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जून 7, 2015

‘प. नेहरु’ और ब्रिटिश राज के बाद का भारत

Nehru

[दैनिक जनसत्ता ने ब्रिटिश राज के बाद भारत के प्रति नेहरु के योगदान और उनकी छवि को धूमिल किये जाने वाले राजनीतिक षड्यंत्र पर प्रकाश डालते हुए एक अच्छा लेख (

नेहरू को नकारने के निहितार्थ)

प्रकाशित किया है]

आजादी की लड़ाई पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है। नेहरू इस हमले का मुख्य निशाना हैं। नेहरू का नाम आते ही नेहरू परिवार की बात शुरू हो जाती है। देश की हर समस्या, हर मुसीबत का नाम नेहरू के खाते दर्ज किया जाता है। नेहरू को एक सत्ता-लोलुप की तरह पेश किया जाता है, जिन्होंने गांधी को किनारे लगा कर अंगरेजों से सत्ता हथिया ली। या फिर, गांधी की कृपा से वे गांधी के उत्तराधिकारी बने। अगर नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री न होते तो देश की सूरत अलग होती। क्योंकि वे निर्णय लेने में अक्षम थे। वे तो पटेल थे जिनकी लोहे जैसी इच्छाशक्ति ने इस देश को बचा लिया। या फिर इस देश में नेहरू की इकलौती विरासत वंशवाद की नींव रखना था। यह और इस तरह के जाने कितने आरोप एक सांस में नेहरू पर मढ़ दिए जाते हैं। दरअसल, नेहरू कौन थे यह बात आम आदमी की याददाश्त से गायब हो चुकी है। नई पीढ़ी, जिसका सबसे बड़ा स्कूल इंटरनेट है, यू-ट्यूब वाले नेहरू को जानती है। वे नेहरू जो तथाकथित रूप से आला दर्जे के शौकीन आदमी थे।

नेहरू के दुश्मन एक नहीं, अनेक हैं। सांप्रदायिक एजेंडे में वे गांधी की तरह एक रोड़ा हैं। साम्राज्यवादियों और नव-साम्राज्यवादियों के लिए आजादी की पूरी लड़ाई एक झूठ और दिखावा थी, जो कि ब्रिटिश राज की भलाई देखने के बजाय उसकी जड़ खोदने का काम करती थी। सबाल्टर्न इतिहासकारों के हिसाब से नेहरू उस जमात के नेता थे जो अभिजात थी, जिसका नीचे से यानी जनता के भले से कोई लेना-देना नहीं था। रूढ़ मार्क्सवादी इतिहास-लेखन नेहरू को उस बूर्जुवा नेतृत्व का प्रतिनिधि मानता रहा जिसने समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद क्रांति की ऐतिहासिक संभावनाओं को कमजोर किया।

गांधी की हत्या के बाद गांधीवादियों ने नेहरू से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि वे भी गांधी के अंतिम दिनों की तरह सत्ता से दूर रहेंगे। वे उस गांधी को भूल गए जो अपने हृदय के हर कोने से खांटी राजनीतिक थे। समाजवादियों की जमात ने कभी नेहरू के नेतृत्व में ही समाजवाद का ककहरा सीखा था। आजादी के बाद वही समाजवादी नेहरू की जड़ें खोदने पर आमादा हो गए। पटेल 1950 में स्वर्ग सिधार गए। गांधी की पहले ही 1948 में हत्या हो चुकी थी। बाकी बचे मौलाना आजाद, जो नेहरू के मुश्किल दिनों के साथी थे।

यानी आजादी के पहले और आजादी के बाद दो अलग दौर थे। पहले दौर में गांधी के व्यापक नेतृत्व में एक भरी-पूरी कांग्रेस थी, जिसमें नेहरू गांधी के बाद बिना शक नंबर दो थे। लेकिन आजादी के बाद और गांधी की हत्या के बाद सिर्फ नेहरू थे। आजादी और विभाजन के द्वैध को भुगत कर निकला देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा था। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शोषण ने देश को अंदर तक खोखला कर दिया था। इस एक तथ्य से ही हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है- 1947 में भारत में औसत आयु मात्र बत्तीस वर्ष थी।

