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मई 18, 2014

हाथी-घोड़ा-पालकी : कहानी भाजपा की जीत, और कांग्रेस के Fall की!

कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है!

भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336 सीटों में भाजपा को 282 सीटें दे दी हैं। यानी अब सरकार चलाने को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत नहीं, न काम करने या न करने के पीछे गठबंधन को जिम्मेदार ठहराने के बहाने ढूंढ़ने की गुंजाइश। पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा 244 सीटें कांग्रेस को मिली थीं, 1991 में। खरीदफरोख्त के बाद गठबंधन सरकार बनी, घोटाले हुए। फिर गठबंधन का युग चल निकला। मनमोहन सिंह जैसे भले मगर नाकारा प्रधानमंत्री की नाक नीचे विराट घोटाले हुए , ठीकरा फिर गठबंधन के मत्थे फोड़ा गया। क्या इसी सब के चलते जनता जनार्दन ने नरेंद्र मोदी की ‘अच्छे’ दिनों या सुशासन की पुकार सुनी। और उन्हें प्रचण्ड बहुमत अता फरमाया है?

हम जानते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संदेह का लाभ देते हुए जनता ने पांच साल पहले दुबारा चुना था। एक भले और अर्थशास्त्र के विद्वान प्रधानमंत्री को पूरे दस बरस राज करने का मौका मिला। लेकिन प्रगति की जगह बंटाढार हुआ। भले ही क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की तर्ज पर मनमोहन सिंह ने कहा कि भविष्य में इतिहास उन्हें सही समझेगा। उनके एक सलाहकार ने चुनाव के बीच मुनादी की कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई है, उतनी मानव जाति के इतिहास में किसी देश में कभी न हुई होगी। लेकिन ऐसे दावे इतिहास की प्रविष्टियों से अर्थवत्ता नहीं पाते। लोग देखते हैं कि उनके दैनंदिन जीवन में क्या प्रगति हुई है। देश की अर्थव्यवस्था कहां पहुंची है। आटे-दाल का भाव कम हुआ है या ज्यादा। रुपया कितना चढ़ा या लुढ़का है। देश में हिंसा बढ़ी है या घटी है। खेती, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण या हवा-पानी आदि जीवन से सीधे जुड़े क्षेत्रों में हम कितना आगे बढ़े हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का सचमुच कितना उद्धार हुआ है। दूसरे देशों की नजरों में हमारी साख ऊंची हुई है या गिरी है।

कहना न होगा, इन सवालों के जवाब में हाथ मलता भारतवासी चुनाव नजदीक आते-न-आते अपने सबसे ताकतवर हथियार- मताधिकार- की धार तेज करने में लग गया था। जिस कारपोरेट जगत यानी बड़ी पूंजी के जमावड़े ने कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह उसे उखाड़ फेंकने में जुट गया। गुजरात में विकास के नारे उछालने वाले नरेंद्र मोदी से उसका इश्क पहले से परवान पर था। हालांकि कांग्रेस ने चुनिंदा मंत्री तक कारपोरेट घरानों की मरजी मुताबिक नियुक्त किए थे। राडिया टेप याद करें तो यह दास्तान याद आएगी। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का बेदाग ‘परसोना’ थे, मगर कारपोरेट को उनसे बाजार को संभाल लेने की उम्मीदें थीं। मोहभंग होने पर कमान उनके हाथ से खिंचने लगी। मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब के हवाले खयाल करें तो वित्त मंत्री तक प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर तय होने लगे। खुद को सत्ता का निर्मोही जाहिर कर सोनिया गांधी ने आखिर मनमोहन सिंह को भोलेपन में आगे नहीं किया था। वे तन कर खड़े नहीं हो सकते थे। क्वात्रोकी की मुक्ति जैसे मामले तो बहुत मामूली थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते जितने बड़े आर्थिक घोटाले सरकार में हुए , पहले कब हुए होंगे? मगर सोनिया-मनमोहन भी सब उद्यमियों की इच्छाएं पूरी न कर सके। नतीजतन ताकतवर कारपोरेट का नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े होना कांग्रेस के लिए खतरे की खुली घंटी बन गया।

जो इस खेल को समझने से आंख चुराएगा, उसे सब मोदी का जलवा दिखाई देगा। ‘मोदी-मोदी’ या ‘हर-हर मोदी’ का रंग-रोगन बाद का है। इतना तो गाफिल भी कहता मिलेगा कि ऐसा खर्चीला चुनाव पहले नहीं देखा। पैसा पानी का तरह नहीं बहा, हवा की तरह उड़ा। सिर्फ इसलिए नहीं कि रोज के दो-तीन लंबे दौरों-सभाओं के बाद शाम को मोदी को अपने घर गांधीनगर लिवा लाने के लिए दो गुजराती उद्योगपतियों के तीन हवाई जहाज तैनात रहते थे। आधुनिक तकनीक वाले तमाम प्रचार माध्यमों और पेशेवर प्रतिभाओं की मदद से प्रधानमंत्री पद के दावेदार का सुनियोजित रूपक गढ़ा गया। मीडिया का एक हिस्सा मिलीभगत में अभियान का हिस्सा बन गया। साबुन-तेल के प्रचार की मानिंद मॉडलिंग करते ‘मोदीजी’ का रूपक गली-गली हर जुबान पर पहुंचाया गया। कोई अखबार, टीवी, रेडियो, सड़क, दीवार, यहां तक कि सोशल मीडिया पर बेनामी षड्यंत्रकारी भी खाली न रहे। जरा सोचें कि इतने संसाधनों, तैयारी के साथ प्रचार अभियान की कमान अगर सुषमा स्वराज के हाथ होती तब भी परिणाम क्या बहुत भिन्न होते?

पर प्रचार के ऊपर मोदी की ऊर्जा, और नाटकीय सही, वक्तृता अलबत्ता असरदार ज्यादा रही। चरमराई अर्थव्यवस्था, महंगाई, असंतुलित विकास, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उन्होंने सबसे अहम मुद्दा बनाया। युवा वर्ग, खास कर नए मतदाता को रोजगार का झुनझुना थमाया। गुजरात का सच्चा-झूठा विकास का मिथक उनकी स्थायी टेक बन गया। आखिरी दौर में उन्होंने जातिवादी पत्ता भी चलाया, मुसलमान बस्तियों में घूमे, मुसलिम बुजुर्गों के पांव छुए। तूफानी दौरों में अपने सीमित या फिसलते ज्ञान (अंडमान में भगत सिंह, बिहार में तक्षशिला, गंगा किनारे सिकंदर, मौर्य नहीं गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त, श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्थियां आदि) के बावजूद कांग्रेस से ऊबे मतदाताओं में मोदी यह उम्मीद जगाने में सफल रहे कि वे परिवर्तन ला सकते हैं। प्रचार प्रबंधकों के गढ़े नारे और गाने (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट… हम मोदीजी को लाने वाले हैं… अच्छे दिन आने वाले हैं!)  पुरउम्मीद और आहत मतदाता के लिए मरहम का काम करते दिखाई दिए। अनेक राजनीतिक दल हाशिए पर जाने लगे। उत्तर प्रदेश में बसपा पता नहीं कहां धंस गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने अपनी जमीन खो दी। कारण कांग्रेस वाला ही था। लोग उन्हें आजमा चुके थे और मोहभंग से त्रस्त थे।

इसे प्रचार अभियान का एक अंग कहना ही मुनासिब होगा कि कांग्रेस केंद्रित गठबंधन से उकताए लोगों की परिवर्तन की चाह को चौतरफा ‘मोदी लहर’ के रूप में देखा गया। सच्चाई यह है कि ‘मोदी लहर’ के प्रादुर्भाव के बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे। लोगों ने पंद्रह साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद हार गईं। चुनाव से पहले रोहिणी में नरेंद्र मोदी विराट जनसभा में अपनी रणभेरी बजा गए थे। लेकिन लोगों ने दुबले-पतले मफलर-शुदा अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली आम आदमी पार्टी को ज्यादा उम्मीद से देखा।

दिल्ली की सफलता ने केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर पंख पसारने को प्रेरित किया। पर यह फैसला जल्दबाजी का साबित हुआ। फिर बड़े पूंजीपतियों पर हाथ डालते हुए केजरीवाल ने उनको मोदी के हक में पूरी ताकत से एकजुट होने को ही प्रेरित किया। बहरहाल, केजरीवाल पार्टी से ज्यादा एक विचार के रूप में सामने आए थे। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और राहुल गांधी के साथ वे ही केंद्र में नजर आए। जीते ज्यादा नहीं, पर कई जगह उनके उम्मीदवार पार्टी की पहचान बनाने में सफल रहे। मतों का अहम हिस्सा उनकी झोली में भी आया है। दिल्ली में उनके मतों का प्रतिशत बढ़ा है। खुद नरेंद्र मोदी को बनारस में केजरीवाल ने नाकों चने चबाने वाली टक्कर दी। एक नई पार्टी के लिए अपनी पहचान को इतने कम समय में इतना विस्तार देना मामूली बात नहीं। हैरानी नहीं होनी चाहिए जो आने वाले दिनों में मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, करुणानिधि आदि दिग्गज नेताओं के बरक्स उनकी पहचान और पुख्ता हो।

इस घटाटोप में कांग्रेस के खेवनहार बनने वाले राहुल गांधी तो पार्टी के लिए बोझ ही साबित हुए हैं। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने, चुनाव समिति की कमान भी संभाली। वे पार्टी में साफ छवि के उम्मीदवारों के साथ नई बयार लाना चाहते थे। पर खूसट नेताओं के सामने उनकी शायद ज्यादा न चली। मोदी से कम, पर खर्चीले चुनाव प्रचार को निकले। भाषणों में उनके पास ठोस मुद्दे न थे। पार्टी के पुराने मुसलिम-आदिवासी ‘वोट बैंक’ में भी पराए सेंध मार गए। खुद के चुनाव क्षेत्र में बेड़ा पार लगाने के लिए उन्हें छोटी बहन- और पूर्णकालिक राजनीति में अनिच्छुक- प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर देखना पड़ा। ऊंच-नीच की राजनीति के जुमले छेड़ प्रियंका खबरों में रहीं, पर दोनों मिलकर भी मतदाताओं में एक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर सके।

