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मार्च 23, 2017

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव : आज का भारतीय उन्हें श्रद्धांजलि देने लायक है भी?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत पर उनकी शान में आज की तारीख में कसीदे काढने वाली भारतीय जनता में से बहुसंख्यक क्या जीते जागते इन क्रांतिकारियों को आज की परिस्थितियों में स्वीकार भी कर पाते?

भगत सिंह और उनके साथी तो आज भी समाज के सबसे निचले पायदान पर जी रहे वंचित तबके के हितों के लिए संघर्ष कर रहे होते, आदिवासियों के हितों, देश के जंगल, पानी और आकाश और पर्यावरण की रक्षा के लिए अलख जगा रहे होते और निश्चित तौर पर वे जन-शोषक कोर्पोरेट हितों के विरुद्ध खड़े होते, और निश्चित ही किसी भी राजनैतिक दल की सरकार भारत में होती वह उन्हें पसंद नहीं करती|

उन पर तो संभवतः आजाद भारत में भी मुक़दमे ही चलते|

झूठे कसीदों से फिर क्या लाभ, सिवाय फील गुड एहसासात रखने के कि कितने महान लोगों की स्मृति में हम स्टेट्स लिख रहे हैं ?

भगत सिंह एवं उनके साथियों के पक्ष में खड़ा होना आज भी क्रांतिकारी ही है और आधुनिक भारत का बाशिंदा इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकता कि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के वशीभूत होने के कारण किसी भी किस्म के सजग आंदोलन के पक्ष में वह खड़ा हो नहीं सकता|

आज भगत सिंह और उनके साथी होते तो उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण, सोशल मीडिया पर ट्रोल्स उन्हें गरिया रहे होते, उनके साथ गाली-गलौज भी हो सकती थी|

ऐसे में भगत सिंह और उनके साथियों को श्रद्धांजलि देने के प्रयास दोहरेपन के सिवाय कुछ भी नहीं हैं| उनके कार्यों की ताब आज की तारीख में न सहने की मानसिकता के कारण उन्हें झूठी श्रद्धांजलि देने के प्रयास २५ साल से कम उम्र में ही देश की खातिर फांसी पर चढ़ जाने वाले इस महावीर और उनके साथियों के बलिदान के प्रति अवमानना ही कहे जायेंगें|

पुनश्चा:

१) डा. राम मनोहर लोहिया का जन्म २३ मार्च को हुआ पर वे इन शहीदों की सहादत की स्मृति में अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे|

२) पंजाब के अनूठे कवि पाश, भगत सिंह और उनके शहीद साथियों के बहुत बड़े प्रशंसक थे, और संयोगवश पंजाब में आतंकवादियों दवारा उनकी ह्त्या भी इसी दिन २३ मार्च १९८८ को हुयी|

 

#BhagatSingh #Sukhdev #Rajguru

 

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मार्च 6, 2016

विद्यार्थी और राजनीति : भगत सिंह

bhagat2इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान(विद्यार्थी) राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है। विद्यार्थी से कालेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं कि वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे। आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मन्त्री है, स्कूलों-कालेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ानेवाला पालिटिक्स में हिस्सा न ले। कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था। वहाँ भी सर अब्दुल कादर और प्रोफसर ईश्वरचन्द्र नन्दा ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को पोलटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।

पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ(Politically backward) कहा जाता है। इसका क्या कारण है?क्या पंजाब ने बलिदान कम किये हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली है? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है?इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं। आज पंजाब कौंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है, और विद्यार्थी-युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस सम्बन्ध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते है तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं- “काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमन्द साबित होगे।”

बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं,क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘’‘Appeal to the young, ‘Prince Kropotkin’ (‘नौजवानों के नाम अपील’, प्रिंस क्रोपोटकिन) पढ़ रहा था। एक प्रोफेसर साहब कहने लगे, यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा- प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफेसर के लिए बड़ा जरूरी था। प्रोफेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हँस भी पड़ा। और उसने फिर कहा- ये रूसी सज्जन थे। बस! ‘रूसी!’ कहर टूट पड़ा! प्रोफेसर ने कहा कि “तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो।”

देखिए आप प्रोफेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते है?

दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज? फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करनेवाले वफादार नहीं, बल्कि गद्दार हैं, इन्सान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं। तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।

सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत हैं, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्योछावर कर दें। लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फँसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फँसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो। सिर्फ गणित और ज्योग्राफी का ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो।

क्या इंग्लैण्ड के सभी विद्यार्थियों का कालेज छोड़कर जर्मनी के खिलाफ लड़ने के लिए निकल पड़ना पोलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहाँ थे जो उनसे कहते- जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो। आज नेशनल कालेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जायेंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है? सभी देशों को आजाद करवाने वाले वहाँ के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। क्या हिन्दुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पायेंगे? नवजवानों 1919 में विद्यार्थियों पर किये गए अत्याचार भूल नहीं सकते। वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रान्ति की जरूरत है। वे पढ़ें। जरूर पढ़े! साथ ही पालिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें। अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें। वरना बचने का कोई उपाय नजर नहीं आता।

[भगत सिंह]

किरती, 1928

मार्च 23, 2015

भगतसिंह की सेक्युलर विरासत

Bhagat Singh

मई 18, 2014

हाथी-घोड़ा-पालकी : कहानी भाजपा की जीत, और कांग्रेस के Fall की!

कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण की। जनता भी कभी छप्पर फाड़ कर देती है। पहली बार भाजपा को अपने बूते पूर्ण बहुमत मिला है। और कांग्रेस को अपूर्व विमत। पंद्रह साल पहले सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं। पार्टी के इतिहास में उसकी वह न्यूनतम उपलब्धि थी। इस दफा, जब चुनाव की कमान राहुल गांधी के हाथों में रही, कांग्रेस को 43 सीटें मिली हैं। यारो, कैसा गिरने में गिरना है!

भाजपा ने राजग गठबंधन में चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने राजग की 336 सीटों में भाजपा को 282 सीटें दे दी हैं। यानी अब सरकार चलाने को गठबंधन की बैसाखी की जरूरत नहीं, न काम करने या न करने के पीछे गठबंधन को जिम्मेदार ठहराने के बहाने ढूंढ़ने की गुंजाइश। पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा 244 सीटें कांग्रेस को मिली थीं, 1991 में। खरीदफरोख्त के बाद गठबंधन सरकार बनी, घोटाले हुए। फिर गठबंधन का युग चल निकला। मनमोहन सिंह जैसे भले मगर नाकारा प्रधानमंत्री की नाक नीचे विराट घोटाले हुए , ठीकरा फिर गठबंधन के मत्थे फोड़ा गया। क्या इसी सब के चलते जनता जनार्दन ने नरेंद्र मोदी की ‘अच्छे’ दिनों या सुशासन की पुकार सुनी। और उन्हें प्रचण्ड बहुमत अता फरमाया है?