ऐसे कठिन दौर में नेहरू ने मोर्चा संभाला। उन्होंने दिन-रात काम किया। अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सिर्फ चार-चार घंटे सोकर बिताया। जिन्हें नेहरू की मेहनत का अंदाजा लगाना हो वे गजानन माधव मुक्तिबोध का निबंध ‘दून घाटी में नेहरू’ पढ़ लें। किसी को आजादी के पहले के नेहरू से एतराज नहीं है। सबकी दिक्कत आजादी के बाद के नेहरू से है। इसलिए यहां बात सिर्फ इसी नेहरू की होनी है। उस नेहरू की, जिस पर आजादी की लड़ाई की समूची विरासत को आजाद भारत में अकेले आगे बढ़ाना था। जिसके हिस्से ‘सत्ता’ का ‘अमृत’ आया था; औपनिवेशिक शोषण और सांप्रदायिकता से टूटे-बिखरे मुल्क में ‘विष’ भी इसी नेहरू के हिस्से आया।

सबसे पहली बात रियासतों के एकीकरण की। इस काम में सरदार पटेल और वीपी मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। लेकिन भारत का एकीकरण आजादी की लड़ाई का मूल विचार था। जिस देश को पिछले सौ सालों में जोड़ा-बटोरा गया था, उसे सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में टूटने नहीं देना था। यह काम आजाद भारत की सरकार के जिम्मे आया, जिसे पटेल ने गृहमंत्री होने के नाते बखूबी अंजाम दिया। लेकिन भारत को सैकड़ों हिस्सों में तोड़ने वाला मसविदा ब्रिटेन भेजने के पहले माउंटबेटन ने नेहरू को दिखाया। माउंटबेटन के हिसाब से ब्रिटेन को क्राउन की सर्वोच्चता वापस ले लेनी चाहिए। यानी जितने भी राज्यों को समय-समय पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता स्वीकारनी पड़ी थी, इस व्यवस्था से सब स्वतंत्र हो जाते।

नेहरू यह मसविदा देखने के बाद पूरी रात सो नहीं सके। उन्होंने माउंटबेटन के नाम एक सख्त चिट्ठी लिखी। तड़के वे उनसे मिलने पहुंच गए। नेहरू की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे मजबूरन माउंटबेटन को नया मसविदा बनाना पड़ा, जिसे तीन जून योजना के नाम से जाना जाता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दो राज्य इकाइयों की व्यवस्था दी गई। ध्यान रहे पटेल जिस सरकार में गृहमंत्री थे, नेहरू उसके प्रधानमंत्री थे। इस तरह, यह निश्चित रूप से पटेल का नहीं, पटेल और नेहरू का मिलाजुला काम था।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की चुनौती थी। देश सांप्रदायिक वहशीपन के सबसे बुरे दौर से गुजर चुका था। लोगों ने गांधी के जिंदा रहते उनकी बात अनसुनी कर दी थी। जिन्ना ने अपना दार-उल-इस्लाम बना लिया था; मुसलमानों का ‘अपना’ मुल्क पाकिस्तान वजूद में आ गया था। भीषण रक्तपात, विस्थापन के साथ हिंदू और सिख शरणार्थियों के जगह-जगह पहुंचने के साथ ही ‘हिंदू’ सांप्रदायिक दबाव बहुत जबर्दस्त हो गया था। हिंदुस्तान का पहला आम चुनाव सामने था। यह ऐसा चुनाव था जो सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के मुद््दे पर लड़ा जा रहा था। नेहरू ने ‘जन भावनाओं’ की मुंहदेखी नहीं की। उन्होंने वह कहा जो बहुतों के लिए अलोकप्रिय था। उनमें अलोकप्रिय होने का साहस था।

उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के हक में आवाज बुलंद की और जनता को अंधेरे समय में रोशनी दिखाई। जनता ने अपने नेता को खुद से ज्यादा समझदार माना। इस चुनाव में नेहरू ने तकरीबन पूरा देश नाप लिया। तकरीबन चालीस हजार किलोमीटर का सफर तय किया। हर दस में एक भारतीय को सीधा संबोधित किया। यह वक्त हिंदू सांप्रदायिकता के उभार के लिए सबसे मुफीद था। लेकिन इसी समय इसे मुंह की खानी पड़ी। यह चुनाव एक तरह से धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत संग्रह सिद्ध हुया। नेहरू पर एक और बड़ा जिम्मा था। आजादी की लड़ाई के दौरान बोए गए लोकतांत्रिक पौधे की जड़ें मजबूत करने का। नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की एक रोचक कहानी है। नेहरू हर तरफ अपनी जय-जयकार सुन कर ऊब चुके थे। उनको लगता था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं।