इस सब के बीच यह घड़ी अंतत: नरेंद्र मोदी को शिखर पर ले आई है। इसके श्रेय पर भाजपा का अपना दावा भले हो। पर पुरजोर दावा संघ ने किया है, जिसके स्वयंसेवकों ने पहली बार इस कदर जी-जान एक की। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी। वजह साफ थी कि पहली बार उनके भरोसे का स्वयंसेवक (वाजपेयी पर इतना भरोसा संघ बाद में कब करता था!) देश की कमान का दावेदार था, विशुद्ध रूप से संघ परिवार के काडर के भरोसे। इसी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपने ही लोगों के बीच इतना शक्तिमान बनाया कि आडवाणी घर जा बैठे, मुरली मनोहर जोशी की सीट मोदी ने हथिया ली, सुषमा स्वराज राष्ट्रीय पटल से अपने चुनाव क्षेत्र भेज दी गईं, वेंकैया नायडू अंतर्धान मुद्रा में चले गए, जसवंत सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए। गडकरी-जेटली रास्ते पर चले। राजनाथ सिंह ने संघ की बंसी के सुर मोदी के इशारों के अनुरूप रखे। गुजरात के सबसे विवादास्पद नेता अमित शाह ‘साहेब’ की कृपा से और सबों से आगे जा बैठे। इसी के चलते मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने आए हैं। यह मोदी की जीत है, मगर कहीं गहरे पार्टी की हार है।

मोदी का मानस कट्टर पहचान देता आया है। सेकुलर विचार उनके घेरे में शायद ही किसी को भाता हो। गोधरा के बाद का खूनखराबा अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे संबोधनों की शैली और राममंदिर उनकी विचार-पद्धति का अंग माने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने आप को संभाला है। क्या इनसे वे अपने आपको हमेशा के लिए ऊंचा उठा पाएंगे? बाजार को भी उनसे बड़ी आशाएं हैं। मनमोहन सिंह सरकार ढीली थी। दो-दो मंत्री बदलकर भी अंबानी को गैस के मनचाहे दाम न दे सकी। क्या मोदी देंगे? गैस महज एक कसौटी है। कारपोरेट की तो बहुत बड़ी झोली उनके सामने पसरी है।

लेकिन उससे बड़ा फलक जनता की उम्मीदों का है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं। पड़ोसियों से तनाव के रिश्ते हैं। आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता है। विभिन्न समुदायों में आपसी सौहार्द वक्त की जरूरत है। इन सब मामलों में कुछ को चाहे मोदी से बहुत कम आशाएं हों, पर देश को उन्होंने बड़े सपनों में बांधा है। पर लोगों को बुलेट ट्रेन से ज्यादा अमन-चैन का जीवन यानी सांप्रदायिक सौहार्द चाहिए। आजाद भारत में अल्पसंख्यक भयभीत होकर कैसे जी पाएंगे। जीत के गाजे-बाजे और हाथी-घोड़ा-पालकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि क्या  इस विराट विजय के बाद मोदी अपना मानस बदलने को तैयार हैं? कमजोर विपक्षके बीच यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है। लोग उनसे रामराज्य यानी सुशासन की उम्मीद रखते हैं। मगर माईबाप संघ अभी से उन्हें राममंदिर और ऐसे ही संकीर्ण लक्ष्यों की याद दिलाने लगा है। देखते हैं देश को रामराज्य हासिल होता है या राममंदिर। या दोनों नहीं।

साभार : श्री ओम थानवी, संपादक – जनसत्ता

मार्च 10, 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति : प्रभाष जोशी की दृष्टि में

prabhasjoshiजनसत्ता के यशस्वी संपादक  प्रभाष जोशी का यह लेख 10 मार्च, 2008 को जनसत्ता में छपा था|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभक्तों का महान संगठन?

(अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है.)

….अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायक ”भारत छोड़ो आंदोलन” के दौरान वे खुद क्या कर रहे थे? उनने खुद ही कहा है- ”मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.” संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है न तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है) खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर आ गए.

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर का ”हिन्दुत्व” निकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा. सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने न सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया न अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया.”

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी लगाई तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.” (ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे) पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.

सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.” हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा. सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं.

(साभार- जनसत्ता)

जून 19, 2011

उदारीकरण और भारत

बतकही : आरम्भ और
सोनिया गाँधी और संघ परिवार से आगे
:-
9 जनवरी, 2005

तीनों लोग धीरे धीरे चलकर पार्क में पहुँच गये। एक तरफ कुछ बच्चे टेनिस की बॉल से क्रिकेट खेल रहे थे। तीनो लोग पार्क के दूसरे कोने की और बढ़ गये जहाँ सीमेन्ट की बैंचें भी लगी हुयी थीं।
तीनों ने बैंचों पर न बैठकर नीचे घास में ही आसन जमा लिया। हरीश बाबू तो अपनी दायीं करवट से लेट ही गये और ​िसर को दायें हाथ के सहारे से उठा दिया। विजय बाबू ने बैठकर अपने दोनो हाथों को शरीर से पीछे जमीन पर टिका दिया।

अशोक बाबू सुखासन की मुद्रा में बैठ कर बोले ये विकास प्राधिकरण द्वारा विक​सित कालोनियों में ये बात अच्छी है कि ये पार्क आदि के लिये प्रावधान रखते हैं। कभी कभार यहाँ आकर बैठना हो जाता है और बच्चों को खेलने की जगह मिल जाती है वरना सड़क पर खेलते रहते हैं।

ये बात तो है ही। फिर सारी चीजें पूर्वनियोजित रहती हैं ऐसी परियोजनाओं में। नब्बे डिग्री पर आपस में काटती सड़के मिलती हैं। सीवेज ​सिस्टम पहले से मिलता है। फिर अपनी इस कालोनी के तो बहुत सारे फायदे हैं। शहर के कोलाहल और प्रदुषण से दूर। बस एक परिवहन की समस्या है यदि अपना वाहन खराब हो या न हो तो शहर जाने की दिक्कत है। पर ये भी दो तीन सालों में ठीक हो जायेगा। विजय बाबू ने कहा।

कुछ सालों में नहीं विजय बाबू। साल भर में ही। आपको पता है मेन रोड से जो डबल लेन हमारी कालोनी की तरफ आ रही है वहाँ शुरूआत में ही ​स्थित बाग वाली जमीन का विवाद सुलझ गया है और जमीन बिक गयी है। वहाँ जल्दी ही एक मल्टीप्लैक्स और एक शापिंग मॉल बनने वाला है। हरि बाबू ने सूचित करते हुये कहा।

अजी वो आम के बाग वाली जमीन की बात तो नहीं कर रहे आप। वो तो जमीन ही करोड़ों की है, किसने ले ली? अशोक बाबू ने अचरज प्रकट किया।

हाँ जी वही जमीन जो कारगिल मे शहीद हुये मेजर के नाम पर खुले पैट्रोल पम्प के पीछे है। ऐसा सुना जा रहा है कि जो उद्योगपति इस बार एम.पी. की सीट के लिये चुनाव में खड़ा हुआ था, उसी ने सारी जमीन खरीदी है। हरि बाबू ने आगे बताया।

इनका क्या है, धनी लोग हैं। जो चाहे खरीद लें जो चाहे बना लें जैसा चाहे बना लें। दिक्कत तो आम आदमी की है। यदि मकान में एक खिड़की भी बाद में अतिरिक्त बनवानी पड़ जाये तो ये प्राधिकरण और नगर निगम वाले खून पी जाते हैं आदमी का कि आपने बना कैसे ली बिना उनकी मंजुरी के। विजय बाबू ने कहा।

बात आप सही कह रहे हो जनाब। हमारे घर से दो मकान छोड़कर विकास प्राधिकरण का इंजीनियर रहता है। उसने पूरे मकान का नक्शा ही बदल दिया है कौन उसे कहने आयेगा। और एक हमारे पीछे पेपर मिल का इंजीनियर रहता है। बेचारे ने पीछे वाली खाली जमीन पर दो कमरों का सैट बनवा लिया ये सोचकर कि प्राइवेट नौकरी है और कम्पनी की हालत डांवाडोल चल रही है। बन्द भी हो सकती है और ऐसा हो गया तो नये बनाये दो कमरे किराये पर दे देगा।
एकदम से दूसरी नौकरी मिले न मिले। उसे रूला मारा प्राधिकरण वालों ने। मेरे पास आया था सोचकर कि शायद मेरी पहचान होगी विकास प्राधिकरण के इंजीनियर से। हम गये भी पर इससे बस इतना हुआ कि जो पैसा उससे माँगा जा रहा था उसमें कुछ घटोत्तरी हो गयी। हमारी तो समझ में आता नहीं कि जब प्राधिकरण मकान बेच दिये पीछे की खाली जमीन के भी पूरे पैसे लेकर तो अब खरीदने वाला आदमी कुछ भी करे उस जमीन का चाहे तो अमरूद के पेड़ लगाये या ताजमहल बनाये। उसकी मर्जी। भाई अगर कोई ऊपर की मंजिल बना रहा है या मकान के आगे की सरकारी जमीन हड़प रहा है तब तो विरोध की बात समझ में आती है पर जिस जमीन का पैसा प्राधिकरण पहले ही ले चुका है उस पर निर्माण करनें से उनके पेट में दर्द क्यों होता है? अशोक बाबू गुस्से में बोले।

इन सरकारी दफतरों का हिसाब ऐसा ही है। जहाँ जिसे जो पावर मिली हुयी है वह उसी का रोब दिखाकर कमाई कर रहा है। इन दफतरों के चक्कर में फंस कर अच्छा भला आदमी पागल हो जाये। आदमी को ये इतने कानून बता देंगे कि आदमी उस काम से ही तौबा कर लेगा। यहाँ अपने देश में तो एक ही चीज चलती है मुद्रा। पैसा दो और काम कम बाधाओं के साथ कराओ। घूस लेना देना फैशन हो गया है और अब तो लगता ही नहीं कि कोई ऐसा विभाग भी होगा जहाँ आज भी बिना धन दिये काम हो सकता हो। विजय बाबू ने कहा।

अजी आप लोगों को भले ही पसन्द न हो भाजपा पर भाजपा के राज में ही इंस्पेक्टर राज खत्म हो रहा था। सब तरह के कंट्रोल सरकार हटा रही थी। पहले रसोई गैस सिलिन्डर का क्या हाल था बुक कराने के कितने समय बाद कनेक्शन मिलता था अब आज के आज ले लो। पहले स्कूटर बुक कराने के सालों बाद स्कूटर घर में आ पाता था आज एक दिन में बीस स्कूटर आप खरीद लो। ऐसा ही टेलिफोन के साथ है। भाजपा ने सोने की तस्करी का तो धंधा ही बंद करा दिया। सड़कों वाली स्वर्णिम चतुर्भज परियोजना को ही देख लो। आठ आठ लेन के हाइवे। कुछ साल और भाजपा रह जाती तो इतना चमका जाती देश को कि विश्व शक्ति तो भारत दस सालों में ही बन जाता। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अजी दस साल कहाँ। भाजपा ने तो भारत को पिछले लोकसभा चुनावों में ही चमका दिया था। आप भूल गये क्या “इंडिया शाइनिंग” को? हरि बाबू ने मुस्कुराते हुये कहा।

अशोक बाबू को अपनी ओर देखता पाकर वे आगे बोले ऐसा नहीं है कि भाजपा ने काम नहीं किया। पर जितने आपने काम गिनाये उनमें से बहुत सारे काम या तो राव सरकार में शुरू हो गये थे बल्कि कुछ योजनाओं पर अमल तो राजीव गांधी ही शुरू करवा चुके थे जैसे टेलिफोन की बात आपने की। भारत में दूरसंचार क्रान्ति राजीव गांधी की देन है। इसी काम के लिये राजीव ने अमेरिका से सैम पित्रोदा को बुलाया था। सी डॉट आप भूल गये क्या। उस समय कितनी आलोचना राजीव की होती थी कि वह पित्रोदा जैसे टैक्नोक्रेट पर देश का पैसा लुटा रहे हैं। स्वर्णिम चतुर्भज सड़क परियोजना का पूरा खाका राव सरकार तैयार कर चुकी थी और ये हो सकता है कि बाद की संयुक्त मोर्चे की सरकारें इस पर अमल न कर पायी हों और राव सरकार द्वारा बोयी फसल भाजपा ने काटी। ये सब भी ठीक है पर दिक्कत तब आती है जब आप जब आप योजना बनाने वाले को इतना श्रेय भी न दो कि कम से कम उसने सोचा तो कि ऐसा हो सकता है। आप ही बताओ जब भाजपा ने किसी भी अच्छे काम का श्रेय अपने पूर्ववर्तियों को नहीं दिया तो भाजपा को कौन श्रेय देना चाहेगा।

विजय बाबू ने हरीश जी की बात समाप्त होते ही कहा आप एकदम लेटस्ट बात लो अशोक बाबू। अभी पिछले दिनों राव साहब का देहान्त हुआ और अटल जी ने कहा कि परमाणु विस्फोट की सब रूपरेखा राव के समय में ही बन गयी थी और तैयारी पूरी थी पर राव सरकार किसी कारण से ​विस्फोट नही करा पायी। अटल जी ने कहा कि जब वे पी0एम बने तो राव ने उनके हाथ में एक पर्चा दिया था जिस पर लिखा था कि सब तैयारी है आप आगे बढ़कर श्रीगणेश करें। अब अटल जी ने करीब छह साल सरकार चलायी और कितनी ही बार ऐसी बातें उठीं की कितनी ही ऐसी योजनायें हैं जो राव सरकार के समय में या तो निर्धारित हो गयीं थीं या शुरू हो गयी थीं और इन बातों का श्रेय राव सरकार को मिलना चाहिये पर न तो भाजपा ने न ही अटल जी ने ऐसी किसी बात का स्वागत किया बल्कि संघ परिवार इसी बात को गाता रहा कि भाजपा भाजपा के राज से पहले भारत में कुछ नहीं हुआ और देश गर्त में जा रहा था और पुरानी सब सरकारें बेकार थीं खास तौर पर कांग्रेस की सरकारें। अब अटल जी का बहुत पुराना सम्बंध राव साहब से रहा है और हो सकता है कि मित्र के देहान्त पर शोकाकुल होकर अटल जी ने भावावेश मे सच कह दिया हो और इस बात का आज की राजनीति से कोई मतलब न रहा हो। पर जब कहने का समय था तो अटल जी ने ये बात नहीं स्वीकारी। हमारी तो अटल जी से ये शिकायत रही ही है कि वे बात को तभी स्वीकारते हैं बाद में जब उस बात का कोई मतलब नहीं रहता और जब बात स्वीकारने का महत्व था तब वे राजनीति के दबाव के कारण चुप्पी साधे बैठे रहे। कितने ही ऐसे मामले हैं उनके छह साल के शासन में।

देखो जी भाजपा ने भारत को सड़े गले समाजवादी विचारों से और बाजार को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराया। अशोक बाबू कुछ हठधर्मिता के साथ बोले।

उदारीकरण तो राव सरकार के समय डा. मनमोहन ​सिंह ने शुरू कर दिया था और भाजपा और अन्य विपक्षी दल तब पानी पी पीकर उदारीकरण को कोसते थे। ढंग से याद नहीं आ रहा किस विपक्षी नेता ने संसद में कहा था कि राव साहब आप और मनमोहन ​सिंह जी आप सुन लें आने वाली पीढ़ियाँ आप दोनों को कभी माफ़ नहीं करेंगीं। हरि बाबू ने कहा।

अजी विपक्ष में रहकर सरकार का विरोध तो करते ही हैं राजनीतिक दल। भाजपा ने भी कर दिया होगा उदारीकरण का विरोध शुरू में। पर मुख्य बात तो ये है कि जब भाजपा की सरकार बनी तो उसने बाजार को उदार बनाया या नहीं। अशोक बाबू कुछ समझौते के स्वर में बोले।

विजय बाबू ने भी सहमति में ​सिर हिलाते हुये कहा कि ठीक कह रहे हो आप हमारे राजनीनिक दल सत्ता में रहकर एक ढ़ंग से व्यवहार करते हैं और विपक्ष में रहकर दूसरे ढ़ंग से। बल्कि कई बार तो अपनी ही सरकार द्वारा चलाये कार्यक्रमों का भी विरोध करने लग जाते हैं जब वही काम दूसरी सरकार चलाये रखना चाहती है। पर इन राजनीतिक चालबाजियों से अलग बात करूं तो जब इन्दिरा जी की सरकार फिर से बनी थी जनता पार्टी के शासन के बाद तो सन उन्नासी या सन अस्सी में ही इन्दिरा जी ने स्वराज पॉल को अनुमति दी थी भारत में उद्योगों में पैसा निवेश करने की और स्वराज पॉल ने अच्छी खासी रकम दो भारतीय उद्योगों में लगायी थी। याद नहीं आ रहा किस ग्रुप के उद्योग थे पर भारतीय उद्योगपति इतने सीधे हैं नहीं। उन्होने स्वराज पॉल के पौण्डस तो लगवा लिये थे अपने उद्योगों में पर उन्हे शेयर देने के समय मुकर गये थे और घबराकर या चालाकी में कोर्ट में चले गये थे। स्वराज पॉल का तो पैसा ही डूबा पर इन्दिरा गांधी के भारतीय बाजार में उदारीकरण लाने के प्रयासों पर तो पानी फिर गया वरना भारत भी चीन की तरह अपने बाजार विश्व के लिये सन अस्सी में ही खोल देता और भारत को सन नब्बे के शर्मनाक दौर से न गुजरना पड़ता जब विदेशी मुद्रा के लिये देश को सोना गिरवी रखना पड़ा।

सही कह रहे हो आप। भारतीय उद्योगपति बहुत चालाक रहा है। जब इनके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं था तो इन्होने सरकार को खूब सराहा बड़े बड़े सार्वजनिक उपक्रम खड़ा करने के लिये ताकि इन्हे सस्ते रॉ मैटिरियल मिलते रहें और सालों तक ये लोग खुद चाहते रहे थे कि बाजार पर सरकार इस तरह से नियंत्रण रखे जिससे दूसरे लोगों को लाइसेंस न मिल सके उस उत्पाद को बनाने का जिसे ये बनाते रहे हैं और उनकी मोनोपॉली चलती रहे। अब जब हर तरफ वैश्वीकरण का जोर है और ये लोग बिना किसी मल्टीनेशनल कम्पनी से गठजोड़ किये बाजार में रह नहीं सकते क्योंकि नयी तकनीक तो इन्होने विक​सित की नहीं कभी भी तो अब ये सरकार को कोसते हैं। पुराने ​सिस्टम को कोसते हैं। और हर गलत चीज सरकार के माथे मढ़ देते हैं। मानो इनके उद्योगों में शोध एवं विकास का कार्य करने भी उद्योगमंत्री जाता। हरि बाबू ने कहा।

हाँ कांग्रेस के जमाने में भारत में एक ही कार एम्बेस्डर बनती थी और उससे छूटो तो फियेट मिलती थी आज देखो बाजार अटा पड़ा है तरह तरह की कारों से। अशोक बाबू ने कहा।

अशोक जी मारूति भी कांग्रेस सरकार की ही देन है। इसके लिये सजंय गांधी की अच्छी खासी फजीहत हुयी थी विपक्ष द्वारा। जैसे राजीव गांधी की ऐसी तैसी कर रखी थी तब के विपक्ष ने कम्पयूटर के नाम पर कि देश का पैसा बिना मतलब ऐसी मशीनों पर खर्च किया जा रहा है जिनकी भारत को जरूरत ही नहीं है। आज मारूति सबसे ज्यादा कारें बेच रही है और निर्यात भी कर रही है। और कम्पयूटर का क्षेत्र विक​सित न होता भारत में तो जो नवयुवकों की फौज सॉफ्टवेयर आदि के काम में जुटी पड़ी है इसे कहाँ से तो रोजगार मिलता? आज तो ये लोग देश विदेश में झंडे गाड़ रहे हैं पर तब क्या होता? । हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू ने भी हामी भरते हुये कहाये तो बात है। चाहे ​सिविल इंजीनियरिंग का स्टुडैन्ट हो या मैकेनिकल का नौकरी सब सॉफ्टवेयर में कर रहे हैं । विजय बाबू को सोच में डूबा देखकर उन्होने पूछा आप किस सोच में पड़ गये?

मैं ये सोच रहा था कि सारी सरकारें सार्वजनिक उपकरणों को क्यों बन्द करना चाहती हैं? अब ये नये पेटेन्ट कानून का हल्ला उड़ा हुआ है कि इसके लागू होने के बाद दवाइयों के दाम आसमान छूने लगेंगे। अच्छा खासा आइ.डी.पी.एल था। जीवनरक्षक दवाइयां बनाता था और इस और इस कारण बाजार में ऐसी दवाइयों के मूल्य पर नियंत्रण रहता था। सरकार ने घाटे के नाम पर बन्द करा दिया सारा का सारा आइ.डी.पी.एल जबकि उसकी सब यूनिटें तो घाटे में थी नहीं। जो घाटे में थीं उन्हे बन्द कर देते। वैसे भी नेहरू के समय आइ.डी.पी.एल कोई लाभ कमाने के लिये तो लगा नहीं था। बाजार में जीवनरक्षक दवाइयों की आपूर्ति करना और कीमतों पर नियंत्रण रखना ये दो उददेश्य थे।

अजी सरकारी कम्पनियों के साथ सौ बबाल होते हैं। कितने ही सरकारी विभाग ऐसे होंगे जिन पर कम्पनी का बकाया होगा क्योंकि कोई भी सरकारी विभाग दूसरे सरकारी विभाग को समय पर भुगतान तो करता नहीं। और हमें तो पता चला था कि दवाई बनाने के मामले में तो कम्पनी अच्छी थी पर अपनी दवाइयां बेच नहीं पाती थी बाजार में। हरि बाबू ने कहा।

बेचती भी कैसे। प्राइवेट कम्पनियाँ तो डाक्टरों को कमीशन दे सकती हैं गिफ्ट दे सकती हैं जिससे डाक्टर लोग उनकी बनायी दवा को मरीजों को रिकमेन्ड करें। सरकारी कम्पनी कहाँ से कमीशन और गिफ्ट देगी। आइ.डी.पी.एल ने भी मार्केटिंग में मात खायी होगी। हमने तो सुना है कि एक प्राइवेट दवा कम्पनी आइ.डी.पी.एल से बल्क में दवा का पाउडर खरीदती थी। कैपसूलेशन अपने आप करती थी और अस्सी के दशक में एक कैपसूल साढ़े तीन रूपये का बेचती थी। जबकि आइ.डी.पी.एल का उसी दवा का अपना बनाया कैपसूल पिच्चहत्तर पैसे या एक रूपये में मिला करता था पर तब भी डाक्टर प्राइवेट दवा कम्पनी वाले कैपसूल को खरीदने को कहते थे। इन सार्वजनिक उपकरणों का मैनेजमैंट भी सुस्त रहा होगा जो अपनी दवाओं की मार्केटिंग प्राइवेट कम्पनियों से ठेके पर नहीं करवा पाये। विजय बाबू बोले

अरे सरकारी कर्मचारी काम कहाँ करके देते हैं। फिर यूनियनबाजी। पचासों अन्य कारण रहे होंगे घाटे में जाने के। हमें तो याद आता है कि राव सरकार के समय ही बंद हो गयी थी आइ.डी.पी.एल। अशोक बाबू ने कहा।

नहीं बंद तो शायद छियानवें में हुयी है पर बी.आइ.एफ.आर ने इसे बीमार घोषित तो सन बयानवें में ही कर दिया था। विजय बाबू ने कहा।

और बेवकूफियां देखो कैसी कैसी चलती हैं भारत में। सरकारें गाना गाये जाती हैं कि टैक्स पेयर्स का पैसा ऐसे बर्बाद नहीं किया जा सकता हानि में चलने वाली यूनिटों को चलाने में और उधर आइ.डी.पी.एल जैसी यूनिटों के केस चल रहे हैं कोर्ट में। अब सरकार पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को जिन्होने वी.आर.एस नही लिया और जो अभी केस लड़ रहे हैं इस आशा में की कभी तो फैक्टरी दुबारा चलेगी। भले ही सरकार छह छह महीने का पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को पर ये पैसा क्या पेड़ से टपक रहा है? ये पैसा भी टैक्स देने वाले लोगों का ही है। अब जब तक फैक्टरी का निश्चित फैसला नहीं हो जाता तब तक सरकार ऐसे ही पैसा देगी वो भी बिना कुछ काम लिये हुये। एक तो इतना बड़ा क्षेत्र जहाँ फैक्टरी थी आावासीय कालोनी थी स्कूल थे अस्पताल था सब रखरखाव के अभाव में खंडहर हो रहा होगा दूसरे यदि खुदा न खास्ता कभी फैक्टरी को दुबारा चलाना तय हो गया तो सरकार को कितना धन खर्च करना पड़ेगा सब टूटे फूटे को फिर से संवारने में। अगर फैक्टरी चलती रहती तो कम से कम दवाओं का निर्माण तो होता रहता और हो सकता है कि मुक्त बाजार के दौर में ये कम्पनी भी उठ जाती। हरि बाबू ने कहा।

बात तो आप एकदम खरी कह रहे हो। ये जो आई.आई.एम और ऐसे अन्य मैनेजमैंट संस्थानों का इतना हल्ला है और हर साल अखबार छापते रहते हैं कि इस बार यहाँ के स्टूडैन्ट को इतने लाख रूपये का पैकेज मिला और वहाँ के स्टूडैन्ट को उतने लाख का। तो ये क्या पढ़ाते हैं वहाँ। एक भी स्टूडैन्ट ऐसे संस्थानों से नहीं निकलता जो कहे कि मुझे दो ​सिक यूनिट और मैं इसे ढ़ंग से चलाकर दिखाऊंगा। और क्या वहाँ पढ़ाने वाले प्रोफेसर करते हैं जो एक के पास भी समाधान नहीं है बीमार सार्वजनिक उपकरणों की दशा सुधारने का? अशोक बाबू ने शंका प्रकट की।

ये प्रोफेसर इतने उद्यमी होते तो अपने कई उद्योग खड़े कर चुके होते क्लासरूम में लैक्चर न दे रहे होते और सारे संस्थान लाइन लगा देते देश भर में रतन टाटा राहुल बजाज अम्बानी और प्रेमजी जैसों की। ये लोग तो नौकरी कर सकते हैं। जो कम्पनी चल रही है उसी में काम करके पैसा कमा सकते हैं। कुछ विद्धार्थी होते हैं उद्यमी भी, पर उनकी गिनती बहुत कम है। हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू को बहुत मजेदार लगी बात और वे हँसकर बोले,” सही कह रहे हो आप जो कभी आई.आई.टी न निकाल पाये ऐसे अक्सर कोचिंग देते हैं जे.ई.ई पास करने की”।

विजय बाबू भी हास्य में योगदान देते हुये बोले,” याद नहीं आपको इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली से एक मैनेजमैंट गुरू भी लोकसभा चुनाव में खड़ा हुआ था। अब खुद ही हार गया। पता नहीं जमानत भी बची थी या नहीं। स्लोगन बड़ा अच्छा है उसका- विनर्स डोन्ट डू डिफरेन्ट थिंग्स दे डू थिंग्स डिफरेन्टली। अब दिल्ली में कितने लोगों ने उसकी किताब पढ़ी होगी? मैनेजमैंट के स्टूडैन्टस ही वोट दे सकते हैं”।

अशोक बाबू भी हँसते हुये बोले,” हाँ जी पर उपदेश कुशल बहुतेरे”। लो जी सुनील जी भी आ गये आओ सुनील जी पहले तो आप बधाई स्वीकार करो बेटे के प्रमोशन की। हमें तो विजय बाबू से पता चला।

…जारी…

जून 19, 2011

सोनिया गाँधी और संघ परिवार

बतकही : आरम्भ से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

सही कह रहे हो आप। उन्ही अटल जी की कविताओं को अमिताभ द्वारा स्वर दिये जाने की बात थी लोकसभा चुनावों से पहले। ये तो वक्त वक्त की बात है। भाजपा, शिव सेना ने बच्चन परिवार का जीना मुश्किल कर दिया था और शिवसेना ने तो अमिताभ की शहंशाह फिल्म की रिलीज पर जमकर हँगामा किया था। आज अमिताभ को कहना पड़ता है कि बाल ठाकरे तो उनके मित्र हैं। आज तो अमिताभ सपा के साथ खड़े दिखायी देते हैं जबकि मुलायम ​सिंह यादव ने भी बोफोर्स के दिनों में वी.पी.सिंह के समर्थन में बच्चन परिवार के खिलाफ जम कर सभायें की होंगी। आपको याद होगा कि सपा ने अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता अपने पक्ष में भुनाने के लिये ब्लड डोनेशन कैम्प लगवाये थे क्योंकि अमिताभ अब राजनीति में सीधी भागीदारी से बचते हैं और ऐसे ही किसी जगह उन्होने कह दिया था कि मुलायम सिंह यादव तो उनके लिये पिता समान हैं। तब भाजपायी नेताओं ने पूरे चुनावों के दौरान अमिताभ की खिल्ली उड़ायी थी कि साठ साल का पुत्र और पैंसठ साल का पिता। अब अमिताभ ने जो कहा था वह एक भावनात्मक बात थी। और आप ताज्जुब देखो कि कुछ समय बाद जब अटल जी की कविताओं को लता मंगेशकर ने गाया था और कैसेट के विमोचन पर लता जी कह रही थीं कि अग्रेंजी में नाम लिखने पर लता का उल्टा अटल है और अटल का उल्टा लता और अटल जी मेरे पिता समान हैं तो भाजपायी भावविभोर होकर धन्य हो धन्य हो का कोरस गान कर रहे थे। अब भाजपाइयों जैसा कोई कह ही सकता था कि अठत्तर साल की पुत्री और अस्सी साल का पिता। पर माफ करना अशोक जी ऐसी टिप्पणियाँ सामान्यत: भाजपा के खेमे से ही निकलती रही हैं। बरसों ये लोग विपक्ष में रहे हैं सो बिना किसी जवाबदेही के कुछ भी बोलने की आदत पड़ गयी है जो छह साल की सत्ता मिलने के बाद भी नहीं गयी है।

आप तो विजय बाबू ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने पूरी भाजपा का ठेका ले लिया हो। अरे कह दिया होगा किसी राज्य स्तर के छोटे मोटे नेता ने कुछ। सबके मुँह से फिसल जाता है। भाजपा का केन्द्रिय नेतृत्व देखिये कितना शालीन है। आडवाणी जी को देखो। मजाल है कोई फालतू बात मुँह से निकल जाये जैसे फिल्टर लगा हो मुँह में और हर बात छनकर बाहर आती हो। आपको याद दिला दूँ कि त्याग की मूर्ति सोनिया गांधी ने अटल जी के लिये कहा था कि जिनके अपने घुटने कमजोर हों वे देश क्या संभालेंगें। अभी इनकी पुत्री प्रियंका गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान अटल जी जैसे वष्ठितम राजनेता के खिलाफ टिप्पणी कर दी थी वह भी थी उनके स्वास्थ्य को लेकर। अब ये हैं क्या अटल जी के सामने। अशोक बाबू भड़कते हुये बोले।

मैने पहले भी सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की टिप्पणियों की आलोचना की थी। शारीरिक अवस्था पर टिप्पणी स्वस्थ बात नहीं है। वैसे इस तरह की शुरूआत तो चीन युद्ध के बाद डा.लोहिया की बीमार नेहरू पर की गयी टिप्पणी से ही हो गयी थी। बाद में उन्होने इंदिरा गाँधी पर भी व्यक्तिगत टिप्पणी की थी। शायद उन्होने या उनके किसी समकालीन बड़े नेता ने उन्हे गूँगी गुड़िया कहा था। किसी ने उनके बारे में कहा था कि संसद में अब एक हसीन चेहरा देखने को मिल जायेगा। वैसे अशोक जी मेरा मानना है कि भाजपा और सोनिया गांधी के मामले मे पहल भाजपा द्वारा की गयी है। बरसों ऊटपटांग टिप्पणियां सोनिया पर की गयी हैं और आज भी की जाती हैं। अभी पिछले राजस्थान चुनावों की बात ले लो। भाजपा की तो जबर्दस्त जीत हुयी थी वहाँ। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता की रिपोर्ट थी। शेखर जब चुनाव की कवरेज के लिये जयपुर–कोटा राजमार्ग पर ​स्थित एक गाँव में चाय की दुकान पर ठहरे तो वहाँ भाजपा समर्थक दावा कर रहा था कि उसने आर.एस.एस की किसी पत्रिका में पढ़ा था कि कुछ पत्रकार इटली में सोनिया गांधी के गाँव में गये थे और उन्हे वहाँ बताया गया था कि सोनिया इटली में कैबरे डांसर हुआ करती थीं। शेखर ने कहा कि ऐसा नहीं है और मान लो किसंघ की पत्रिका में ऐसा छपा भी हो तो आप लोग ऐसी बात को गम्भीरता से नहीं ले सकते। पर भाजपा समर्थक मानने को तैयार नहीं थे। मान लो शेखर गुप्ता झूठ बोल रहे थे उनका भाजपा से दुराव और कांग्रेस से लगाव रहा होगा। दूसरा किस्सा सुनो जो हमारा अपना ही सुना हुआ है। लोकसभा चुनावों की बात है। उन्ही दिनों हमने बच्चों से इंटरनेट प्रयोग करना सीखा था। टाइम्स आफ इण्डिया की वेब साइट हमने खोली और समाचार पढ़ने लगे। वहाँ हमने रेडियो पर भी समाचार सुने। वहीं हमारी दृष्टि पड़ी एक खबर पर राहुल गांधी के खिलाफ खड़े भाजपा के उम्मीदवार श्री वेदांती से वार्ता। मै‍र्ने उस वार्ता के लिंक पर क्लिक कर दिया। एक से बढ़कर एक वचन सुनायी दिये वेदांती जी के सुमुख से नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ खासकर सोनिया और राहुल के खिलाफ। वेदांती जी को पता चला कहीं से कि राहुल का प्रेम चल रहा है किसी कोलम्बियन लड़की से तो वेदांती जी लगे पड़े थे कि अमेठी में कोलम्बिया की एक हजार लड़कियां घूम रही हैं नवयुवकों के वोट राहुल को दिलवाने के लिये। शाम को बागों में अश्लील नृत्य चल रहे हैं।

साक्षात्कार लेने वाले ने पूछा कि वेदांती जी क्या आपने खुद देखा है किसी विदेशी लड़की को। तो वेदांती जी बोले कि हमारे देखने की जरूरत नहीं है सब जानते हैं। और आगे सुनो। वेदांती जी ने सोनिया गांधी को अपशकुनी बता दिया कि सोनिया के आने से सबसे पहले संजय गांधी की अकाल मृत्यु हुयी और फिर इन्दिरा और राजीव गांधी की हत्यायें। अब वेदांती जी की परिभाषा से मेनका गांधी क्या हुयी ये तो वही जाने। और इस सोच से वरुण गाँधी कितने भाग्यशाली हुये अपने पिता के लिये? आप खुद ही बताओ ऐसी दकियानूसी बातें कहाँ मिलेंगी?

अजी विजय बाबू ऐसे एक दो तो हरेक पार्टी में होते हैं। कौन सा किसी को जीतना था राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से? ये तो इस फैमिली की घर की सीट है।

अशोक बाबू बात यह है कि क्या ऐसे लोगों को टिकट देकर भाजपा लोकतंत्र को मजबूत बना रही है? आज सीटे जीतने के लिये आप जनता की भावनाओं को भड़काने के लिये कैसे ही लोगों को टिकट दे दो पर इतिहास गवाह है कि अन्त में मुसीबत आपकी भी आनी है। आखिर छह साल सत्ता में रहते हुये भाजपा ने झेला ही था विहिप आदि के तानों को। ये तो भाजपा को सोचना है कि वह परिपक्व राजनीति करना चाहती है या ​सिर्फ सत्ता पाने के लिये शार्टकट इस्तेमाल करना चाहती है।

आप ये बताओ विजय जी कि ये नेहरू–गांधी परिवार और बच्चन परिवार में ऐसा क्या झगड़ा हो गया? अखबार तो ये लिखते हैं कि अब दोनो परिवार एक दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते और कहाँ तो ऐसी निकट की दोस्ती थी कि राजीव गांधी छुट्टियाँ तक अमिताभ बच्चन के साथ बिताते थे। हमने तो सुना है कि जब अमिताभ बच्चन को चोट लगी थी सन बयासी में तो इन्दिरा गांधी विदेश से अपनी सरकारी यात्रा अधूरी छोड़कर वापिस आ गयीं थीं और राजीव गांधी भी अमेरिका से तुरन्त आ गये थे और सीथे अस्पताल पहुँचे थे। हमने तो ये तक सुना है कि शुरू में सोनिया गांधी बच्चन परिवार के यहाँ ही ठहरी थी जब राजीव गांधी से शादी हुयी थी। अब ऐसा क्या हो गया? आप ये न कह देना कि इन दोनों परिवारों में अलगाव भी भाजपा का कराया हुआ है। अशोक बाबू हँसकर विषय बदलते हुये बोले।

अजी बड़े लोग हैं। क्यों मनमुटाव हो गया क्या हो गया ये सब बातें तो उन लोगों का आपसी मामला है। फिर सोनिया गांधी ने तो कभी कुछ कहा नहीं सार्वजनिक रूप से। या तो अमिताभ ने कहा था कि हम रंक हैं और नेहरू–गांधी परिवार राजा है और सम्बंध रखना न रखना तो राजा के हाथ में होता है। अब ये पत्रकार लोग भी तो हलक में माइक डाले खड़े रहते हैं। अब क्या पता है कि जया बच्चन ने चुनाव सभा में कहा कि नहीं कहा कि नेहरू–गांधी परिवार ने संकट में बच्चन परिवार का साथ छोड़ दिया। अब पत्रकारिता तो सेंसेशन वाली हो गयी है। पत्रकार लोग तुरन्त राहुल गांधी के पास पहुँच गये पूछने कि जया बच्चन तो उनके परिवार को धोखा देने वाला बता रहीं हैं। राहुल गाँधी का कहा भी सुर्खियाँ बन गया कि लोग जानते हैं कि किसने अपनी वफादारी बदली है और उनका परिवार कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता।

विजय बाबू जया बच्चन ने कहा तो था ही कि नेहरू–गांधी परिवार ने बच्चन परिवार को मझदार में छोड़ दिया जब हम मुसीबतों से गुजर रहे थे और अमर ​सिंह और मुलायम ​सिंह ने उनका साथ दिया और ये लोग भरोसे वाले लोग हैं। हरेक अखबार में छपा था। बाद में राहुल गांधी ने कड़ा बयान दिया था। और अमिताभ ने भी कुछ कहा था।

अमिताभ बच्चन ने जो कहा था कि यदि जया ने ऐसा कोई बयान दिया है तो गलत किया है और नेहरू–गांधी परिवार तथा बच्चन परिवार की दोस्ती जया और सोनिया के इन परिवारों में आने से बहुत पहले की है तो वह एक संवेदनशील बात कह रहे थे और ऐसी बयानबाजी के कारण उनको हुआ दुख स्पष्ट पता चल रहा था। आप देखो कि उनके बयान के बाद कोई भी बयान इस ​सिलसिले में नहीं आया किसी का भी। अब अन्दर की बात तो वे लोग ही जाने पर हमें एक बात तो लगती ही है कि जितने खुले रूप में बच्चन परिवार अमर ​सिंह या सपा के साथ खड़ा दिखा दिखायी देता है उतने खुले रूप में वे लोग सोनिया गांधी के साथ खड़े दिखायी नहीं दिये राजीव गांधी की हत्या के बाद। या ये कह लो कि समय ही खराब था दोनो परिवारों के लिये कि जब दोनो परिवारों को एक दूसरे के साथ की जरूरत थी तब दोनो ही मुश्किलों में फंसे हुये थे। या शायद बच्चन परिवार को लगा हो कि गांधी परिवार तो हर तरह से सक्षम है उन्हे सहायता की क्या जरूरत है ? कुछ न कुछ गलतफहमी तो जरूर रही होगी। पर कोई भी बात एकतरफा नहीं हो सकती चाहे दोस्ती हो या दुश्मनी। अमिताभ हैं कलाकार और कलाकार बेहद भावुक होते हैं। बोफोर्स के आरोपों से त्रस्त होकर अमिताभ ने राजनीति से तौबा कर ली थी। जबकि हमारे विचार में राजीव गांधी उनसे कहीं ज्यादा परेशानी में थे बोफोर्स के कारण और उन्हे भी मित्रों के साथ की जरूरत थी पर अमिताभ राजनीति का ताप न सह पाये और मैदान छोड़ गये। लन्दन में भी तो उन्होने केस लड़ा अपने को निर्दोष साबित करने के लिये। ये काम वे सांसद बने रहकर भी कर सकते थे। उनका उस समय इस्तीफा देना मित्रधर्म नहीं था। बाद में भले ही वे राजनीति से हट जाते पर तब उन्हे राजीव के साथ मजबूती से खड़ा होना था। बोफोर्स मामले में राजीव को उनके मित्रों के ऐसे कदम पीछे हटाने से बहुत नुकसान उठाना पड़ा। अरूण ​सिंह का मसला भी ऐसा ही था। राजीव के जाने के बाद भी अमिताभ समय समय पर राजनीति से दूर रहने कि बात दोहराते रहे तो फिर सपा के केस में ऐसा क्या हो गया? भले ही समाज सेवा के बहाने से अमिताभ ने सपा के लिये समर्थन माँगा पर माँगा तो है ही। अब पता नहीं सच है कि नहीं पर अखबार में ही पढ़ा हमने कि अमिताभ ने एक निर्देशक की फिल्म साइन करने के बाद छोड़ दी ये कहकर कि उस निर्देशक को उनके पारिवारिक मित्र अमर ​सिंह से समस्यायें थीं और वे ऐसे निर्देशक के साथ कैसे काम कर सकते हैं। यदि इतनी दृढ़ता अमिताभ ने नेहरू–गांधी परिवार के प्रति भी दिखायी होती तो शायद दोनो परिवारों की दोस्ती बनी रहती। और एक राजनीतिक सच ये भी है कि उ.प्र. में यदि कांग्रेस मजबूत होती है तो सपा को राजनीतिक हानी होनी ही है । सपा परोक्ष रूप से कई बार सोनिया गांधी का विरोध कर चुकी है विदेशी मूल के मामले में। तो बच्चन परिवार तो धर्म संकट में रहता ही कि कैसे दो राजनीतिक रूप से प्रतिद्वन्द्वी दलों के मुखियाओं से दोस्ती निभाये। फिर कांग्रेस में कितने ही ऐसे होंगे जो कभी नहीं चाहेंगे कि बच्चन परिवार नेहरू–गांधी परिवार के पास आये ताकि वे सोनिया गांधी के नजदीक जा सकें। समय तो चलायमान है। चीजें बनती बिगड़ती रहती हैं।

अशोक बाबू लम्बा व्याख्यान सुनकर बोले अजी हमें क्या मतलब है इन लोगों की मित्रता से कल टूटती तो आज टूट जाये। न इनकी मित्रता से देश का भला हो रहा और ना ही मित्रता के न रहने से देश गर्त में जा रहा। सब ड्रामा है। और आप अमिताभ बच्चन की क्या बात करते हो। कांग्रेस ने इन साहब को इलाहाबाद से खड़ा किया हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ राजनेता को हराने के लिये। अमिताभ ने फिल्मी लटकों झटकों से उन्हे हराया होगा। बेचारे बहुगुणा जी का राजनीतिक जीवन ही खत्म हो गया उस हार से। ये ठीक लगता है आपको?

अशोक जी बहुगुणा जी तो हैं नहीं सो कुछ कहना ठीक नहीं पर जब आपने बात छेड़ी है तो आपको बताना जरूरी है कि उस चुनाव में बहुगुणा जी ने किन्नरों को किराये पर बुलाकर सारे लोकसभा क्षेत्र में घुमाया था और जगह जगह किन्नर अमिताभ की खिल्ली उड़ाते घूमते थे गाना गाकर कि मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। ये अलग बात है कि इस सबके बावजूद अमिताभ ने बहुगुणा जी को अच्छी शिकस्त दी। हमारे ख्याल से तो बहुगुणा जी जैसे वरिष्ठ राजनेता को अपने प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार की इस तरह से खिल्ली उड़ाना शोभा नहीं देता था। अमिताभ का फिल्मों में काम करना उसमें गीत गाना या गाने पर नाचना उनके प्रोफेशन का हिस्सा थे और किसी को भी हक नहीं कि दूसरे के व्यवसाय का मजाक बनाये। यही सब कुछ पिछले चुनाव में गोविन्दा की जीत में सहायक रहा होगा। जनता इतनी मूर्ख नहीं होती जितना कि राजनेता समझ लेते हैं। और फिर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर कांग्रेस से इतनी ही दिक्कत थी या है तो बहुगुणा जी के बेटे और बेटी क्यों कांग्रेस में बने हुये हैं? उन्हे तो आपसे और हमसे ज्यादा अपने पिता के मान-सम्मान या अपमान की चिंता होगी।

अजी हमारी समझ में तो आता नहीं कि कैसे हमारे देश के लोग एक विदेशी महिला को समर्थन देते हैं। कहाँ भाजपा की प्रचंड देशभक्ति और कहाँ सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस का ढ़ुलमुलपन। कहीं कोई मुकाबला है भला। दो मिनट तो सोनिया लगातार बोल नहीं सकती यदि लिखकर न दिया जाये। अशोक बाबू तैश में आकर बोले।

अशोक बाबू ने अपनी बात पूरी की ही थी कि हरि बाबू वहाँ पँहुच गये और उनकी बात लपकते हुये बोले,” कौन दो मिनट नहीं बोल सकता बिना लिखे हुये को पढ़े? जरूर आप सोनिया गांधी को गरिया रहे होगे। अरे कभी तो बेचारी को बख्श दिया करो। अब जनता ने भाजपा को फिर से सत्ता नहीं दी तो इसमें सोनिया का क्या कसूर। आपके प्रमोद महाजन के हिसाब से तो सोनिया से माफिक कोई भी नेता विपक्ष नहीं हो सकता था भाजपा के लिये। अपनी काबिलियत से ज्यादा महाजन को सोनिया की नाकाबिलियत पर भरोसा था। कहते थे कि जब तक सोनिया विपक्ष की नेता हैं भाजपा को कोई खतरा नहीं और भाजपा सत्ता में बनी रहेगी। पर हाय री भारत की जनता उसे भाजपा की शुद्ध हिन्दी के बजाय सोनिया की टूटी फूटी इटेलियन टोन वाली हिन्दी ही पसन्द आयी।

देखो जी समर्थन तो कांग्रेस को भी नहीं दिया जनता ने फिर क्यों लपक कर सरकार बना ली और रोज़ गाना गाया जा रहा है कि सोनिया ने ये त्याग किया वो त्याग किया। इतना बड़ा त्याग किया और ऐसे त्याग की मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। त्याग मेरी जूती। अजी जब काबिल ही नहीं थी तो पद ग्रहण न करने का नाटक किया। आपने पढ़ा नहीं था बाल ठाकरे का बयान कि राष्ट्रपति ने सोनिया को बुलाकर साफ कह दिया था कि उनके पी.एम. बनने से जटिलतायें खड़ी हो सकती हैं और हो सकता है कि सेना उनका आदेश न माने। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने ताल ठोक ही रखी थी आंदोलन करने की। इन्ही सब बातों से घबराकर इस महिला ने कुर्सी छोड़ने का नाटक किया। अजी बहुत चतुर नारी है। अशोक बाबू आवेश में आकर बोले।

बुरा न मानना अशोक बाबू पर कुछ बातों में संघ परिवार से जुड़े घटकों की बातों पर विश्वास कर पाना मुश्किल होता है। ये लोग कैसी भी बातें फैलाते रहते हैं। हमें तो इतना पता है कि बाल ठाकरे की बात जो आप कर रहे हो खुद राष्ट्रपति महोदय ने ऐसी बातों का खंडन ​किया कि उन्होने सोनिया गांधी से इस तरह की कोई चेतावनीयुक्त बात कही थी। हमारे पास तो ऐसा कोई कारण है नहीं कि राष्ट्रपति की बात पर भरोसा न किया जाये। एक तो ऐसा एक भी व्यक्तित्व वर्तमान राजनीति में नहीं है जो देशहित में ही सब बातें सोचता कहता और करता हो। इतना ऊर्जावान राष्ट्रपति हमने तो पहले देखा नहीं कोई भी। साहब हमें तो तो पहली बार कोई राष्ट्रपति पसन्द आया है।

सही बात है हरि बाबू उन्हे पता है कि देश की जरूरत क्या है और आज की वास्तविकता क्या है। तभी उन्होने अपना सारा ध्यान बच्चों पर केन्द्रित किया है। कैसे वे बच्चों में उत्साह जगा रहे हैं। ये सब कुछ सालों में नजर आयेगा। विजय बाबू ने समर्थन किया।

ये बात तो सही कह रहे हो आप आदमी तो प्रोग्रे​सिव है भाजपा बड़ा अच्छा काम कर गयी डा. कलाम को राष्ट्रपति बनाकर। अशोक बाबू ने भी समर्थन करते हुये कहा।

अरे आप दोनो कहाँ चारदिवारी से घिरे बैठे हो। चलकर पार्क में बैठा जाये कुछ घूमना भी हो जायेगा। हरि बाबू ने प्रस्ताव रखा।

हाँ ये ठीक रहेगा बातें वहीं होंगीं अब। अशोक बाबू ने कुर्सी से उठकर अंगड़ायी लेते हुये कहा।

ठीक है मैं जरा अन्दर घर में बता कर आ जाऊँ। विजय बाबू ने कहा और घर के अन्दर चले गये।

कुछ ही देर में विजय बाबू बाहर आ गये और बोले कि चलो सुनील जी को भी देख लिया जाये कहाँ रह गये?

तीनो लोग सड़क पर आ गये। पार्क के रास्ते में सुधीर बाबू का घर पड़ा तो विजय बाबू ने गेट से ही अन्दर खेलते बच्चे से पूछा बेटा बाबा आ गये बाजार से वापिस?

