Archive for मई 6th, 2014

मई 6, 2014

अरविन्द केजरीवाल‬: जिला अधिकारी@वाराणसी के नाम पत्र

सेवा में,AK@Varanasi
जिला अधिकारी,
वाराणसी, उ0प्र0

महोदय,
आपका 2 मई 2014 का लिखा पत्र मिला। (पत्र संख्या 4542/एस.जी.-नगर-2014) इस पत्र के साथ आपने पुलिस उपाधीक्षक (प्रज्ञान), काशी, की 28 अप्रैल 2014 की रिर्पोर्ट संलग्न की है। उनकी इस रिर्पार्ट पर मुझे घोर आपत्ति है।

उन्होंने अपनी रिर्पार्ट में लिखा है कि मैं ‘‘हिन्दु बाहुल्य तथा भाजपा समर्थित स्थानों’’ पर श्री नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ बोल रहा हूं, जिससे पुलिस को परेशानी हो रही है। तो क्या आपके पुलिस उपाधीक्षक चाहते हैं कि मैं श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलना बंद कर दूं? काशी का तो अधिकतर इलाका हिन्दू बाहुल्य है। तो क्या पूरे काशी में श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलना बंद कर देना चाहिए?

जो लोग हिंसा कर रहे हैं, वो लोग हिन्दू नहीं बल्कि भाजपा के गुण्डे हैं। आपके उपाधीक्षक का यह मान लेना कि सभी हिन्दू नरेन्द्र मोदी जी समर्थक हैं- यह सरासर गलत है। आपके उपाधीक्षक का यह मान लेना कि सभी हिन्दू श्री नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ कोई भी बात सुनने पर हिंसा करने लगेंगे- यह बहुत ही खतरनाक है।

हिन्दू धर्म के लोग दुनिया के सबसे शांतिप्रिय लोग हैं। कोई भी हिन्दू हिंसा नहीं चाहता। बल्कि हिन्दू धर्म ‘वसुदैव कुटुम्बकम’ सिखाता है।
28 अप्रैल 2014 की आपके पुलिस उपाधीक्षक की रिपोर्ट साफ-साफ दर्शाती है कि आपके पुलिस उपाधीक्षक घोर नरेन्द्र मोदी समर्थक हैं, भाजपा समर्थक हैं और हिन्दू धर्म के बारे में बहुत ही गलत विचार रखते हैं।

इसी रिपोर्ट में आपके उपाधीक्षक ने लिखा है- ‘‘श्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने प्रचार-प्रसार के दौरान ऐसे हथकन्डे अपनाए जा रहे हैं, जिससे मीडिया का ध्यान आकर्षण किया जा सके व मीडिया फोकस इन पर बना रहे।’’ आपके पुलिस उपाधीक्षक की टिप्पणी पर मुझे घोर आपत्ति है। क्या अब आपके पुलिस उपाधीक्षक मुझे सिखायेगें कि मुझे चुनाव प्रसार कैसे करना है?

मैं बिना सुरक्षा के जनता के बीच घुस जाता हूं, जनता से हाथ मिलाता हूं, जनता को गले लगाता हूं, जनता के प्रश्नों के जवाब देता हूं। जनता में से कोई भी मुझे घर बुलाता है और यदि मेरे पास समय हो तो मैं उसके घर भी चला जाता हूं। मेरे इसी व्यवहार को आपके पुलिस उपाधीक्षक ‘‘हथकंडा’’ कह रहे हैं। आपको शायद अपने पुलिस उपाधीक्षक को ‘जनतंत्र’ की परिभाषा बतानी होगी कि जनतंत्र हेलिकौपटर और एअर कंडिशन्ड कमरों से नहीं चलता। जनतंत्र गली-मोहल्लों, सड़कों और गांव-गांव में घूमने से चलता है।

AK on Banaras electionमेरा संवाद सीधे काशी की जनता से है। आपकी पुलिस यदि मेरे और काशी की जनता के बीच में आने की कोशिश करेगी तो मैं ऐसी सारी कोशिशों को नाकाम कर दूंगा। आपकी नज़र में यह ‘हथकंडा’ हो सकता है, मेरी नज़र में यही ‘जनतंत्र’ है।

मैंने कभी आपसे अपने लिए सुरक्षा नहीं मांगी। इस पत्र के ज़रिए मैं आपसे निवेदन करता हूं कि आपने अपनी मर्जी से मेरी सुरक्षा में जो पुलिस कर्मी लगाए हैं, उन्हें तुरन्त वापिस ले लिया जाए। इन सभी पुलिस कर्मियों को काशी की जनता की सुरक्षा के लिए लगाया जाए। मुझे सुरक्षा नहीं चाहिए। काशी की जनता मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा है। काशी के लोग मुझे बहुत प्यार करने लगे हैं। काशी में मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बाबा विश्वनाथ जी का मुझ पर आशीर्वाद है, फिर किस बात का डर।

