‘प. नेहरु’ और ब्रिटिश राज के बाद का भारत

Nehru

[दैनिक जनसत्ता ने ब्रिटिश राज के बाद भारत के प्रति नेहरु के योगदान और उनकी छवि को धूमिल किये जाने वाले राजनीतिक षड्यंत्र पर प्रकाश डालते हुए एक अच्छा लेख (

नेहरू को नकारने के निहितार्थ)

प्रकाशित किया है]

आजादी की लड़ाई पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है। नेहरू इस हमले का मुख्य निशाना हैं। नेहरू का नाम आते ही नेहरू परिवार की बात शुरू हो जाती है। देश की हर समस्या, हर मुसीबत का नाम नेहरू के खाते दर्ज किया जाता है। नेहरू को एक सत्ता-लोलुप की तरह पेश किया जाता है, जिन्होंने गांधी को किनारे लगा कर अंगरेजों से सत्ता हथिया ली। या फिर, गांधी की कृपा से वे गांधी के उत्तराधिकारी बने। अगर नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री न होते तो देश की सूरत अलग होती। क्योंकि वे निर्णय लेने में अक्षम थे। वे तो पटेल थे जिनकी लोहे जैसी इच्छाशक्ति ने इस देश को बचा लिया। या फिर इस देश में नेहरू की इकलौती विरासत वंशवाद की नींव रखना था। यह और इस तरह के जाने कितने आरोप एक सांस में नेहरू पर मढ़ दिए जाते हैं। दरअसल, नेहरू कौन थे यह बात आम आदमी की याददाश्त से गायब हो चुकी है। नई पीढ़ी, जिसका सबसे बड़ा स्कूल इंटरनेट है, यू-ट्यूब वाले नेहरू को जानती है। वे नेहरू जो तथाकथित रूप से आला दर्जे के शौकीन आदमी थे।

नेहरू के दुश्मन एक नहीं, अनेक हैं। सांप्रदायिक एजेंडे में वे गांधी की तरह एक रोड़ा हैं। साम्राज्यवादियों और नव-साम्राज्यवादियों के लिए आजादी की पूरी लड़ाई एक झूठ और दिखावा थी, जो कि ब्रिटिश राज की भलाई देखने के बजाय उसकी जड़ खोदने का काम करती थी। सबाल्टर्न इतिहासकारों के हिसाब से नेहरू उस जमात के नेता थे जो अभिजात थी, जिसका नीचे से यानी जनता के भले से कोई लेना-देना नहीं था। रूढ़ मार्क्सवादी इतिहास-लेखन नेहरू को उस बूर्जुवा नेतृत्व का प्रतिनिधि मानता रहा जिसने समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता के बावजूद क्रांति की ऐतिहासिक संभावनाओं को कमजोर किया।

गांधी की हत्या के बाद गांधीवादियों ने नेहरू से यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि वे भी गांधी के अंतिम दिनों की तरह सत्ता से दूर रहेंगे। वे उस गांधी को भूल गए जो अपने हृदय के हर कोने से खांटी राजनीतिक थे। समाजवादियों की जमात ने कभी नेहरू के नेतृत्व में ही समाजवाद का ककहरा सीखा था। आजादी के बाद वही समाजवादी नेहरू की जड़ें खोदने पर आमादा हो गए। पटेल 1950 में स्वर्ग सिधार गए। गांधी की पहले ही 1948 में हत्या हो चुकी थी। बाकी बचे मौलाना आजाद, जो नेहरू के मुश्किल दिनों के साथी थे।

यानी आजादी के पहले और आजादी के बाद दो अलग दौर थे। पहले दौर में गांधी के व्यापक नेतृत्व में एक भरी-पूरी कांग्रेस थी, जिसमें नेहरू गांधी के बाद बिना शक नंबर दो थे। लेकिन आजादी के बाद और गांधी की हत्या के बाद सिर्फ नेहरू थे। आजादी और विभाजन के द्वैध को भुगत कर निकला देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा था। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शोषण ने देश को अंदर तक खोखला कर दिया था। इस एक तथ्य से ही हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है- 1947 में भारत में औसत आयु मात्र बत्तीस वर्ष थी।

ऐसे कठिन दौर में नेहरू ने मोर्चा संभाला। उन्होंने दिन-रात काम किया। अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सिर्फ चार-चार घंटे सोकर बिताया। जिन्हें नेहरू की मेहनत का अंदाजा लगाना हो वे गजानन माधव मुक्तिबोध का निबंध ‘दून घाटी में नेहरू’ पढ़ लें। किसी को आजादी के पहले के नेहरू से एतराज नहीं है। सबकी दिक्कत आजादी के बाद के नेहरू से है। इसलिए यहां बात सिर्फ इसी नेहरू की होनी है। उस नेहरू की, जिस पर आजादी की लड़ाई की समूची विरासत को आजाद भारत में अकेले आगे बढ़ाना था। जिसके हिस्से ‘सत्ता’ का ‘अमृत’ आया था; औपनिवेशिक शोषण और सांप्रदायिकता से टूटे-बिखरे मुल्क में ‘विष’ भी इसी नेहरू के हिस्से आया।