नवंबर 1957 में नेहरू ने मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक जबर्दस्त लेख लिखा। चाणक्य के नाम से ‘द प्रेसिडेंट’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताया। उन्होंने कहा कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वे सीजर हो जाएं।

मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। नेहरू ने उनसे अपील की कि उन्हें बख्शा न जाए। फिर शंकर ने नेहरू पर जो कार्टून बनाए उनका संग्रह इसी नाम से प्रकाशित हुया- ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लंबे समय तक प्रतिबंध को नेहरू ने ठीक नहीं माना। उनका मानना था कि आजाद भारत में इन तरीकों का प्रयोग जितना कम किया जाए, उतना अच्छा। नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद में जरूर पहुंचें, जो हर मौके पर नेहरू पर जबर्दस्त हमला बोलते थे।

उनकी आर्थिक योजना, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं, ने देश को एक मजबूत आधार दिया। जिस वक्त भारत आजाद हुया, उसे नब्बे प्रतिशत मशीनरी बाहर से आयात करनी होती थी। जर्मनी को छोड़ कर हर जगह से तकनीक का आयात किया गया। महालनोबिस योजना का मुख्य उद््देश्य भारी उद्योगों को बढ़ावा देना था। ठहरी हुई खेती के साथ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करना एक बड़ा सवाल था। नेहरू ने लोकतांत्रिक दायरों में रह कर भूमि सुधार किए। डेढ़ सौ साल पुरानी जमींदारी व्यवस्था को खत्म करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी।

गरीबों को ऊपर उठाने के लिए नेहरू और उनके योजनाकारों ने सामुदायिक व्यवस्था का सहारा लिया। नेहरू ने गांवों में ग्राम-सेवकों की पूरी फौज भेज दी। नेहरू उद्योग और कृषि में कोई फर्क नहीं करते थे। उनके मुताबिक दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई चीजें थीं। उनको विकास का महत्त्व पता था। वे मानते थे कि गरीबी का बंटवारा नहीं किया जा सकता, सबमें बांटने के लिए उत्पादन जरूरी है। लेकिन उसके लिए वे खेती से समझौता नहीं करते थे।

उन्होंने देश में हरित क्रांति की परिस्थितियां तैयार कीं। देश के पंद्रह जिलों में एक पाइलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। उनकी मृत्यु के बाद शास्त्रीजी ने हरित क्रांति को साकार कर दिया। डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पहले इक्कीस सालों में किया गया, उतना दो सौ साल किए गए काम के बराबर है। दुनिया के लगभग सारे अर्थशास्त्री- जिन्होंने नेहरू की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया- नेहरू की रणनीति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

नेहरू के विजन में गरीब लोकतंत्र की कसौटी था। उन्होंने तय किया कि गरीबों के हित परिदृश्य से बाहर नहीं फेंके जा सकते। उन्होंने गरीबों के प्रति पक्षधरता का वह बुनियादी सोच पैदा किया कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दबाव के बाजवूद गरीब किसान-मजदूर अब भी बहस का सामान्य मुद्दा बने हुए हैं। नेहरू मानते थे, ‘लोकतंत्र समाजवाद के बिना अधूरा है और समाजवाद लोकतंत्र के बिना’।

बात नेहरू के महिमामंडन की नहीं है। नेहरू की विफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं। लेकिन हर नेता अपने समय के संदर्भ में निर्णय लेता है, नीति बनाता है। जो कमियां-कमजोरियां आज हमें दिखाई दे रही हैं, वे नेहरू को नहीं दिख रही थीं। क्योंकि नेहरू अपने युग में बैठ पर दुनिया देख रहे थे। उस पर से तमाम भयानक चुनौतियों के बीच।
हमारे बीच एक बड़ा दंगा, एक बड़ी आपदा, सब-कुछ उथल-पुथल कर देती है। नेहरू ऐसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह लड़ रहे थे, जहां विफलता ही नियति थी। एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था- हमने अपनी विफलताओं से ही सही, देश की सेवा तो की।