हम जानते हैं कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को संदेह का लाभ देते हुए जनता ने पांच साल पहले दुबारा चुना था। एक भले और अर्थशास्त्र के विद्वान प्रधानमंत्री को पूरे दस बरस राज करने का मौका मिला। लेकिन प्रगति की जगह बंटाढार हुआ। भले ही क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो की तर्ज पर मनमोहन सिंह ने कहा कि भविष्य में इतिहास उन्हें सही समझेगा। उनके एक सलाहकार ने चुनाव के बीच मुनादी की कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी प्रगति हुई है, उतनी मानव जाति के इतिहास में किसी देश में कभी न हुई होगी। लेकिन ऐसे दावे इतिहास की प्रविष्टियों से अर्थवत्ता नहीं पाते। लोग देखते हैं कि उनके दैनंदिन जीवन में क्या प्रगति हुई है। देश की अर्थव्यवस्था कहां पहुंची है। आटे-दाल का भाव कम हुआ है या ज्यादा। रुपया कितना चढ़ा या लुढ़का है। देश में हिंसा बढ़ी है या घटी है। खेती, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण या हवा-पानी आदि जीवन से सीधे जुड़े क्षेत्रों में हम कितना आगे बढ़े हैं। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों का सचमुच कितना उद्धार हुआ है। दूसरे देशों की नजरों में हमारी साख ऊंची हुई है या गिरी है।

कहना न होगा, इन सवालों के जवाब में हाथ मलता भारतवासी चुनाव नजदीक आते-न-आते अपने सबसे ताकतवर हथियार- मताधिकार- की धार तेज करने में लग गया था। जिस कारपोरेट जगत यानी बड़ी पूंजी के जमावड़े ने कांग्रेस की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वह उसे उखाड़ फेंकने में जुट गया। गुजरात में विकास के नारे उछालने वाले नरेंद्र मोदी से उसका इश्क पहले से परवान पर था। हालांकि कांग्रेस ने चुनिंदा मंत्री तक कारपोरेट घरानों की मरजी मुताबिक नियुक्त किए थे। राडिया टेप याद करें तो यह दास्तान याद आएगी। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी का बेदाग ‘परसोना’ थे, मगर कारपोरेट को उनसे बाजार को संभाल लेने की उम्मीदें थीं। मोहभंग होने पर कमान उनके हाथ से खिंचने लगी। मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे संजय बारू की किताब के हवाले खयाल करें तो वित्त मंत्री तक प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर तय होने लगे। खुद को सत्ता का निर्मोही जाहिर कर सोनिया गांधी ने आखिर मनमोहन सिंह को भोलेपन में आगे नहीं किया था। वे तन कर खड़े नहीं हो सकते थे। क्वात्रोकी की मुक्ति जैसे मामले तो बहुत मामूली थे। एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते जितने बड़े आर्थिक घोटाले सरकार में हुए , पहले कब हुए होंगे? मगर सोनिया-मनमोहन भी सब उद्यमियों की इच्छाएं पूरी न कर सके। नतीजतन ताकतवर कारपोरेट का नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े होना कांग्रेस के लिए खतरे की खुली घंटी बन गया।

जो इस खेल को समझने से आंख चुराएगा, उसे सब मोदी का जलवा दिखाई देगा। ‘मोदी-मोदी’ या ‘हर-हर मोदी’ का रंग-रोगन बाद का है। इतना तो गाफिल भी कहता मिलेगा कि ऐसा खर्चीला चुनाव पहले नहीं देखा। पैसा पानी का तरह नहीं बहा, हवा की तरह उड़ा। सिर्फ इसलिए नहीं कि रोज के दो-तीन लंबे दौरों-सभाओं के बाद शाम को मोदी को अपने घर गांधीनगर लिवा लाने के लिए दो गुजराती उद्योगपतियों के तीन हवाई जहाज तैनात रहते थे। आधुनिक तकनीक वाले तमाम प्रचार माध्यमों और पेशेवर प्रतिभाओं की मदद से प्रधानमंत्री पद के दावेदार का सुनियोजित रूपक गढ़ा गया। मीडिया का एक हिस्सा मिलीभगत में अभियान का हिस्सा बन गया। साबुन-तेल के प्रचार की मानिंद मॉडलिंग करते ‘मोदीजी’ का रूपक गली-गली हर जुबान पर पहुंचाया गया। कोई अखबार, टीवी, रेडियो, सड़क, दीवार, यहां तक कि सोशल मीडिया पर बेनामी षड्यंत्रकारी भी खाली न रहे। जरा सोचें कि इतने संसाधनों, तैयारी के साथ प्रचार अभियान की कमान अगर सुषमा स्वराज के हाथ होती तब भी परिणाम क्या बहुत भिन्न होते?

पर प्रचार के ऊपर मोदी की ऊर्जा, और नाटकीय सही, वक्तृता अलबत्ता असरदार ज्यादा रही। चरमराई अर्थव्यवस्था, महंगाई, असंतुलित विकास, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उन्होंने सबसे अहम मुद्दा बनाया। युवा वर्ग, खास कर नए मतदाता को रोजगार का झुनझुना थमाया। गुजरात का सच्चा-झूठा विकास का मिथक उनकी स्थायी टेक बन गया। आखिरी दौर में उन्होंने जातिवादी पत्ता भी चलाया, मुसलमान बस्तियों में घूमे, मुसलिम बुजुर्गों के पांव छुए। तूफानी दौरों में अपने सीमित या फिसलते ज्ञान (अंडमान में भगत सिंह, बिहार में तक्षशिला, गंगा किनारे सिकंदर, मौर्य नहीं गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त, श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अस्थियां आदि) के बावजूद कांग्रेस से ऊबे मतदाताओं में मोदी यह उम्मीद जगाने में सफल रहे कि वे परिवर्तन ला सकते हैं। प्रचार प्रबंधकों के गढ़े नारे और गाने (मैक्सिमम गवर्नेंस, मिनिमम गवर्नमेंट… हम मोदीजी को लाने वाले हैं… अच्छे दिन आने वाले हैं!)  पुरउम्मीद और आहत मतदाता के लिए मरहम का काम करते दिखाई दिए। अनेक राजनीतिक दल हाशिए पर जाने लगे। उत्तर प्रदेश में बसपा पता नहीं कहां धंस गई। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने अपनी जमीन खो दी। कारण कांग्रेस वाला ही था। लोग उन्हें आजमा चुके थे और मोहभंग से त्रस्त थे।

इसे प्रचार अभियान का एक अंग कहना ही मुनासिब होगा कि कांग्रेस केंद्रित गठबंधन से उकताए लोगों की परिवर्तन की चाह को चौतरफा ‘मोदी लहर’ के रूप में देखा गया। सच्चाई यह है कि ‘मोदी लहर’ के प्रादुर्भाव के बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे। लोगों ने पंद्रह साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद हार गईं। चुनाव से पहले रोहिणी में नरेंद्र मोदी विराट जनसभा में अपनी रणभेरी बजा गए थे। लेकिन लोगों ने दुबले-पतले मफलर-शुदा अरविंद केजरीवाल की नई-नवेली आम आदमी पार्टी को ज्यादा उम्मीद से देखा।

