRekha7

SeemaRekha8

SeemaRekha9

SeemaRekha10

SeemaRekha11

SeemaRekha12

SeemaRekha13

Advertisements

One Comment to “सीमा रेखा (विष्णु प्रभाकर) : राजतंत्र में बदलता लोकतंत्र!”

  1. बहुत सार्थक प्रस्तुति , आज़ादी के` बाद नेताओं ने अपने स्वार्थ वश जिस प्रकार सत्ता का दुरूपयोग कर संविधान का कबाड़ा किया है वह चिंतनीय है कांग्रेस ने यदि आज़ादी में कुछ योगदान किया उससे कई गुणा जनता से` वसूल भी किया है जब कि उस समय के नेताओं के उसूल आज के नेताओं जैसे नहीं थे

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: