जॉन एलिया : कहते हैं कि उनका था अंदाजे बयां और

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और

यह शेर कहा तो हजरत ग़ालिब ने खुद के लिये था पर जॉन साब को मंच से शायरी करते देखना और सुनना बखूबी जता देता है कि यह शेर जॉन साब पर भी उतना ही मौजूँ है जितना कि हजरत ग़ालिब के लिये था। जॉन साब द्वारा पिरोये गये अल्फाज़ गहरे मायने बिखेर देते हैं अगर उन्हे खुद जॉन साब की आवाज में ही सुना जाये और अगर उन्हे कलाम कहते देख लिया जाये तो साफ साफ पता चलता है कि वे मंच की दुनिया के बादशाह थे।

कतात

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मेरी अक्लो होश की सब हालते
तुमने साँचे में जुनु के ढाल दी

कर लिया था मैंने एहदे तर्के-इश्क
तुमने फिर बाहें गले में ड़ाल दी

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किसी लिबास की खुशबू जब उड़ के आती है
तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है

तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी खुशबू को
तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है

तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं
मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

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कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग होंगे जो उसको भाते होंगे

उसकी याद की बादेसबा और तो क्या होता होगा
यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे

यारो कुछ तो जिक्र करो तुम उसकी क़यामत बाहों का
वो जो सिमटते होंगे उनमे वो तो मर जाते होंगे

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गज़ल
………….

हालतेहाल के सबब हालतेहाल ही गयी
शोक में कुछ नहीं गया शोक की जिंदगी गयी

एक ही हादसा तो है और वो यह की आज तक
बात नहीं कही गयी बात नहीं सुनी गयी

बाद भी तेरे जानेजा दिल में रहा जब समां
याद रही तेरी यहाँ फिर तेरी याद भी गयी

उसकी उम्मिदेनाज़ का हमसे यह मान था के आप
उम्र गुजार दीजिए उम्र गुजार दी गयी

उसके विसाल के लिए अपने कमाल के लिए
हालतेदिल थी खराब और खराब की गयी

तेरा फिराक जानेजा ऐश था क्या मेरे लिए
तेरे फ़िराक में खूब शराब पी गयी

उसकी गली से उठ के में आन पड़ा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गयी

…………………………………………………………

नज्म

………….

मुझ से पहले के दिन
अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे

ख्वाब ओ ताबीर के गुमशुदा सिलसिले
बारह अब सताने लगे हैं तुम्हे

दुःख जो पुहंचे थे तुमसे किसी को कभी
देर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हे

अब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हे
अपने वो अहद ओ पेमा मुझे से जो न थे

क्या तुम्हे मुझसे कुछ भी कहना नहीं

 

प्रस्तुती – (रफत आलम)

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4 टिप्पणियाँ to “जॉन एलिया : कहते हैं कि उनका था अंदाजे बयां और”

  1. मैं शुक्र गुजार हूँ स्वार्थ संपादन कक्ष विशेषरूप से जनाब राकेश जी का जो पत्थर को हीरा बनाना जानते हैं .

  2. यारो कुछ तो जिक्र करो तुम उसकी क़यामत बाहों का
    वो जो सिमटते होंगे उनमे वो तो मर जाते होंगे……………..रफत जी कोई मुकाबला नहीं है आज के परिपेक्ष्य में इस का ….दिल को किताब में लाकर उतारा है ….बहुत ही खुबसूरत जी

    दूसरी बात ग़ज़ल अच्छी है ..

    तीसरी आप की नज़म …एक एक शब्द आप के स्वभाव को खोलता हुआ है रफत जी ……इस सुन्दर पेसकस का आप को बहुत धन्यवाद और शुभ कामनाएं !!!!!!!!!!!!बाकि बातें कभी इस को फेस बुक पर भी कभी लाकर देकना होगा लोगों के बीच !!!!!!! !!!!!!!!!

  3. जनाब निर्मल जी बहुत शुक्रिया आपका .यह आलेख जो जोन साब पर बतोर शराधांजलि लिखा है , सराह कर खाकसार को इज्ज़त बख्शी.

  4. (उम्र गुजार दीजिए उम्र गुजार दी गयी) कहते कहते जॉन साहब का छलक पड़ना अविस्मरणीय क्षण उत्पन्न कर जाता है।

    इतनी शिद्दत से अपने अंदुरनी जज्बात को दर्शकों के हुजुम के सामने पेश करने वाले शायर विरले ही रहे हैं।

    (उसकी गली से उठ के में आन पड़ा था अपने घर
    एक गली की बात थी और गली गली गयी)

    वाह अनुप्रास अलंकार जैसा प्रयोग उर्दू शायरी में करना इसे और रोचक और प्रभावी बना देता है।

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