दिल्ली की सफलता ने केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर पंख पसारने को प्रेरित किया। पर यह फैसला जल्दबाजी का साबित हुआ। फिर बड़े पूंजीपतियों पर हाथ डालते हुए केजरीवाल ने उनको मोदी के हक में पूरी ताकत से एकजुट होने को ही प्रेरित किया। बहरहाल, केजरीवाल पार्टी से ज्यादा एक विचार के रूप में सामने आए थे। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी और राहुल गांधी के साथ वे ही केंद्र में नजर आए। जीते ज्यादा नहीं, पर कई जगह उनके उम्मीदवार पार्टी की पहचान बनाने में सफल रहे। मतों का अहम हिस्सा उनकी झोली में भी आया है। दिल्ली में उनके मतों का प्रतिशत बढ़ा है। खुद नरेंद्र मोदी को बनारस में केजरीवाल ने नाकों चने चबाने वाली टक्कर दी। एक नई पार्टी के लिए अपनी पहचान को इतने कम समय में इतना विस्तार देना मामूली बात नहीं। हैरानी नहीं होनी चाहिए जो आने वाले दिनों में मुलायम सिंह, मायावती, लालू यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, करुणानिधि आदि दिग्गज नेताओं के बरक्स उनकी पहचान और पुख्ता हो।

इस घटाटोप में कांग्रेस के खेवनहार बनने वाले राहुल गांधी तो पार्टी के लिए बोझ ही साबित हुए हैं। वे पार्टी के उपाध्यक्ष बने, चुनाव समिति की कमान भी संभाली। वे पार्टी में साफ छवि के उम्मीदवारों के साथ नई बयार लाना चाहते थे। पर खूसट नेताओं के सामने उनकी शायद ज्यादा न चली। मोदी से कम, पर खर्चीले चुनाव प्रचार को निकले। भाषणों में उनके पास ठोस मुद्दे न थे। पार्टी के पुराने मुसलिम-आदिवासी ‘वोट बैंक’ में भी पराए सेंध मार गए। खुद के चुनाव क्षेत्र में बेड़ा पार लगाने के लिए उन्हें छोटी बहन- और पूर्णकालिक राजनीति में अनिच्छुक- प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर देखना पड़ा। ऊंच-नीच की राजनीति के जुमले छेड़ प्रियंका खबरों में रहीं, पर दोनों मिलकर भी मतदाताओं में एक विकल्प का भरोसा पैदा नहीं कर सके।

इस सब के बीच यह घड़ी अंतत: नरेंद्र मोदी को शिखर पर ले आई है। इसके श्रेय पर भाजपा का अपना दावा भले हो। पर पुरजोर दावा संघ ने किया है, जिसके स्वयंसेवकों ने पहली बार इस कदर जी-जान एक की। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने भी। वजह साफ थी कि पहली बार उनके भरोसे का स्वयंसेवक (वाजपेयी पर इतना भरोसा संघ बाद में कब करता था!) देश की कमान का दावेदार था, विशुद्ध रूप से संघ परिवार के काडर के भरोसे। इसी ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी को अपने ही लोगों के बीच इतना शक्तिमान बनाया कि आडवाणी घर जा बैठे, मुरली मनोहर जोशी की सीट मोदी ने हथिया ली, सुषमा स्वराज राष्ट्रीय पटल से अपने चुनाव क्षेत्र भेज दी गईं, वेंकैया नायडू अंतर्धान मुद्रा में चले गए, जसवंत सिंह पार्टी से बाहर कर दिए गए। गडकरी-जेटली रास्ते पर चले। राजनाथ सिंह ने संघ की बंसी के सुर मोदी के इशारों के अनुरूप रखे। गुजरात के सबसे विवादास्पद नेता अमित शाह ‘साहेब’ की कृपा से और सबों से आगे जा बैठे। इसी के चलते मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने आए हैं। यह मोदी की जीत है, मगर कहीं गहरे पार्टी की हार है।

मोदी का मानस कट्टर पहचान देता आया है। सेकुलर विचार उनके घेरे में शायद ही किसी को भाता हो। गोधरा के बाद का खूनखराबा अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे संबोधनों की शैली और राममंदिर उनकी विचार-पद्धति का अंग माने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने आप को संभाला है। क्या इनसे वे अपने आपको हमेशा के लिए ऊंचा उठा पाएंगे? बाजार को भी उनसे बड़ी आशाएं हैं। मनमोहन सिंह सरकार ढीली थी। दो-दो मंत्री बदलकर भी अंबानी को गैस के मनचाहे दाम न दे सकी। क्या मोदी देंगे? गैस महज एक कसौटी है। कारपोरेट की तो बहुत बड़ी झोली उनके सामने पसरी है।

लेकिन उससे बड़ा फलक जनता की उम्मीदों का है। महंगाई से लोग त्रस्त हैं। पड़ोसियों से तनाव के रिश्ते हैं। आतंकवाद रह-रह कर सिर उठाता है। विभिन्न समुदायों में आपसी सौहार्द वक्त की जरूरत है। इन सब मामलों में कुछ को चाहे मोदी से बहुत कम आशाएं हों, पर देश को उन्होंने बड़े सपनों में बांधा है। पर लोगों को बुलेट ट्रेन से ज्यादा अमन-चैन का जीवन यानी सांप्रदायिक सौहार्द चाहिए। आजाद भारत में अल्पसंख्यक भयभीत होकर कैसे जी पाएंगे। जीत के गाजे-बाजे और हाथी-घोड़ा-पालकी के बीच लाख टके का सवाल यह है कि क्या  इस विराट विजय के बाद मोदी अपना मानस बदलने को तैयार हैं? कमजोर विपक्षके बीच यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है। लोग उनसे रामराज्य यानी सुशासन की उम्मीद रखते हैं। मगर माईबाप संघ अभी से उन्हें राममंदिर और ऐसे ही संकीर्ण लक्ष्यों की याद दिलाने लगा है। देखते हैं देश को रामराज्य हासिल होता है या राममंदिर। या दोनों नहीं।

साभार : श्री ओम थानवी, संपादक – जनसत्ता

मार्च 14, 2014

“इंकलाब जिंदाबाद” क्या है … भगत सिंह

bhagat2[भगतसिंह ने अपने विचार स्पष्ट रूप से भारतीय जनता के सामने रखे। उनके विचार में, क्रांती की तलवार विचारों की धार से ही तेज होती है। वे विचारधारात्मक क्रान्तिकारी हालात के लिये संघर्ष कर रहे थे। अपने विचारों पर हुए सभी वारों का उन्होने तर्कपूर्ण उत्तर दिया। यह वार अंग्रेजी सरकार की ओर से किये गये या देशी नेताओं की ओर से अखबारों में।

शहीद यतिन्द्रनाथ दास ६३ दिन की भूख हड़ताल के बाद शहीद हुए। Modern Review के संपादक रामानंद चट्टोपाद्ध्याय ने उनकी शहादत के बाद भारतीय जनता द्वारा शहीद के प्रति किए गये सम्मान और उनके “इंकलाब जिन्दाबाद” के नारे की आलोचना की। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने Modern Review के संपादक को उनके उस संपादकीय का निम्नलिखित उत्तर दिया था। – सं]

श्री संपादक जी,
माडर्न रिव्यू,

आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसंबर, १९२९ के अंक में एक टिप्पणी “इंकलाब जिन्दाबाद” शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना जिसे प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टी से देखता है, हमारे लिये बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या अभिप्राय है?