सबसे पहली बात रियासतों के एकीकरण की। इस काम में सरदार पटेल और वीपी मेनन की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। लेकिन भारत का एकीकरण आजादी की लड़ाई का मूल विचार था। जिस देश को पिछले सौ सालों में जोड़ा-बटोरा गया था, उसे सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में टूटने नहीं देना था। यह काम आजाद भारत की सरकार के जिम्मे आया, जिसे पटेल ने गृहमंत्री होने के नाते बखूबी अंजाम दिया। लेकिन भारत को सैकड़ों हिस्सों में तोड़ने वाला मसविदा ब्रिटेन भेजने के पहले माउंटबेटन ने नेहरू को दिखाया। माउंटबेटन के हिसाब से ब्रिटेन को क्राउन की सर्वोच्चता वापस ले लेनी चाहिए। यानी जितने भी राज्यों को समय-समय पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता स्वीकारनी पड़ी थी, इस व्यवस्था से सब स्वतंत्र हो जाते।

नेहरू यह मसविदा देखने के बाद पूरी रात सो नहीं सके। उन्होंने माउंटबेटन के नाम एक सख्त चिट्ठी लिखी। तड़के वे उनसे मिलने पहुंच गए। नेहरू की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे मजबूरन माउंटबेटन को नया मसविदा बनाना पड़ा, जिसे तीन जून योजना के नाम से जाना जाता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान दो राज्य इकाइयों की व्यवस्था दी गई। ध्यान रहे पटेल जिस सरकार में गृहमंत्री थे, नेहरू उसके प्रधानमंत्री थे। इस तरह, यह निश्चित रूप से पटेल का नहीं, पटेल और नेहरू का मिलाजुला काम था।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की चुनौती थी। देश सांप्रदायिक वहशीपन के सबसे बुरे दौर से गुजर चुका था। लोगों ने गांधी के जिंदा रहते उनकी बात अनसुनी कर दी थी। जिन्ना ने अपना दार-उल-इस्लाम बना लिया था; मुसलमानों का ‘अपना’ मुल्क पाकिस्तान वजूद में आ गया था। भीषण रक्तपात, विस्थापन के साथ हिंदू और सिख शरणार्थियों के जगह-जगह पहुंचने के साथ ही ‘हिंदू’ सांप्रदायिक दबाव बहुत जबर्दस्त हो गया था। हिंदुस्तान का पहला आम चुनाव सामने था। यह ऐसा चुनाव था जो सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता के मुद््दे पर लड़ा जा रहा था। नेहरू ने ‘जन भावनाओं’ की मुंहदेखी नहीं की। उन्होंने वह कहा जो बहुतों के लिए अलोकप्रिय था। उनमें अलोकप्रिय होने का साहस था।

उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के हक में आवाज बुलंद की और जनता को अंधेरे समय में रोशनी दिखाई। जनता ने अपने नेता को खुद से ज्यादा समझदार माना। इस चुनाव में नेहरू ने तकरीबन पूरा देश नाप लिया। तकरीबन चालीस हजार किलोमीटर का सफर तय किया। हर दस में एक भारतीय को सीधा संबोधित किया। यह वक्त हिंदू सांप्रदायिकता के उभार के लिए सबसे मुफीद था। लेकिन इसी समय इसे मुंह की खानी पड़ी। यह चुनाव एक तरह से धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत संग्रह सिद्ध हुया। नेहरू पर एक और बड़ा जिम्मा था। आजादी की लड़ाई के दौरान बोए गए लोकतांत्रिक पौधे की जड़ें मजबूत करने का। नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा की एक रोचक कहानी है। नेहरू हर तरफ अपनी जय-जयकार सुन कर ऊब चुके थे। उनको लगता था कि बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं।

नवंबर 1957 में नेहरू ने मॉडर्न टाइम्स में अपने ही खिलाफ एक जबर्दस्त लेख लिखा। चाणक्य के नाम से ‘द प्रेसिडेंट’ नाम के इस लेख में उन्होंने पाठकों को नेहरू के तानाशाही रवैये के खिलाफ चेताया। उन्होंने कहा कि नेहरू को इतना मजबूत न होने दो कि वे सीजर हो जाएं।

मशहूर कार्टूनिस्ट शंकर अपने कार्टूनों में नेहरू की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। नेहरू ने उनसे अपील की कि उन्हें बख्शा न जाए। फिर शंकर ने नेहरू पर जो कार्टून बनाए उनका संग्रह इसी नाम से प्रकाशित हुया- ‘डोंट स्पेयर मी, शंकर’। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लंबे समय तक प्रतिबंध को नेहरू ने ठीक नहीं माना। उनका मानना था कि आजाद भारत में इन तरीकों का प्रयोग जितना कम किया जाए, उतना अच्छा। नेहरू को इस बात की बड़ी फिक्र रहती थी कि लोहिया जीत कर संसद में जरूर पहुंचें, जो हर मौके पर नेहरू पर जबर्दस्त हमला बोलते थे।

उनकी आर्थिक योजना, जिसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं, ने देश को एक मजबूत आधार दिया। जिस वक्त भारत आजाद हुया, उसे नब्बे प्रतिशत मशीनरी बाहर से आयात करनी होती थी। जर्मनी को छोड़ कर हर जगह से तकनीक का आयात किया गया। महालनोबिस योजना का मुख्य उद््देश्य भारी उद्योगों को बढ़ावा देना था। ठहरी हुई खेती के साथ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करना एक बड़ा सवाल था। नेहरू ने लोकतांत्रिक दायरों में रह कर भूमि सुधार किए। डेढ़ सौ साल पुरानी जमींदारी व्यवस्था को खत्म करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी।

गरीबों को ऊपर उठाने के लिए नेहरू और उनके योजनाकारों ने सामुदायिक व्यवस्था का सहारा लिया। नेहरू ने गांवों में ग्राम-सेवकों की पूरी फौज भेज दी। नेहरू उद्योग और कृषि में कोई फर्क नहीं करते थे। उनके मुताबिक दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हुई चीजें थीं। उनको विकास का महत्त्व पता था। वे मानते थे कि गरीबी का बंटवारा नहीं किया जा सकता, सबमें बांटने के लिए उत्पादन जरूरी है। लेकिन उसके लिए वे खेती से समझौता नहीं करते थे।

उन्होंने देश में हरित क्रांति की परिस्थितियां तैयार कीं। देश के पंद्रह जिलों में एक पाइलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। उनकी मृत्यु के बाद शास्त्रीजी ने हरित क्रांति को साकार कर दिया। डेनियल थॉर्नर कहते थे कि आजादी के बाद जितना काम पहले इक्कीस सालों में किया गया, उतना दो सौ साल किए गए काम के बराबर है। दुनिया के लगभग सारे अर्थशास्त्री- जिन्होंने नेहरू की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया- नेहरू की रणनीति को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

नेहरू के विजन में गरीब लोकतंत्र की कसौटी था। उन्होंने तय किया कि गरीबों के हित परिदृश्य से बाहर नहीं फेंके जा सकते। उन्होंने गरीबों के प्रति पक्षधरता का वह बुनियादी सोच पैदा किया कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दबाव के बाजवूद गरीब किसान-मजदूर अब भी बहस का सामान्य मुद्दा बने हुए हैं। नेहरू मानते थे, ‘लोकतंत्र समाजवाद के बिना अधूरा है और समाजवाद लोकतंत्र के बिना’।

बात नेहरू के महिमामंडन की नहीं है। नेहरू की विफलताएं भी गिनाई जा सकती हैं। लेकिन हर नेता अपने समय के संदर्भ में निर्णय लेता है, नीति बनाता है। जो कमियां-कमजोरियां आज हमें दिखाई दे रही हैं, वे नेहरू को नहीं दिख रही थीं। क्योंकि नेहरू अपने युग में बैठ पर दुनिया देख रहे थे। उस पर से तमाम भयानक चुनौतियों के बीच।
हमारे बीच एक बड़ा दंगा, एक बड़ी आपदा, सब-कुछ उथल-पुथल कर देती है। नेहरू ऐसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह लड़ रहे थे, जहां विफलता ही नियति थी। एक बार गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था- हमने अपनी विफलताओं से ही सही, देश की सेवा तो की।

मोहित सेन ने लिखा है कि तिब्बत सीमा विवाद के वक्त चीन ने नेहरू का कद छोटा करने के लिए उनका चरित्र हनन करना शुरू किया था। चीनी नेतृत्व (इसमें माओ शामिल नहीं थे) का मानना था कि नेहरू से टकराने के लिए, नेहरू का कद घटाना जरूरी है। यही बात सांप्रदायिक दलों पर लागू होती है। क्योंकि नेहरू उनके लिए खतरनाक हैं।

(सौरभ वाजपेयी)  – जनसत्ता 6 जून 2015

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