आप काशी की जनता की भाजपा के गुण्डों से सुरक्षा कीजिए, मेरी सुरक्षा की चिन्ता छोड़ दीजिए।

धन्यवाद्,
अरविंद केजरीवाल
राष्ट्रीय संयोजक, आम आदमी पार्टी

ak in kashi

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मई 6, 2014

लोकसभा 2014, सबसे महत्वपूर्ण चुनाव नहीं : मार्क टली (BBC)

Mark Tullyअतिशयोक्ति इस आम चुुनाव की पहचान हो गई है। यह सही है कि ये सबसे बड़े और सबसे लंबे चुनाव हैं। बाद वाली विशेषता पर चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए। कुछ मतदाता तो पांच हफ्तों तक चलने वाले सारे चुनाव प्रचार, सारे मीडिया कवरेज से गुजर रहे हैं जबकि कुछ अन्य तो यह सब शुरू होने के पहले ही वोट डालने पहुंच गए। ऐसे में क्या यह कहा जा सकता है कि पूरा चुनाव समान स्तर पर लड़ा जा रहा है। अतिशयोक्तियां तो देखिए- ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हैं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अंत होने वाला है। नेहरू-गांधी परिवार का प्रभाव खत्म हो रहा है। मोदी की लहर-यह सब गलतफहमी पैदा करने वाले और खतरनाक दावे हैं।
जरा सबसे महत्वपूर्ण चुनाव के दावे को देखेंं। सारे चुनाव ही महत्वपूर्ण होते हैं। इतिहास वह नहीं होता, जिसके हम आज साक्षी हैं यदि पूर्व में हुए किसी भी चुनाव के नतीजे एकदम अलग होते। इसे भुला दिया जाता है कि इंदिरा गांधी ने जब 1977 में चुनाव की घोषणा की थी तो आपातकाल उठा नहीं लिया था। मुझे लगता है कि यदि वे चुनाव जीत जातीं तो अपनी जीत को आपातकाल की लोकतांत्रिक पुष्टि के रूप में लेतीं और इसे जारी रहने देतीं। क्या इस चुनाव के नतीजे इंदिरा गांधी की हार से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
यह कहना कि ये चुनाव सबसे महत्वपूर्ण हैं, भाजपा के इस दावे को विश्वसनीयता प्रदान करता है कि देश को नया मोड़ देने का मौका है। पुरानी, भ्रष्ट, गैरजवाबदार सरकार, जिसने देश को अभी भी ठप कर रखा है, उसका अंत होगा। तेज रफ्तार विकास के युग की शुरुआत होगी, जिसका लाभ समाज के सभी तबकों को मिलेगा। भाजपा कहती है कि मोदी ही वे व्यक्ति हैं, जिनका गुजरात में रिकॉर्ड बताता है कि वे यह चमत्कार करके दिखा सकते हैं। लेकिन वे इसे कैसे हासिल करेंगे? जब भाजपा अलग पार्टी होने के नारे (पार्टी विद अ डिफरेंस) पर पहली बार उत्तरप्रदेश की सत्ता में आई थी तो मैंने लालकृष्ण आडवाणी से कहा था, ‘आप इस दावे पर पछताएंगे।’ वे अवाक रह गए। मैंने उनसे कहा, ‘आपको उसी भ्रष्ट नौकरशाही, पुलिस बल और राजनीतिक व्यवस्था के साथ काम करना पड़ेगा, जिनके साथ अन्य लोगों ने काम किया है। इसलिए इनके कारण लोगों को जल्दी ही पता चल जाएगा कि भाजपा भी अन्य दलों की तरह ही है।’ यही हुआ भी। मोदी भी खुद को ऐसी स्थिति में पा सकते हैं। अन्य नेताओं जैसा नेता जो अपने वादे पूरे करने में नाकाम रहा। इससे वे तभी बच सकते हैं जब वे ऐसे पहले प्रधानमंत्री बनकर दिखाएं, जिसमें न्यायपालिका सहित देश की सारी संस्थाओं में आमूल-चूल बदलाव लाने का साहस हो। गुजरात जैसे किसी एक राज्य की सरकार थोड़ी बहुत कार्यक्षम बनाकर दिखाने की तुलना में यह बहुत जटिल समस्या है।
जनमत संग्रहों और मीडिया ने मोदी लहर का आभास निर्मित कर दिया है। मैंने भारत में दो चुनावी लहरों को कवर किया है और उनके बाद से कोई लहर दिखाई नहीं दी है। मुझे खासतौर पर 1977 के चुनाव की रिपोर्टिंग याद आती है। तब मैं जहां भी जाता एक नारा हमेशा सुनाई देता, ‘इंदिरा, संजय और बंसीलाल नसबंदी के तीन दलाल।Ó मुझे उस लहर पर कोई शक नहीं था, जिसने बाद में इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। फिर 1984 के चुनाव जो भाजपा के लिए शोक-सभा ही थे। स्पष्ट था कि राजीव गांधी को सहानुभूति लहर का फायदा मिल रहा था। मैंने हाल ही में उत्तरप्रदेश में तीन दिन बिताए हैं और मैं कह सकता हूं कि मुझे बाराबंकी, उन्नाव, फैजाबाद और मोहनलालगंज के मतदाता किसी लहर में बहते नजर नहीं आए। परंपरागत तत्व ही वोटर के दिमाग में सबसे ऊपर नजर आए- जाति, प्रत्याशी और समुदाय। बाराबंकी को ही लीजिए। हालांकि, ज्यादातर विश्लेषकों ने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को खारिज कर दिया है पर बाराबंकी में मैंने पाया कि वहां कांग्रेस के आरएल पूनिया द्वारा किए विकास कार्यों की तारीफ हो रही है। आम राय है चुनाव में उनके लिए अच्छे अवसर हैं।
उन्नाव में चाय की एक दुकान का मालिक स्थानीय भाजपा नेता था। उसने कहा कि पार्टी प्रत्याशी साक्षी महाराज ही माहौल खराब कर रहे हैं। वे कहते फिर रहे हैं, ‘मैं क्यों चुनाव प्रचार करूं? मैं तो साधु हूं। यह तो मोदी का चुनाव है।’ जब मैंने भाजपा के इस नेता से पूछा कि क्या मोदी की कोई लहर है तो उसने जवाब दिया, ‘मोदी लहर है तो सही पर समस्या जाति की है।’
धर्मनिरपेक्षता के अंत के दावे की पुष्टि सत्ता में भाजपा के पुराने रिकॉर्ड से नहीं होती। न इसका औचित्य प्रचार के दौरान मोदी द्वारा कही किसी बात या तोगडिय़ा जैसे अतिवादियों को उनके द्वारा लगाई फटकार से साबित होता है। फिर ऐसा दावा करना भारत की संस्थाओं का अपमान है। क्या सुप्रीम कोर्ट, मीडिया, सिविल सेवाएं धर्मनिरपेक्ष संविधान के उलटे जाने को चुपचाप देखते रहेंगे? यह सही है कि आपातकाल के दौरान उन्होंने यही किया था, लेकिन अब वे कहीं ज्यादा शक्तिशाली और खुले दिमाग वाले हैं। कांग्रेस के इस दावे से कि मोदी की जीत से भारत बिखर जाएगा, अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुस्लिमों में खतरे की घंटी बज जाती है। यह मतदान को प्रभावित करने की जानबूझकर की गई कोशिश है। इसके साथ ही धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा फिर सबसे ऊपर आ जाता है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने मुझसे चर्चा में माना कि धर्मनिरपेक्षता एक ‘पुराना और घिस’ चुका मुद्दा है।
फिर यह दावा कि इस चुनाव के बाद नेहरू-गांधी परिवार का राजनीतिक अवसान हो जाएगा। लखनऊ में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने मुझसे चर्चा में स्वीकारा कि परिदृश्य काफी निराशाजनक है, लेकिन उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘हम चिंतित नहीं हैं। हम पहले भी ऐसी स्थिति का सामना कर चुके हैं और हम हमेशा इससे उबर आए हैं।’ नेहरू-गांधी परिवार को पहले भी खारिज किया जा चुका है, लेकिन ये चुनाव परिवार की उस अत्यंत महत्वपूर्ण स्थिति को दर्शाते हैं जो उसे भारतीय राजनीति में अब भी हासिल है। यदि कांग्रेस का प्रदर्शन जनमत संग्रहों में उसके लिए बताए सबसे खराब नतीजों जैसा भी रहा तो भी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इस परिवार का राजनीतिक अवसान हो जाएगा। पार्टी को छोडऩे वालों का वही हश्र होगा, जो इंदिरा गांधी को छोड़कर जाने वालों का हुआ था। इसलिए जो सोनिया, राहुल और अब मुझे प्रियंका का नाम भी जोडऩा पड़ेगा, को खारिज कर रहे हैं वे मतदाताओं को धोखा दे रहे हैं।
ये सबसे बदजुबानी वाले और सबसे आवेशपूर्ण चुनाव हो सकते हैं। निश्चित ही ये सबसे खर्चीले चुनाव तो हैं ही। सोशल मीडिया और मतदाताओं को आने वाले मोदी के फोन कॉल और मैसेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधन पहले की तुलना में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। मगर मुझे भरोसा है कि जब चुनावी धूमधाम की धूल बैठ जाएगी तो जाहिर हो जाएगा कि अतिशयोक्ति फैलाने वालों ने मतदाताओं को धोखा दिया है। यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव भी नहीं थे।
मार्क टली
भारत में बीबीसी के पूर्व ब्यूरो चीफ
marktullydelhi@gmail.com

 

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