यह आवश्यक है, क्यूं कि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक पहुंचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है। यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आंदोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों “बोस्टन और आईल” में यही नारा कुछ अराजकतावादी क्रांतिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है सशत्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिये भी स्थाई न रह सके। दूसरे शब्दों में देश और समाज में अराजकता फ़ैली रहे।

दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो संभव है, भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए, परंतु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इनके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें नीहित हैं।

उदाहरण के लिये हम यतिन्द्रनाथ जिन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा तात्पर्य यह होता है उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिये बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिये अचूक उत्साह को अपनाएं। यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं। इस प्रकार हमें “”इंकलाब” शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिये। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्युनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।

इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रांति (इंकलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशत्र आंदोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफ़ल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी संदेह नहीं है कि कुछ आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रान्ति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो।

इस वाक्य में “क्रान्ति” शब्द का अर्थ “प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा” है। लोग साधारण जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता है और रूढ़ीवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं।

क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओत-प्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिये संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे और वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि आदर्श व्यवस्था संसार को बिगाड़ने से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रख कर “इंकलाब जिन्दाबाद” का नारा ऊंचा करते हैं।

भगतसिंह, बी. के. दत्त
२२ दिसंबर, १९२९
[“सरदार भगतसिंह के राजनैतिक दस्तावेज”, संपादक चमनलाल व प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इन्डिया]

मार्च 14, 2014

तुम जो फ़ांसी चढ़ने से बच गये हो…(भगत सिंह)

bhagatभगत सिंह का पत्र——- बटुकेश्वर दत्त के नाम

प्रिय भाई,

मुझे दंड सुना दिया गया है और फ़ांसी का आदेश हुआ है। इन कोठरियों में मेरे अतिरिक्त फ़ांसी की प्रतीक्षा करने वाले बहुत से अपराधी हैं। ये लोग यही प्रार्थना कर रहे हैं कि किसी तरह फ़ांसी से बच जाएं, परंतु उनके बीच शायद मैं ही एक ऐसा आदमी हूं जो बेताबी से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूं जब मुझे अपने आदर्श के लिए फ़ांसी के फ़ंदे पर झूलने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

मैं खुशी के साथ फ़ांसी के तख्ते पर चढ़कर दुनिया को यह दिखा दूंगा कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए कितनी वीरता से बलिदान दे सकते हैं।

मुझे फ़ांसी का दंड मिला है, किन्तु तुम्हे आजीवन कारावास का दंड मिला है। तुम जीवित रहोगे और तुम्हे जीवित रह्कर दुनिया को यह दिखाना है कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए केवल मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रह कर हर मुसीबत का मुकाबला भी कर सकते हैं। मृत्यु सांसारिक कठिनाईयों से मुक्ति प्राप्त करने का साधन भी नहीं बननी चाहिये, बल्कि जो क्रान्तिकारी संयोगवश फ़ांसी के फ़ंदे से बच गए हैं, उन्हे जीवित रह्कर दुनिया को यह दिखा देना चाहिए कि वे न केवल अपने आदर्शों के लिए फ़ांसी चढ़ सकते हैं, बल्कि जेलों की अंधकारपूर्ण छोटी कोठरियों में घुल-घुलकर निकृष्टतम दर्जे के अत्याचारों को सहन भी कर सकते हैं।

तुम्हारा
भगतसिंह

सेन्ट्रल जेल, लाहौर
अक्टूबर ,१९३०

सरदार भगतसिंह के राजनैतिक दस्तावेज”, संपादक चमनलाल व प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इन्डिया

जनवरी 24, 2014

अरविंद केजरीवाल : अकेला ‘धरना’ क्या भाड़ झोंकेगा!

arvindkअरविंद केजरीवाल एक संवैधानिक पद पर हैं और इस छोटी अवधि वाले आंदोलन से उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे आप के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री दोनों के रूप में जनता के हितों को साधने के अपने धर्म की रक्षा भली भांति कर सकते हैं| उन्होंने एक बार कहा था कि वे और आप पुराने दलों और नेताओं को राजनीति सिखाने आए हैं और उन्होंने इसे सिद्ध भी कर दिया|

किरण बेदी जैसे एक्टीविस्ट लोग, जो ईर्ष्या और “अंगूर खट्टे हैं” वाले सिंड्रोम से पीड़ित हैं, जब टीवी पर विलाप करते हुए चीखते हैं कि मीडिया को हटा लो और फिर देखो कितने लोग वहाँ रहते हैं तो वे भूल जाते हैं कि 20 जनवरी की सुबह अरविंद केजरीवाल तो गृहमंत्री के दफ्तर के बाहर अपने छह मंत्रियों के साथ धरना देने चले थे और उन्होंने आम जनता को वहाँ आने से मना किया था| चार हजार पुलिस वाले अगर परिंदे को भी पर नहीं मारने देते रेल भवन पर तब भी अरविंद केजरीवाल अपने छह साथियों के साथ डटे रहते| मीडिया को तो खबर चाहिए और आज की तारीख में अरविंद केजरीवाल से बढ़कर कोई नहीं है जो उन्हें एक्सक्लूसिव बाईट दे|

26 जनवरी की तारीख देखते हुए अरविंद केजरीवाल का 20 तारीख को धरने पर बैठने का निर्णय दुधारी तलवार जैसा था और यही हालत केन्द्र सरकार की भी थी| अरविंद केजरीवाल को रेल भवन पर रोकने का निर्णय केन्द्र सरकार का था जिसके बाद ही अरविंद केजरीवाल ने अपील की कि धरने के समर्थक वहाँ पहुंचें| अगर गृहमंत्री दिल्ली के मंत्रियों को अपने मंत्रालय के बाहर बैठने देते तो बहुत से टकराव टाले जा सकते थे| पर केन्द्र सरकार को तो अरविंद केजरीवाल को बदनाम करना था सो सुबह से ही मेट्रो के चार स्टेशन बंद कर दिए गये| उन्हें अपने चार हजार पुलिस वालों पर भरोसा नहीं था कि वे जनता को वहाँ जाने से रोक पायेंगे|

कुछ लोग दलीलें दे रहे हैं कि कम समर्थक वहाँ उमड़े इसलिए अरविंद केजरीवाल ने निराश होकर धरना वापिस ले लिया| लोग भूले दे रहे हैं कि धरना सोमवार से शुरू हुआ था और कामकाजी वर्ग को धरने पर जाने में बहुत मुश्किलें आनी थीं| और लोगों को वहाँ आने की अपील सोमवार दोपहर के आसपास की गयी| एकदम से तो लोग पहुँच नहीं पायेंगे तब विशेष रूप से जब पुलिस ने वहाँ छावनी बना डाली हो| इसके बाद भी यही धरना अगर शुक्रवार को शुरू होता तो आधी से ज्यादा दिल्ली वहीं नजर आनी थी| पिछले साल दामिनी मामले में शनिवार और रविवार को उत्पन्न हुए जमावड़े को याद कर लें तो बात आसानी से समझ में आ जायेगी और अरविंद केजरीवाल का यह कदम इतना अजूबा था आम जनता के समझने के लिए कि जब तक वे इसके लाभ, नुकसान और अर्थ को समझ पाते, धरना ही खत्म हो गया|

अरविंद केजरीवाल और आप का लचीला रुख सामने आया जो फिर से भाजपा और कांग्रेस के दुष्प्रचारों पर कुठाराघात था| इन्हें आशा थी कि अरविंद केजरीवाल अड़ियल आदमी की तरह अड़े रहेंगे और सत्ता तंत्र  उन्हें कुचल देगा|

अरविंद केजरीवाल  की तुरंत निर्णय लेने की क्षमता (या आलोचक उतावली कहना चाहें तो कह सकते हैं), उनके इस धरने से स्पष्ट हो जाती है|

गांधी भी अपने आंदोलनों को एक अवधि के बाद वापिस लिया करते थे जिसका एक बड़ा कारण स्पष्ट है कि जनता की भागीदारी वाले आंदोलन बहुत लंबे समय तक नहीं खींचे जा सकते क्योंकि हरेक की अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याएं गुरुत्वाकर्षण बल का काम करती हैं व्यक्ति की आंदोलनकारी प्रवृत्ति पर|

अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ पर मौजूदा राजनीतिक तंत्र की तरह से किये जा रहे हमलों के कारण राजेश जोशी की एक प्रसिद्द कविता की कुछ पंक्तियाँ बेहद प्रासंगिक दिखाई देती हैं|

बरदाश्त नहीं किया जायेगा

किसी की कमीज हो

उनकी कमीज से ज्यादा सफेद।

जिसकी कमीज पर

दाग नहीं होंगे

मारे जायेंगे।

इस समय

सबसे बड़ा अपराध है

निहत्था और निरपराध होना।

जो

अपराधी नहीं होंगे

मारे जायेंगे। 

कांग्रेस की यह चाल थी कि आप की सरकार बनाकर वह इसकी कमीज को भी पुराने दलों जैसी गंदी साबित कर देगी और फिर से सालों के लिए अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित कर लेगी| किसी भी मामले पर कमेटी बैठा देना, जांच समिति बैठा देना इस आशा में कि कुछ दिनों में जनता भूल जायेगी और मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा, ऐसा अभी तक सारे राजनीतिक दल करते आए थे| पुराने राजनीतिक तंत्र द्वारा सारी कवायद यही चल रही है कि देश के सामने यह जल्दी से जल्दी सिद्ध कर दिया जाए कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथी भी उतने ही भ्रष्ट हैं, अगर यह नहीं होता तो देश को दिखाया जाये कि ये लोग अक्षम हैं सरकार चलाने में| कांग्रेस रोज ही राग अलापती है कि वह ‘आप‘ को तब तक समर्थन देगी जब तक वे जनहित के काम करते रहेंगे पर अंदरखाने वह किसी भी तरह ‘आप‘ कुछ भी ऐसा नहीं करने देना चाहती जिससे कि इनकी छवि बने या निखरे| कांग्रेस ने पहले हाँ करके अब अरविंद केजरीवाल को उनकी भ्रष्टाचार रोधी शाखा के लिए उपयुक्तत अधिकारी देने में असमर्थता दिखाई है| कुछ ही दिन पहले एक टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वे कॉमनवेल्थ खेल घोटाले को उजागर करने के लिए सम्बंधित फाइलें देख रहे हैं और कांग्रेस पछताएगी कि उसने क्यों ‘आप‘ को समर्थन दिया| कांग्रेस को ‘आप‘ की सरकार को समर्थन एक जाल है और ‘आप‘ को इस चक्रव्यूह को तोड़कर ही अपनी श्रेष्ठता दिखानी है|

अगर केन्द्र सरकार और पुराने राजनीतिक दल ये सोच रहे हैं कि वे अरविंद केजरीवाल को अपने जैसा बना लेंगे तो यह धरना उनकी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त है कि ऐसा होने वाला है नहीं|  अरविंद केजरीवाल के धरने ने स्पष्ट जता दिया है कि उनके साथ और उनके रहते भारत में ऐसा हो पाना कठिन होगा और आगे तो यह असंभव हो जाएगा| जो गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि धरना अराजक था उन्हें अपने सिद्धान्त और अपने विचार फिर से खंगालने की जरुरत है| अरविंद केजरीवाल राजनीति में पुराने की जगह बैठ कर वही सब करने नहीं आए हैं जो चलता आ रहा है| वह इस खेल के सारे नियम बदलने आए हैं| इसमे कतई अतिशयोक्ति नहीं कि अगर ऐसा उस समय होता जब गांधी, सुभाष और भगत सिंह जिंदा थे तो शत प्रतिशत तीनों क्रांतिकारी नेता इस धरने के मंच पर बैठे दिखाई देते|

इस धरने ने कांग्रेस को स्पष्ट सन्देश दे दिया कि वह ‘आप‘ की बांह मरोड कर राजनीति नहीं कर सकती और ‘आप‘ चांटा खाकर दूसरा गाल आगे करने वाली है नहीं वह कांग्रेस के दोनों गाल जनता के सामने शर्म से लाल करवा देगी ज्यादा बुद्धिमत्ता दिखाकर| अभी कांग्रेस की एक चाल ‘आप‘ पर भारी रही है मेट्रो को बंद करके कांग्रेस ने पूरा इंतजाम कर दिया कि आम लोग ‘आप‘ के खिलाफ हो जाएँ| हो सकता है इस बात ने ‘आप‘ को बहुत प्रभावित किया हो पर थोड़ी अवधि में लोग असल बात समझ जायेंगे|

भाजपा को सन्देश दे दिया कि अब मुद्दे ‘आप‘ निश्चित करेगी और भाजपा की मजबूरी रहेगी ‘आप‘ के उठाये मुद्दों पर प्रतिक्रया देकर या उसकी नक़ल करके उसकी पिछलग्गू पार्टी बनने की|

किरण बेदी जैसे किसी खास भावना से ग्रस्त हो चुके दिमाग ही यह सोच सकते हैं कि सोमनाथ भारती के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए यह धरना आयोजित किया गया था| उनकी जानबूझ कर बंद की हुयी आखें देख पाने में असमर्थ हैं कि सोमनाथ भारती का मुद्दा क्या भुला दिया गया, क्या वह पार्श्व में चला गया? बल्कि वह तो और ज्यादा सामने आ गया है| सोमनाथ भारती की आड़ में पुरानी राजनीति ‘आप‘ पर और तीव्र हमले करगी| हो सकता हो सोमनाथ भारती की गलती हो पर क्या सिर्फ इसलिए कि यह मुद्दा ‘आप’ सरकार से जुड़ा हुआ है, एक ड्रग्स और देह व्यापार से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण मसले को रंगभेद और नस्लीय अंतर का मामला करार देकर देश की छवि से खेल सकते हैं पुराने दल? सोमनाथ भारती बलि चढ़ जायंगे या नहीं मुद्दा यह नहीं है|