मोहित सेन ने लिखा है कि तिब्बत सीमा विवाद के वक्त चीन ने नेहरू का कद छोटा करने के लिए उनका चरित्र हनन करना शुरू किया था। चीनी नेतृत्व (इसमें माओ शामिल नहीं थे) का मानना था कि नेहरू से टकराने के लिए, नेहरू का कद घटाना जरूरी है। यही बात सांप्रदायिक दलों पर लागू होती है। क्योंकि नेहरू उनके लिए खतरनाक हैं।

(सौरभ वाजपेयी)  – जनसत्ता 6 जून 2015
मार्च 10, 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति : प्रभाष जोशी की दृष्टि में

prabhasjoshiजनसत्ता के यशस्वी संपादक  प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन?

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)

….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.

सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.

(साभार- जनसत्ता)

अगस्त 15, 2011

तिरंगा: कहाँ हैं इसे ऊँचा रखने वाले?

हम कब जानते हैं
स्वतत्रता दिवस का अर्थ?

हाथ रिक्शे–ठेले खेंचते
फावड़े-कुदाल चलाते
पसीने में नहाये जिस्मों के लिए
भीख के लिए फैले हाथों के लिए
मजदूर-किसानों के लिए
चंद एक रुपयों का मिलना
सर्वोपरी और महत्वपूर्ण है।

सदियों से मुफलिसी के गुलामों को
आज़ादी के दिन का क्या पता?

बाकी बचे छात्र–बाबू–नौकरीपेशा-व्यापारी
उनके लिए यह पावन दिन
औकात के मुताबिक
फार्म हाउसों से चाय की थडी तक
मौज मस्ती मनाने के लिए
सरकारी छुट्टी के सिवा कुछ नहीं।

किसे याद हैं
कौन याद दिलाता है.
गोलियाँ, लाठियां, काला पानी और जलियाँवाला
भगत सिंह, बोस, अशफाक….
अनगिनत थे आज़ादी के परवाने।

बेचारे अमिताभ-सलमान से हार गए
हमने राष्ट्रपिता उस नंगे फकीर
बापू का
आज़ादी के बदले शुक्रिया गोली से दिया
अब हम उसके ऐनक चुराते फिर रहे हैं।

हम ज़मीर फरोशों के
चहरों पर मुंह नहीं मुखौटे हैं
फिर शर्म किसे आयेगी
तिरंगा ही तो फहराना है
ऐसे नहीं तो वैसे
जैसे-तैसे फहरा ही देंगे।

(रफत आलम)

मई 27, 2011

नेहरु, ओशो और हिंदी फिल्में

आज भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरु की पुण्यतिथि है। 1948 की 30 जनवरी को गाँधी की हत्या के बाद भारत के लिये प. नेहरु का चले जाना बहुत बड़ा आघात था। गाँधी के बाद सरदार पटेल भी जल्दी ही धरा छोड़ गये और बहुत सारे अन्य स्वतंत्रता सेनानी भी पचास के दशक में जीवन का त्याग कर गये परंतु देश में नेहरु की उपस्थिति ने एक आशामायी मोर्चा संभाला हुआ था। वे निरंतर भारत को लोकतांत्रिक, आधुनिक, प्रगतिवादी, और स्वावलम्बी बनाने की ओर प्रयासरत थे और उनके द्वारा निर्मित की गयी नीवों पर बाद में विशाल इमारतें खड़ी हो गयीं और आज बहुत सारे क्षेत्रों में भारत समर्थ दिखायी देता है तो उसका बहुत सारा श्रेय प. नेहरु की दूरदृष्टि को भी जाता है।