बच्चे ने ना में गरदन हिलायी। तब तक आवाज सुनकर सुनील जी का छोटा बेटा बाहर आया और सबको नमस्ते करके बोला कि अभी तो पापा आये नहीं हैं ।

अरे तुम तो इस बार दो तीन हफ्तों के बाद आ रहे हो। कहाँ अटक गये थे? विजय बाबू ने पूछा।

बस जी काम के चक्कर में आना हो नहीं पाया पहले। फिर सुबह और रात को इतना कोहरा हो जाता है कि ज्यादा शाम को उधर से इधर आने की हिम्मत हुयी और ये भी पता था कि शनिवार की रात को किसी तरह आ भी गया तो सोमवार की सुबह सुबह जाना मुश्किल हो जायेगा और यदि रविवार की शाम को ही वापिस जाना पड़े तो अच्छा नहीं लगता।

सही बात है इतनी भागदौड़ से क्या फायदा। अब कोहरा कम होता जायेगा तो फिर से हर हफ्ते चक्कर लगने लगेंगे। हरि बाबू बोले।

अच्छा बेटा पापा आ जायें तो बोलना कि हम लोग पार्क में बैठे हैं वहीं आ जायें। अशोक बाबू ने कहा।

…जारी…

जून 18, 2011

बतकही : आरम्भ

चारों मित्र अपनी बैठकों को बतकही क्लब कहा करते हैं। इन बैठकों की शुरुआत तो कब हुयी यह इन मित्रों को भी याद न होगा पर सन 2005 के जनवरी माह से ये बैठकें नियमित जरुर हो गयीं। बिरला ही कोई दिन जाता है कि जब चारों घर पर हों और बैठक न लगे।

उसी दौरान की एक बैठक से :-

जनवरी का दूसरा रविवार होने के बावजूद धूप खिलकर निकली थी अत सुबह का नाश्ता समाप्त करते ही अशोक बाबू विजय जी के घर पहुँच गये थे और दोनों लोग इस वक्त धूप का लुत्फ उठाते हुये अखबार पढ़ने में लगे हुये थे।

अशोक बाबू ने अखबार के पन्ने बन्द करके कलाई घड़ी में समय देखकर कहा,” दस बज गये विजय बाबू, ये हरि बाबू और सुनील जी नहीं आये अभी तक। कहाँ रह गये कहीं टी.वी. सीरियलों से तो नहीं चिपक गये बच्चों के साथ- साथ”?

“आते ही होंगे सुनील जी तो शायद बाजार गये होंगे मिठाई लाने उनके बेटे का प्रमोशन हो गया है। मेजर से ले. कर्नल बन गया है और हरि जी भी फंस गये होंगे किसी काम में। आते ही होंगें दोनों। कौन सा यहाँ संसद लगनी है जिसके लिये कोरम पूरा नहीं हो रहा है”, विजय बाबू इत्मिनान से बोले।

सुनील जी ने आपको बताया अपने बेटे के प्रमोशन के बारे में? हमें तो बताया नहीं कल शाम पाँच बजे ही मिले थे हमसे तो। अशोक बाबू शिकायती लहजे़ में बोले।

अजी उन्हे तो खुद कल रात पता चला जब उनके बेटे ने फोन करके बताया। वो तो सुबह दूध लेने जाते समय उनसे मुलाकात हो गयी तो मुझे पता चला। अब अशोक बाबू आप यहाँ हिन्दुस्तान में रहो तब तो कोई आपको बताये कुछ। रोज़ तो आप शहर से बाहर रहते हो। विजय बाबू ने चुटकी ली।

अशोक कुछ कह पाते उससे पहले ही चाय आ गयी।

लो जी चाय पियो आप अशोक बाबू। तभी आपको रस आयेगा बातों में।

अच्छा चाय आ गयी है तो पी लेते हैं पर मुझे लगने लगा है कि चाय आदि पीने से मेरा बी.पी. कुछ बढ़ जाता है।

अजी कुछ बी.पी. ऊपर नीचे नहीं हो रहा चाय पीने से। आप थोड़ा सा ना चिन्ता कम किया करो सब अपने आप ठीक रहेगा। जमाने भर की चिन्ता करना छोड़ दो।

अजी चिन्ता कोई मैल तो है नहीं कि नहा लिये और शरीर से दूर हो गयी। जो चिन्ता है वो है। जब तक काम पूरा नहीं होगा चिन्ता दूर कैसे हो जायेगी? आप भी कैसी बात करते हो? अशोक बाबू ने चाय का कप उठाते हुये कहा।

विजय बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर दोनों चाय की चु​स्कियों के साथ चुपचाप अखबार पढ़ते रहे।

सहसा अशोक बाबू बोले,” विजय बाबू ये शाहरूख खान के बारे में आपका क्या विचार है”?

विजय बाबू ने अशोक जी के अखबार में छपी तस्वीर पर निगाह डालते हुये कहा विचार तो ठीक ठाक सा ही है। तरक्की तो कमाल की है लड़के की। देखो टी0वी के सीरियलों से कहाँ पहुँच गया। कुछ तो बात जरूर होगी उसमें। पर आप एक्टिंग की बात करो तो ये लड़कपन के किरदारों वाली फिल्में तो ठीक हैं पर परिपक्व रोल में मामला जमता नहीं। बड़ा हल्ला सुना था कि शाहरूख की देवदास आ रही है टी.वी. पर। हमने भी देखी पर साहब बात जमीं नहीं। हमारे पास तो शरत बाबू की किताब भी है। दिलीप कुमार की फिल्म देखने के बाद हमने किताब पढ़ी थी और ऐसा लगा था कि जैसे दिलीप कुमार को सोचकर किताब लिखी गयी हो। बड़ा जबर्दस्त अभिनय किया था दिलीप कुमार ने। दिलीप कुमार भी तकरीबन इसी उम्र के रहे होंगे देवदास करते समय जितनी उम्र में शाहरूख देवदास बने हैं पर दिलीप के अभिनय में गहरायी और परिपक्वता थी। या कह लो कि निर्देशक की अपनी समझ है। अपना अपना समय है हो सकता है हम लोग बूढ़े हो गये हैं और पुराना रिकार्ड बजा रहे हैं पर व्यक्तिगत रूप से हमें तो यही लगता है कि नायक के रूप में अभी तक तो कोई भी दिलीप कुमार से आगे नहीं जा पाया। अमिताभ बच्चन को ही थोड़ा करीब मान सकते हैं पर वह भी उन्नीस ही रहे दिलीप कुमार के सामने।

हमें तो विजय बाबू बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ये शाहरूख खान और बच्चों को देखो पागल हुये रहते हैं इसके पीछे।

अजी बच्चे तो रितिक या ह्रितिक क्या है उसके दीवाने हैं आजकल।

ये देखो विजय बाबू ये लड़की कह रही है कि इसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी शाहरूख के साथ काम करेगी। मुझे तो बेवकूफी लगती है ऐसी बात।

मुझे तो अशोक बाबू वो लड़का ज्यादा पसन्द है जो कोकाकोला के विज्ञापन में आता है अलग अलग रूपों में। ठंडा माने कोकाकोला कहता हुआ। विजय बाबू चहक कर बोले।

अच्छा आमिर खान। वो तो मुझे भी ठीक लगता है। बल्कि सारे खानों में सबसे सही वही है। वो तीसरा सलमान खान तो मुझे एक आँख नहीं भाता। हमेशा कुछ न कुछ घपला करे रखता है।

हम तो टीवी पर ही देखते हैं अशोक बाबू फिल्में आदि। ​सिनेमा गये तो सालों हो गये। इस सलमान खान की भी एक फिल्म अभी दुबारा देखी थी हम आपके हैं कौन। ये बहुत अच्छी लगी हमें। वैसे अब तो खान ही खान हैं फिल्मों में। अभी फिरोज खान का पुत्र ही जम नहीं पाया था कि संजय खान के पुत्र ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पटौदी के साहबजादे हैं ही पहले से। और भी कई होंगें।

विजय बाबू खान तो हमेशा रहे हैं फिल्मों में। ये आपका दिलीप कुमार है तो ये भी कुछ खान ही। इन खानों का मन ही फिल्मों में लगता है।

हाँ अशोक बाबू उधर खान और इधर खन्ना। राजेश खन्ना विनोद खन्ना और अब इनकी सन्तानें। कपूर खानदान तो है ही हमेशा से।

हाँ जी अब तो खानदानी व्यवसाय बन गया है। बच्चन परिवार, देयोल परिवार, चोपड़ा परिवार, रोशन परिवार, कपूर परिवार, भट्ट परिवार। जैसे पहले व्यापारिक संस्थायें हुआ करती थीं एंड संस के नाम से फिल्मों में भी बाकायदा लिखा जाने लगेगा फलाना एंड संस।

अब तो अशोक बाबू ऐसा लगने लगा है कि बाहर के लोग जिनका कोई नहीं है फिल्म इंडस्ट्री में फिल्म लाइन में घुस ही नहीं पायेंगें।

सही बात है। किसी भी उद्योग में सीमित पैसा होता है। जब सारा पैसा इन स्टार संस और डॉटरों पर लग जायेगा तो बाहर से आने वालों को कौन घास डालेगा और कहाँ से डालेगा?

अजी अब तो टीवी पर भी इन फिल्म वालों का ही कब्जा होता जा रहा है। स्टार प्लस पर आप ये समझो कि कम से कम चार पाँच सीरियल रोज़ आते हैं जितेन्द्र की बेटी एकता कपूर के। करिश्मा कपूर और श्रीदेवी आ ही रही थीं सहारा टीवी पर अब हेमा मालिनी भी आने लगीं।

विजय बाबू हमारी तो समझ में आता नहीं कि हेमा मालिनी को क्या जरूरत है सीरियल आदी करने की। एक फिल्म क्या हिट हो गयी अमिताभ बच्चन के साथ फिर से मैदान में कूद पड़ीं। अब एक तरफ तो इनकी बिटिया फिल्मों में है और ये अभी तक मोह नहीं छोड़ पा रही। ये हालत तो तब है जबकि ये सांसद भी हैं। जाने कब ये जनता के लिये समय निकाल पाती होगीं जाने कौन तो इन्हे संसद में भेज देता है?