वास्तविक  मुद्दा यही है कि भारतीय राजनीति में बदलाव की क्रिया शुरू हो चुकी है| या तो पुरानी राजनीति अपने आचार व्यवहार और सोच में परिवर्तन लाकर सच में समाज में अंतिम व्यक्ति के हितों की रक्षा करने के प्रयास करेगी, या जनता ही इन्हें सुधरने पर मजबूर कर देगी और वे दोनों ही तेरीकों से नहीं सुधरते तो धरती पर जीवन का इतिहास बताता है कि अस्तित्व तो यहाँ बेहद शक्तिशाली डायनासोर का भी नहीं रहा, भ्रष्ट राजनीति भी अप्रासंगिक हो दफा हो जायेगी|

पुराने राजनीतिक दलों, उनके थिंक टैंक, बड़े बड़े राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार, लेखक, समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी, कोई ऐसा नहीं है जो पहले से अनुमान लगा ले कि अरविंद केजरीवाल और योगेन्द्र यादव एवं साथी क्या करने वाले हैं, इनकी दिशा क्या है? ये लोग जब कुछ कर देते हैं तब बुद्धिजीवी मंथन शुरू कर देते हैं| दो बातें संभव हैं – या तो जहां इनकी  किताबी सिद्धांत आधारित बुद्धि खत्म हो जाती है उससे परे का ‘आप‘ पार्टी के कर्ता-धर्ता सोच रहे हैं या वे इतना साधारण सोच रहे हैं और इन बुद्धिजीवियों को नाक और आँखें नीचे करके सोचने का तरीका ही नहीं आता सो वे देख और समझ ही नहीं पा रहे हैं अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक  रणनीति, जो खुलेआम कदमताल करती हुयी समाज के सबसे निम्न वर्ग की ओर बढ़ती जा रही है, और रास्ते से सभी वर्गों की सहूलियत के लिए भ्रष्टाचार पर झाडू फेरती जा रही है|

यह धरना समाज के अंतिम व्यक्ति का महत्व भारतीय राजनीति के सम्मुख बढाने की ओर पहला कदम है|

गांधी ने कहा था कोई भी योजना बनाने से पहले समाज के अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचना कि क्या यह योजना उसे लाभान्वित करेगी अगर नहीं तो योजना बेकार है| अरविंद केजरीवाल उसी ओर बढते नजर आ रहे हैं| उच्च वर्ग को तो अरविंद केजरीवाल से बहुत दिक्कतें होने वाली हैं क्योंकि दशकों से जो घोषित एवं अघोषित सब्सिडी विभिन्न सरकारों से लेकर उन्होंने अपनी सम्पन्नता को बरकरार रखा है वह सुविधा खत्म हो जायेगी अगर आप केन्द्र की राजनीति में अपना दखल बढाती है| एफ.डी.आई पर दिल्ली राज्य में आप सरकार द्वारा निर्णय लेते ही मीडिया चैनलों और अखबारों की तोपें आप सरकार की तरफ स्पष्ट रूप से गोले दागने लगीं|

सुविधाभोगी वर्ग को बेहद तकलीफ होती है जब कोई विकेन्द्रीकरण की बात करता है क्योंकि उनके लिए आसान है एक खास वर्ग को अपनी मुट्ठी में रखना परन्तु अगर आम जनता में शक्ति फ़ैल जाए तो उन्हें बेहद मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है, कठोर परिश्रम करना पड़ता है|

पूरे देश ने देखा होगा एक युवक को जो धरना स्थल पर पुलिस के समूह में घूम घूम कर तलाश कर रहा था कि किस पुलिस वाले ने उसे मारा था| क्या कोई सोच सकता था ऐसा हो पाना अब से पहले? पुलिस ने अपनी छवि एक दुर्दांत समूह की बना ली है| बहरहाल इतना तय है कि इस धरने के बाद दिल्ली पुलिस न तो अरविंद केजरीवाल सरकार को और न ही आम जनों की समस्याओं को टालने की हिम्मत कर पायेगी| उसे एक्शन लेना ही पड़ेगा वरना जनता में उसके खिलाफ असंतोष बढ़ता ही जाएगा और मुखरित भी होने लगेगा| आखिरकार जनता को इतना तो समझ में आता ही है अब कि चाहे पुलिस का सिपाही हो या कमिश्नर, दिल्ली में गृह सचिव हो या उनके दफतर में कार्यरत सबसे छोटा सरकारी कर्मचारी, सबक वेतन जनता के दिए धन से ही चुकाए जाते हैं और उनकी जवाबदेही जनता के प्रति है| भ्रष्ट तंत्र ने ऐसा माहौल बना दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को जनता के प्रति उत्तरदायित्व होना चाहिए ऐसी धारणा ही खत्म हो चली थी| इस धरने से बहुत से सरकारी कर्मचारी अपने आप ही अपने उत्तरदायित्व का पालन करते नजर आयेंगे क्योंकि उन्हें दिख गया होगा कि अब जनता ज्यादा जागरूक हो गई है|

आप पर हमले बढते जा रहे हैं| रोचक बात है कि आप जनता की लड़ाई लड़ रही है और जनता खुद आप के लिए लड़ रही है| दीवार पर इबारत साफ़ साफ़ लिखी है जिन बुद्धिजीवियों को दिखाई नहीं दे रही उन्हें भी कुछ महीनों में दिखने लगेगी|

ऐसा भी संभव है कि पुरानी राजनीति अरविंद केजरीवाल और ‘आप‘ को समाप्त कर दे या हरा दे पर अब इस क्रान्ति के बीज को पनपने से रोका नहीं जा सकता|

किसी और से ज्यादा ये पंक्तियाँ अरविंद केजरीवाल और आप के लिए ज्यादा मुनासिब दिखाई देती हैं|

मेरी हिम्मतें अभी झुकी नहीं,

मेरे शौक अभी बुलंद रहे

मुझे हार-जीत से क्या गरज

मेरी जंग थी मैं लड़ा किया!

जनवरी 21, 2014

अरविन्द केजरीवाल : एक धरना और सहूलियत को खांसी

नई राहें बताता है नये रास्ते दिखाता हैarvind sleep

नहीं मालूम जालिम (…) रहजन है कि रहबर है 
जब प्रकृति भी बारिश और सर्द हवाओं के जरिये भारत देश की राजधानी दिल्ली में वी.आई.पी क्षेत्र में खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों एवं समर्थकों के हौसले, उनकी सच्चाई और ईमानदारी में निष्ठा को कसौटी पर कस रही है तब अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के उद्देश्यों में पूरी निष्ठा रखने वाले लोगों को ही  आशा है कि जल्द ही सूरज निकलेगा और पूर्णतया स्वच्छ आकाश में पहले से ज्यादा लुभावनी छटा और चमक दिखायेगा और बाकी लोगों को संदेह ने घेर लिया है| इन् बाकी लोगों में ज्यादातर ऐसे हैं जिनका कभी भी जनांदोलनों में विश्वास नहीं रहता और व्यवस्था के विरोध मात्र से उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है| ‘आप‘ की दिल्ली विधानसभा में मिली सफलता ने इन् शंकालुओं में से बहुतों को ‘आप‘ की ओर और इस विचार की ओर धकेला कि शायद अब आगे ‘आप‘ का हे ज़माना रहेगा और यही व्यवस्था भारत में चलेगी सो बेहतर है थोड़ा पहले ही ‘आप‘ के साथ हो लो, बच्चों और नाती पोतों को कहने को भी हो जाएगा कि एक बदलते समय में वे बदलाव लाने वालों के साथ खड़े थे|