जब एक बहुत बड़े कद का नेता सक्रिय राजनीति के कारण प्रशासन में सीधे सीधे बड़ा पद ग्रहण करता है तो स्वाभाविक रुप से उसके चारों तरफ उसके विरोधी भी उत्पन्न हो जायेंगे। प. नेहरु भी इस प्रतिक्रिया से अछूते नहीं रहे। उनके प्रधानमंत्री बनते ही उनके विरोधी गुट भी सक्रिय हो गये थे। लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिये। पर जैसा विश्वास भारत की जनता को प. नेहरु पर था वैसा किसी अन्य प्रधानमंत्री पर कभी नहीं बन पाया। कश्मीर और चीन के भारत पर आक्रमण के मुद्दे को लेकर बहुत सारे लोग और संगठन नेहरु को हमेशा से ही निशाना बनाते रहे हैं और कई बार तो इन मुद्दों को लेकर कुछ अतिवादी संगठन हद पार करके असंसदीय और अलोकतांत्रिक किस्म की बातें नेहरु के बारे में फैलाते रहे हैं। लघु काल के लिये वे अपने दुष्प्रचार में सफलता पाते भी दिखायी देते रहे हैं पर भारत प. नेहरु से दूर नहीं जा सकता। प. नेहरु का न तो व्यक्तित्व ही इतना हल्का था और न ही उनका दृष्टिकोण इतना छोटा था कि उनकी प्रासंगिकता भारत से खत्म हो जाये।

आज जब चारों तरफ आदिवासी इलाके जल रहे हैं तब भी नेहरु की नीति की याद हो आती है। उनके जैसा प्रधानमंत्री भारत में 90 के दशक में होता, जबकि भारत आर्थिक, साम्प्रदायिक और जातीय आधार पर उथल-पुथल से गुजरकर लड़खड़ा रहा था, तो भारत में एकता और अखण्डता इस तरह से विखण्डित न नज़र आती जैसी कि आज के दौर में नज़र आ रही है।

ओशो बुनियादी तौर पर ही राजनीतिज्ञों के खिलाफ थे और सारी उम्र वे उनके खिलाफ बोलते ही रहे। उन्हे निशाना बनाते रहे। उनके ऊपर चुटकले बनाकर लोगों को शासकों की इस जाति के सामने मानव को आँखें मूँद कर समर्पण न कर देने के लिये चेताते रहे। अगर दुनिया में किसी एक राजेनीतिज्ञ को ओशो ने पसंद किया तो वे प. नेहरु ही थे।

अपने संस्मरणों में प. नेहरु के बारे में ओशो कहते हैं –

… जीवन में पहली बार मैं हैरान रह गया। क्‍योंकि मैं तो एक राजनीतिज्ञ से मिलने गया था। और जिसे मैं मिला वह राजनीतिज्ञ नहीं वरन कवि था। जवाहर लाल राजनीतिज्ञ नहीं थे। अफसोस है कि वह अपने सपनों को साकार नहीं कर सके। किंतु चाहे कोई खेद प्रकट करे, चाहे कोई वाह-वाह कहे, कवि सदा असफल ही रहता है यहां तक कि अपनी कविता में भी वह असफल होता है। असफल होना ही उसकी नियति है। क्‍योंकि वह तारों को पाने की इच्‍छा करता है। वह क्षुद्र चीजों से संतुष्‍ट नहीं हो सकता। वह समूचे आकाश को अपने हाथों में लेना चाहता है।…

…एक क्षण के लिए हमने एक दूसरे की आंखों में देखा। आँख से आँख मिली और हम दोनों हंस पड़े। और उनकी हंसी किसी बूढ़े आदमी की हंसी नहीं थी। वह एक बच्‍चे की हंसी थी। वे अत्यंत सुदंर थे, और मैं जो कह रहा हूं वही इसका तात्‍पर्य है। मैंने हजारों सुंदर लोगो को देखा है किंतु बिना किसी झिझक के मैं यह कह सकता हूं कि वह उनमें से सबसे अधिक सुंदर थे। केवल शरीर ही सुंदर नहीं था उनका।…

…अभी भी मैं विश्‍वास नहीं कर सकता कि एक प्रधानमंत्री उस तरह से बातचीत कर सकते है। वे सिर्फ ध्‍यान से सुन रहे थे और बीच-बीच में प्रश्न पूछ कर उस चर्चा को और आगे बढा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे चर्चा को सदा के लिए जारी रखना चाहते थे। कई बार प्रधानमंत्री के सैक्रेटरी ने दरवाजा खोल कर अंदर झाँका। परंतु जवाहरलाल समझदार व्‍यक्‍ति थे। उन्‍होंने जान बूझ कर दरवाजे की ओर पीठ की हुई थी। सैक्रेटरी को केवल उनकी पीठ ही दिखाई पड़ती थी।