अजी ये तो इनकी मर्जी फिल्म या सीरियल करें न करें। आखिरकार इन लोगों का व्यवसाय तो यही है। जीने के लिये कमायेंगे तो है ही। और हेमा मालिनी को तो आपकी भाजपा ने ही संसद में भेजा है और इस बार तो इनके पतिदेव धर्मेन्द्र को भी भेज दिया है। भाजपा का तो पूरा इरादा टीवी वाली तुलसी को भी भेजने का था दिल्ली से संसद में पर दिल्ली की जनता को तुलसी जमी नहीं। विजय बाबू चुटकी लेते हुये बोले।

देखो विजय बाबू ऐसा तो है नहीं कि खाली मेरी भाजपा ही भेज रही है इन फिल्मी ​सितारों को संसद में। इसी लोकसभा में सुनील दत्त और गोविन्दा आये कांग्रेस के टिकट से जीतकर। जया प्रदा और राज बब्बर आये सपा के टिकट पर। सपा ने ही जया बच्चन को भेजा राज्य सभा में। और ये अमिताभ बच्चन आज भले ही सपा के साथ खड़े दिखायी दे रहें हों इन्हे राजनीति में तो राजीव गांधी ही लाये थे कांग्रेस की ओर से। अशोक बाबू कुर्सी पर पहलू बदल कर बोले।

ऐसा है अशोक बाबू सुनील दत्त का मामला ऐसा तो है नहीं कि सीधे फिल्मों से संसद में जाकर बैठ गये हों। सालों से समाजसेवा के काम में जुटे रहे। आतंकवाद से जलते पंजाब में पदयात्रा निकालने गये थे अस्सी के दशक के मध्य में। दत्त साहब आज से तो सांसद हैं नहीं। ऐसा नहीं है कि फिल्म वालों पर कोई पाबन्दी है राजनीति में आने की। पर आप यदि ये कह रहे हैं कि खाली अपनी सेलिब्रिटी छवि का सहारा लेकर ये लोग राजनीति में घुस जाते हैं जो कि गलत है तो मैं भी आपकी बात से सहमत हूँ। खाली फिल्मी ​सितारे ही नहीं बल्कि सब तरह के ​सितारों के लिये ये बात सच है। इनमें से जो लोग ऐसा समझते या करते हैं कि जब और धंधे बन्द हो जाते हैं तो राजनीति में घुसने की कोशिश करने लगते हैं तो ये राजनीतिक दलों राजनीति और देश सबका नुकसान ही ज्यादा करते हैं।

भाजपा तो इसीलिये इन फिल्मी सितारों या अन्य ​सितारों को टिकट दिया नहीं करती थी। शत्रुघन सिन्हा को भी पार्टी से जुड़ने के सालों बाद टिकट दिया। अशोक बाबू कुछ फख्र से बोले।

देखो अशोक जी गलत बयानबाजी़ तो आप करो मत। आपको शायद याद न हो सबसे पहले शत्रुघन सिन्हा, वी.पी.​सिंह के सर्मथन में उतरे थे। ये तो याद नहीं कि ये उनके साथ घूमे भी थे या नहीं पर बयानबाजी अच्छी खासी की थी। और राज बब्बर भी वी.पी के सर्मथन में ही कूदे थे जब वी.पी ने राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स मामले में ताल ठोक रखी थी सन सतासी के आसपास। वो तो बाद में शत्रुघन ​सिन्हा भाजपा में जा पहुँचे और राज बब्बर सपा में। सपा के बढ़ने में खासा पसीना बहा है राज बब्बर का भी। और ऐसा नहीं है कि शत्रुघन ​सिन्हा को बहुत बाद में टिकट दिया गया हो। ये सन इक्यानवें के लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली में हुये उपचुनाव में राजेश खन्ना के खिलाफ भाजपा की ओर से लड़े थे। इस सीट पर पहले आडवाणी जीते थे राजेश खन्ना को ही हराकर पर उनके पास शायद गांधीनगर की सीट भी थी और उन्होने दिल्ली की सीट छोड़ दी थी। उपचुनाव में शत्रुघन ​सिन्हा हार गये थे राजेश खन्ना से और फिर सालों तक भाजपा उनका उपयोग केवल चुनाव के समय भीड़ जुटाने में ही करती रही और बाद में राज्यसभा में ले लायी। और आपको शायद याद आ जाये कीर्ति आजाद चेतन चौहान रामायण वाली सीता यानि दीपिका रावण यानि अरविन्द त्रिवेदी महाभारत के कृष्ण यानि नीतिश भारद्वाज व अन्य की जो भाजपा द्वारा सिर्फ संसद की सीटें जीतने के लोभ में राजनीति में लाये गये थे। जबकि इनमें से किसी का भी समाज सेवा से न पहले मतलब था और न ही बाद में रहा। आखिर जीतने के बाद तो ऐसे ​सितारों को गम्भीर हो जाना चाहिये राजनीति के प्रति।

चलो विजय बाबू मान लिया भाजपा ने भी ​सितारों को टिकट दे दिया। अशोक बाबू कुछ हार मानते हुये बोले। पर ये सारी शुरूआत तो कांग्रेस द्वारा की गयी थी। हमारे पास तो रिकार्ड है नहीं कि कौन कब कहाँ से खड़ा हुआ पर टक्कर में आने को भाजपा को भी ​सितारों की मदद की मदद लेनी पड़ी। कांग्रेसियों ने कितनी फजीहत की बेचारे धर्मेन्द्र की इस चुनाव में। कितना कीचड़ उछाला हेमामालिनी से शादी को लेकर? अशोक बाबू रोष से बोले।

अशोक बाबू हमें तो ये पता है कि आजकल राजनीति का जो स्तर हो गया है उसमें धर्मेन्द्र किसी भी पार्टी से खड़े होते विपक्षी दल यही सब बातें उठाते। हर दल यही सब कर रहा है। शरीफ आदमी है धर्मेन्द्र। पता नहीं क्यों राजनीति के चक्कर में आ जाते हैं ऐसे लोग। वर्तमान की राजनीति का ताप सहना इतना आसान नहीं है। मुझे तो एक बात पता है कि किसी खास राजनीतिक दल से जुड़कर ये फिल्मी ​सितारे अपना नुकसान ही ज्यादा करते हैं। अगर फिल्मों में काम न करना हो आगे तो बात अलग है वरना इन लोगों को बचना चाहिये सक्रिय राजनीति से। समाज सेवा तो आप कैसे भी कर सकते हो। भारत की जनता भावनात्मक रूप से बहुत परिपक्व नहीं है। और जब ये फिल्मी ​सितारे राजनीति में आ टपकते हैं तो अपना मार्केट ही डाउन करते हैं क्योंकि जब तक सत्तारूढ़ दल के साथ हैं तब तक तो ठीक है पर यदि वही दल हार जाये तब? भाई या तो आपके कुछ अपने राजनीतिक विचार हों और आप पूरे तौर पर राजनीति में आ जायें। पर ये हिन्दी ​सिनेमा वाले लोग दोनो नावों की सवारी करना चाहते हैं और कुछ तो पावर के लोभ में राजनीति की ओर दौडते़ हैं।

ना जी विजय बाबू भाजपा कभी ये काम ना करती यदि धर्मेन्द किसी विपक्षी दल के टिकट पर खड़े होते। भाजपा कभी व्यक्तिगत जीवन पर आक्षेप ना लगाती। भाजपा की ट्रेनिंग ही ऐसी नहीं है। भाजपा कभी शालीनता नहीं छोड़ती। सारी दुनिया जानती रही है बच्चन परिवार की नेहरू–गांधी परिवार से निकटता को। पर जब अटल जी पी.एम थे तो एक समारोह में डा. हरिवंश राय बच्चन की जमकर तारीफ की थी और ग्वालियर का उनसे जुड़ा हुआ कोई प्रसंग सुनाया था। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अशोक जी आप मेरा मुँह न खुलवाओ। चलो आप पहले बच्चन जी की ही बात ले लो। अटल जी ने बच्चन जी की तारीफ की होगी उनके रचे साहित्य के कारण। बच्चन जी के साहित्य की गुणवत्ता और उनकी प्रसिद्धि से सब वाकिफ हैं। हरेक के अपने अपने क्षेत्र हैं। अब आप ये बुरा न मान जाना कि मैं अटल जी की कविताओं की बुराई कर रहा हूँ या उन्हे साहित्यकार के रूप में कम आँक रहा हूँ। पर हाँ उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले हमने कभी उनकी कविता नहीं सुनी थी। मुझे याद है कई साल पहले अटल जी अमेरिका गये थे किसी सर्जरी के ​सिलसिले में और वहाँ से धर्मयुग या नवभारत टाइम्स के लिये एक संवेदनशील लेख लिख कर भेजा था। बहुत अच्छा लगा था पढ़कर। उनके साहित्यप्रेमी होने और अच्छा लिखने की क्षमता के बारे में तो कोई सन्देह है नहीं।

थोड़ा ठहरकर विजय बाबू बोले अब बच्चन जी तो रहे नहीं। पर जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से एम.पी. थे और वी.पी.सिंह सारे देश में राजीव गांधी के विरूद्ध बोफोर्स की अलख जगाते हुये घूम रहे थे तो अटल जी ने भी सारे भारत में बच्चन और नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ था। हमने तो तभी अटल जी को साक्षात सुना था। अटल जी ने गरज कर कहा था कि बच्चन जी कहते हैं कि यदि उनके पुत्रों को परेशान किया गया तो वे भी जबान खोल देंगें। अटल जी ने बच्चन जी को मुँह खोलने की चुनौती दी थी और ललकार कर कहा था कि बच्चन परिवार को बताना पड़ेगा कि बोफोर्स की दलाली का पैसा कहाँ गया। तब ये बच्चन परिवार की किसी लोटस कम्पनी का जिक्र किया करते थे।

अजी अटल जी राजनीति में थे तो ​स्थितियों का फायदा तो उठाते ही। वे विपक्ष में थे उनका काम ही था मामले को हर जगह उठाना। वे भला क्यों बच्चन या राजीव गांधी परिवार पर लगे आरोपों से मुक्त होने में उनकी सहायता करते।। अशोक बाबू कुर्सी पर कमर पीछे टिकाते हुये बोले।

…जारी…

दूसरी किस्त : बतकही – सोनिया गाँधी और संघ परिवार

तीसरी किस्त :बतकही – उदारीकरण और भारत

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