पर उन्हें आशा नहीं थी कि अरविन्द केजरीवाल सरकार बनाने के बावजूद कबीर की तरह बीच बाजार लठ लेकर खड़े हो जायेंगे और सत्ता और व्यवस्था को ललकारेंगे कि जनता के हक उसको दो नहीं तो उन्हें भी चैन से सोने नहीं दिया जाएगा|

ये बड़े आनंद का विषय है कि ‘आप‘ के स्थायी और अस्थायी विरोधीगण पानी पी पीकर ‘आप‘ को कोस रहे हैं कि ‘आप‘ अराजकता फैला रही है और और भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं कि यह खत्म हो जायेगी| अरे, ‘आप‘ अगर खत्म हो जायगी तो इन्हें तो खुश होना चाहिए कि इनके मार्ग का काँटा अपने आप दूर हो गया पर इनके चेहरे की हवाइयां कुछ और ही बयान कर रहे हैं| कांग्रेस और भाजपा के नेता क्यों इतने परेशान हैं अगर ‘आप‘ वाले गलत कर रहे हैं| अगर वे संविधान अपने हाथों में ले रहे हैं तो उन्हें उठाकर जेल में ठूंस दो और अगर वे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं तो आनंद मनाओ कि आगामी लोकसभा चुनाव में फिर से चुनावी समर दो सत्ताभोगी अनुभव प्राप्त दलों के बीच ही होगा और कोई एक शक्ति सरकार बनाएगी|

जिन्हें लग रहा है कि सब प्रचार के लिए हो रहा है उन्हें क्या किसी ने रोका है, निकलो घर से बाहर, सर्द रातें खुले आसमान के नीचे बिताओ और अपने दलों के लिए वोट जुटाओ| जनहित के मुद्दों पर कष्ट सहकर वोट जुटाएंगे तो जनता अपने आप उनका सम्मान करने लगेगी|

शरीर की अपनी सीमाएं हैं और सड़क पर भयंकर सर्दी में रात में सोकर सुबह उठने पर बीमार अरविन्द केजरीवाल का चेहरा तो लाजिम था कि इस बात की गवाही देता कि स्थितियां उनके शरीर पर असर डाल रही हैं पर उनके हौसले तो बीते दिन से भी ज्यादा मजबूत दिखाई दिए|

तेरी सुबह बता रही है तेरी रात का अफसाना

सुबह जैसा चेहरा लिए ‘आप‘ विरोधी तंत्र सक्रिय हुआ है उससे पता चलता है कि रात अरविन्द केजरीवाल पर नहीं पर इस तंत्र पर भारी बीती है|

और अगर ‘आप‘ सिर्फ और सिर्फ दिल्ली की सीमाओं में फैला एक संकीर्ण आंदोलन मात्र है तो क्यों परेशान हो रहा है ‘आप‘ विरोधी तंत्र?

कहते हैं एक चित्र हजारों शब्दों से ज्यादा सजीव होता है सन्देश देने के लिए| नीचे दिया चित्र भी कुछ कह रहा होगा|

संसार जानता है थोड़े से लोग बहुतों से अधिक हैं!

arvindkejriwal

विगत में देश को कई मर्तबा अराजकता के दलदल में धकेलने वाले भी गले फाड़ फाड़ चिला रहे हैं कि देश अराजकता की ओर ले जाया जा रहा है ‘आप‘ द्वारा|

बहुत साल नहीं बीते – भाजपा के उस समय के अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी देश भर में रथ यात्रा करते हुए नफ़रत के कण बिखेरते चलते हैं, भाजपा का मुख्यमंत्री (कल्याण सिंह) हलफनामा देता है, और पार्टी के बड़े बड़े नेता (लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, और उमा भारती आदि इत्यादि) भीड़ इकट्ठा करके इतिहास (रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवादास्पद ढांचा तोड़ना) से छेड़खानी करके देश को साम्प्रदायिक दंगों के हवाले कर देते हैं और ऐसे सीधे, भोले और भले लोग आज अराजकता की बातें कर रहे हैं जबकि सारी दिल्ली जानती है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले बिना और बिना क़ानून व्यवस्था को दिल्ली राज्य सरकार के अधीन बनाए बिना दिल्ली में सरकार (कोई भी दल सरकार बनाए) ढंग से दिल्लीवासियों की सेवा नहीं कर सकती| अगर कोई प्रस्ताव सालों से अटका हुआ है और दिल्ली में क़ानून व्यवस्था का ठीकरा दिल्ली सरकार के सिर फोड़ा जा रहा हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री को केन्द्र के सामने दबाव तो बनाना ही पड़ेगा कि पहले क़ानून व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन करो और उसके बाद सरकार का प्रदर्शन देखो|

केन्द्र सरकार सरकारी दिल्ली (लुटियंस जोन्स) को छोड़कर बाकी सारी दिल्ली की क़ानून व्यवस्था दिल्ली सरकार के अधीन कर सकती है|

दिल्ली पुलिस अरविन्द केजरीवाल की ‘आप‘ सरकार के अधीन होगी तो इतना तो निश्चित है कि बी.एम्.डब्लू एक्सीडेंट केस, प्रियदर्शनी मट्टू, नीतिश कटारा और जेसिका लाल हत्याकांडों जैसे मामलों में कितना भी प्रभावी व्यक्ति न हो, पुलिस के ऊपर दबाव नहीं बना पायेगा और मृतक के परिवार वालों को केस में शुरू से ही क़ानून का निष्पक्ष साथ मिलेगा|

जनकवि सालों साल इस आशा में दिमाग, कलम और गले का उपयोग कर करते रहे कि कभी तो कोई नायक उठेगा जनसाधारण के हितों के लिए और ऐसे जनकवियों को रात दिन अपने लेखों और भाषणों में याद कर करके अपने को जनता से जुड़ा बताने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग और मुँह में भरी सर्दी में दही जम गया है जब सामने घटनाएं हो रही हैं और अब आग से खेलने की बात करने वाले एक सुर में गा रहे हैं – ज्यादा हो रहा है| इनके पूर्वजों के जीवन के घटनाक्रमों की मैपिंग संभव हो तो पाया जाएगा विगत में वे गांधी, सुभाष, भगत सिंह आदि और उनके कर्मों को भी ऐसे ही संशय में खड़े देखते रहे होंगे और सोच रहे होंगे कहाँ फंसा रहे हैं ये बंदे, थोड़ी बहुत परेशानी है गुलामी में पर अब तो आदत हो गई है सो चलने दो|

उलजलूल  तर्क देने वाले लोगों को कोई समझदार व्यक्ति समझाए कि उन्हें इस बात पर ऊर्जा लगानी चाहिए कि कैसे केन्द्र सरकार दिल्ली की क़ानून व्यवस्था को दो भागों में विभक्त करके वीआईपी लुटियंस जोन की सुरक्षा केन्द्र के पास रखकर बाकी सारी दिल्ली की क़ानून व्यस्था की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से दिल्ली सरकार के हाथों में दे सकती है| इन्ही पुलिस वालों की क्षमता निखर कर सामने आयेगी ईमानदार और जवाबदेह सरकार के साथ काम करने से|

कहा जा रहा है कि एक केन्द्रीय मंत्री के घर का शीशा टूटने पर सुरक्षा में तैनात बारह -तेरह पुलिसकर्मी निलंबित या बर्खास्त कर दिए गये थे अब इतने सक्रिय तंत्र को क्या हो गया है?