परंतु उस समय जवाहरलाल को किसी की भी परवाह नहीं थी। उस समय तो वे केवल विपस्‍सना ध्‍यान के बारे में जानना चाहते थे।…

…जवाहरलाल तो इतने हंसे कि उनकी आंखों में आंसू आ गए। सच्‍चे कवि का यही गुण है। साधारण कवि ऐसा नहीं होता। साधारण कवियों को तो आसानी से खरीदा जा सकता है। शायद पश्‍चिम में इनकी कीमत अधिक हो अन्‍यथा एक डालर में एक दर्जन मिल जाते है। जवाहरलाल इस प्रकार के कवि नहीं थे—एक डालर में एक दर्जन, वे तो सच में उन दुर्लभ आत्माओं में से एक थे जिनको बुद्ध ने बोधिसत्‍व कहा है। मैं उन्‍हें बोधिसत्‍व कहूंगा।…

…मुझे आश्‍चर्य था और आज भी है कि वे प्रधानमंत्री कैसे बन गए। भारत का यह प्रथम प्रधानमंत्री बाद के प्रधानमंत्रियों से बिलकुल ही अलग था। वे लोगों की भीड़ द्वारा निर्वाचित नहीं किए गए थे, वे निर्वाचित उम्मीदवार नहीं थे—उन्‍हें महात्‍मा गांधी ने चुना था। वे महात्‍मा गांधी की पंसद थे।

और इस प्रकार एक कवि प्रधानमंत्री बन गया। नहीं तो एक कवि का प्रधानमंत्री बनना असंभव है। परंतु एक प्रधानमंत्री का कवि बनना भी संभव है जब वह पागल हो जाए। किंतु यह वही बात नहीं है।

तो मैं ने सोचा था कि जवाहरलाल तो केवल राजनीति के बारे में ही बात करेंगे, किंतु वे तो चर्चा कर रहे थे काव्‍य की और काव्यात्मक अनुभूति की।…

पचास और साठ के दशक तक हिंदी सिनेमा भी नेहरु के विशाल व्यक्तित्व के प्रभाव से अछूता नहीं रहा और हिंदी फिल्मों के नायकों का चरित्र भारत को लेकर नेहरुवियन दृष्टिकोण से प्रभावित रहा और उसमें चारित्रिक आदर्श की मात्रा डाली जाती रही।

उन सालों में भारतीय लोगों और बच्चों में प. नेहरु के लिये कितना आकर्षण था इस बात को भी अब दिल्ली दूर नहीं (1957) और नौनिहाल (1967) फिल्म में दिखाया गया है।

नौनिहाल में तो प. नेहरु की मृत्यु के बाद उनकी शवयात्रा पर उमड़े जन-सैलाब की असली फुटेज इस्तेमाल की गयी थी। गाँधी की मृत्यु के बाद नेहरु की मौत पर ही इतना व्यापक जन समूह जुटा था और शोक की ऐसी विश्वव्यापी लहर उठी थी।

आज भारत में बहुत कुछ जो विकसित हुआ है और बहुत कुछ जो अच्छा दिखायी देता है, उसमें बहुत बड़ा योगदान प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु के प्रगतिवादी दृष्टिकोण का भी है। प्रशासन चला रहा व्यक्ति कुछ ऐसे निर्णय भी लेगा जो शायद उतने लाभकारी न सिद्ध हो पायें जितने कि लोगों ने सोच रखे थे और फिर नेहरु जैसे बड़े नेताओं से लोगों की अपेक्षायें भी साधारण नहीं रहतीं।

किसी भी कोण से और किसी भी कसौटी पर रखकर, मगर ईमानदारी और निष्पक्षता से, परखा जाये, प. नेहरु भारत के सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री रहे हैं। वे भारत के इतिहास के एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति बन चुके हैं।

उनके द्वारा किये गये कार्यों से लोकतांत्रिक भारत को जो लाभ पहुँचे हैं उनके लिये नमन है ऐसी विभूति को।

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