दिल्ली में कानून दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है, और केन्द्र के गृह मंत्री और केन्द्र सरकार के सामने इस प्रश्न पर दिल्ली सरकार भी आम आदमी जैसी ही बेबस है| विचित्र लगते हैं लोगों के तर्क कि दिल्ली में अपराध होते रहें और दिल्लीवासी इस द्वंद में फंसे रहें कि उनकी अपनी सरकार से कैसे इस मामले में काम करवाया जाए? क्या दो राज्यों की सीमाओं पर क़ानून व्यवस्था बिगड जाती है? चंडीगढ और पंचकूला में दिक्कते आ रही हैं? अगर नहीं तो कैसे केन्द्र और दिल्ली राज्य सरकार के बीच कानून व्यवस्था को लेकर स्पष्ट विभाजन होने से समस्या हो जायेगी? यह एक ज्वलंत समस्या है और केन्द्र सरकार को अपनी पूरी क्षमता इसका समाधान देने में लगा देनी चाहिए| समस्या को ताला क्यों जा आरहा है? अरविन्द केजरीवाल की सरकार तो भागने वाली है नहीं इस समस्या से मुँह मोड़कर, आज केन्द्र की सत्ता उन्हें वहाँ से हटा सकती है, जेल में बंद कर सकती है पर जब भी वे आजाद होंगे यही मांग उठाते रहेंगे| दिल्ली राज्य का वाजिब हक उसे दे दो और सर्वत्र शान्ति बरपा दो|

एक बात तो तय है कि अरविन्द केजरीवाल नामक ऊर्जा नखदंत विहीन दिल्ली सरकार में जाया करने के लिए नहीं है| केन्द्र सरकार और पुराने दलों को भली भांति समझ लेना चाहिए कि जनता अब इस जागृति से भर चुकी है कि

सरकारें देश के लिए होती हैं, देश सरकारों के लिए नहीं होता|

अगस्त 15, 2011

तिरंगा: कहाँ हैं इसे ऊँचा रखने वाले?

हम कब जानते हैं
स्वतत्रता दिवस का अर्थ?

हाथ रिक्शे–ठेले खेंचते
फावड़े-कुदाल चलाते
पसीने में नहाये जिस्मों के लिए
भीख के लिए फैले हाथों के लिए
मजदूर-किसानों के लिए
चंद एक रुपयों का मिलना
सर्वोपरी और महत्वपूर्ण है।

सदियों से मुफलिसी के गुलामों को
आज़ादी के दिन का क्या पता?

बाकी बचे छात्र–बाबू–नौकरीपेशा-व्यापारी
उनके लिए यह पावन दिन
औकात के मुताबिक
फार्म हाउसों से चाय की थडी तक
मौज मस्ती मनाने के लिए
सरकारी छुट्टी के सिवा कुछ नहीं।

किसे याद हैं
कौन याद दिलाता है.
गोलियाँ, लाठियां, काला पानी और जलियाँवाला
भगत सिंह, बोस, अशफाक….
अनगिनत थे आज़ादी के परवाने।

बेचारे अमिताभ-सलमान से हार गए
हमने राष्ट्रपिता उस नंगे फकीर
बापू का
आज़ादी के बदले शुक्रिया गोली से दिया
अब हम उसके ऐनक चुराते फिर रहे हैं।

हम ज़मीर फरोशों के
चहरों पर मुंह नहीं मुखौटे हैं
फिर शर्म किसे आयेगी
तिरंगा ही तो फहराना है
ऐसे नहीं तो वैसे
जैसे-तैसे फहरा ही देंगे।

(रफत आलम)

अगस्त 14, 2011

तिरंगा : किस मुँह से फहराओगे, किस मुँह से देखोगे?

केसरिया रंग

हमारे तिरंगे का मुकुट
कट्टरता का प्रतीक बन गया है
पार्कों-स्कूल के मैदानों पर
तिरंगे का काम ही क्या?

भगवा झंडों के साये में
अस्त्र-शस्त्र चालन प्रक्षिक्षण शिविर
गवाह हैं जगाई जाती नफरतों के
जहाँ से केसर की खुशबु फैलनी चाहिये थी
बमों के विस्फोट हो रहे हैं
स्वर्ग को नरक बना दिया है नफरतों ने।

सफेद रंग

हमारे तिरंगे का ह्रदय
काले को सफ़ेद करने का जादू भर है आज
मोती तोंद वाले सफेदपोश
सिल्क खादी की जगमगाहट के पीछे
अपनी तमाम काली करतूतें
आसानी से छिपाए हुए हैं
सफेद वो सियाही है
जिसके लिखे स्विस खातों के नम्बर
किसी से नहीं पढ़े जाते
हाँ,

बीच का चक्कर

ज़रूर घूम रहा है
दलाली, कमीशन और घोटालों की
पहचान बन कर
दरसल आज़ादी के ये ही रसफल
हमसे चुनाव लड़वाते हैं
हिस्ट्रीशीटरों को नेता बनवाते हैं।

हरा रंग

हमारे तिरंगे की बुनियाद
गाँवों से लाता था हरियाली की मजबूती
खेतों में मासूमियत की खाद से
गहराती थी अपने पाक संस्कारों की जड़ें
उस विशाल वृक्ष तले अपनत्व की शीतल छाँव थी
शहरियत के कंक्रीट जंगल ने
मशीनी धुंआं फेंकते दानवों का
शोर उगा दिया है
पक्षियों की कलरव के स्थान पर
अपने-अपने सीमेंट के दडबों में बंद हुआ आदमी
भूल चला है सभी संवेदनाए
राजा हरीश चन्द्र का किस्सा अब किसे लुभाता है
आज नए  दौर के हीरो राजा–राडिया-कलमाड़ी-रेड्डी-येद्दयुरप्पा हैं
बेईमानी के हमाम में सभी नंगे
घोटालों–घूसखोरी की फसलें काट रहे हैं
रूपये-डालर-मार्क–येन-मार्क-पौंड का हिसाब
स्विस बैंको में है दफन।

एक बूढ़ा नैतिकता की बात कर रहा है
नूराकुश्ती में मग्न पक्ष भी, विपक्ष भी
सब होंठों तले हंस रहे हैं।

मेरे दोस्तों! स्वतत्रता दिवस बहुत मुबारक
क्या तुम्हे कल ज़रा भी ख्याल आएगा
किस मुँह से पी.एम.फहरायेंगे तिरंगा?
किस मुँह से तुम देखोगे तिरंगे को?

(रफत आलम)

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