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मार्च 16, 2016

जावेद अख्तर : राज्यसभा में विदाई भाषण !

मशहूर पटकथा एवं संवाद लेखक और गीतकार जावेद अख्तर शब्दों के ही नहीं वरन विचारों और हाजिरजवाबी के भी धनी हैं, उनकी बातें रोचक और सही समय पर मुँह से निकलती हैं और इसलिए सुनने वालों को आकर्षित करती हैं| बोलने में मिले अवसर का लाभ बहुत लोग नहीं उठा पाते. जावेद अख्तर अक्सर ही ऐसे अवसरों को हाथ से नहीं जाने देते जब वे वह कह सकते हैं जो वे कहना चाहते हैं और जो सही भी है|

छह साल राज्यसभा के सदस्य रहने के बाद  उच्च सदन से अपनी विदाई के अवसर पर उन्होंने वे बातें बोलीं जो वर्तमान के भारत के लिए बेहद महतवपूर्ण हैं और उन्होंने लगभग वे सभी चेतावनियाँ अपने भाषण में कहीं जिनसे भारत को सचेत रहने की जरुरत है| जावेद अख्तर ने राज्यसभा में अपने अंतिम भाषण में न केवल एक सांसद बल्कि एक नागरिक के कर्तव्यों का निर्वाह किया| ऐसे सचेत और प्रासंगिक भाषण के लिए जावेद अख्तर साधुवाद के पात्र हैं|

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मई 6, 2014

लोकसभा 2014, सबसे महत्वपूर्ण चुनाव नहीं : मार्क टली (BBC)

Mark Tullyअतिशयोक्ति इस आम चुुनाव की पहचान हो गई है। यह सही है कि ये सबसे बड़े और सबसे लंबे चुनाव हैं। बाद वाली विशेषता पर चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए। कुछ मतदाता तो पांच हफ्तों तक चलने वाले सारे चुनाव प्रचार, सारे मीडिया कवरेज से गुजर रहे हैं जबकि कुछ अन्य तो यह सब शुरू होने के पहले ही वोट डालने पहुंच गए। ऐसे में क्या यह कहा जा सकता है कि पूरा चुनाव समान स्तर पर लड़ा जा रहा है। अतिशयोक्तियां तो देखिए- ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हैं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अंत होने वाला है। नेहरू-गांधी परिवार का प्रभाव खत्म हो रहा है। मोदी की लहर-यह सब गलतफहमी पैदा करने वाले और खतरनाक दावे हैं।
जरा सबसे महत्वपूर्ण चुनाव के दावे को देखेंं। सारे चुनाव ही महत्वपूर्ण होते हैं। इतिहास वह नहीं होता, जिसके हम आज साक्षी हैं यदि पूर्व में हुए किसी भी चुनाव के नतीजे एकदम अलग होते। इसे भुला दिया जाता है कि इंदिरा गांधी ने जब 1977 में चुनाव की घोषणा की थी तो आपातकाल उठा नहीं लिया था। मुझे लगता है कि यदि वे चुनाव जीत जातीं तो अपनी जीत को आपातकाल की लोकतांत्रिक पुष्टि के रूप में लेतीं और इसे जारी रहने देतीं। क्या इस चुनाव के नतीजे इंदिरा गांधी की हार से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
यह कहना कि ये चुनाव सबसे महत्वपूर्ण हैं, भाजपा के इस दावे को विश्वसनीयता प्रदान करता है कि देश को नया मोड़ देने का मौका है। पुरानी, भ्रष्ट, गैरजवाबदार सरकार, जिसने देश को अभी भी ठप कर रखा है, उसका अंत होगा। तेज रफ्तार विकास के युग की शुरुआत होगी, जिसका लाभ समाज के सभी तबकों को मिलेगा। भाजपा कहती है कि मोदी ही वे व्यक्ति हैं, जिनका गुजरात में रिकॉर्ड बताता है कि वे यह चमत्कार करके दिखा सकते हैं। लेकिन वे इसे कैसे हासिल करेंगे? जब भाजपा अलग पार्टी होने के नारे (पार्टी विद अ डिफरेंस) पर पहली बार उत्तरप्रदेश की सत्ता में आई थी तो मैंने लालकृष्ण आडवाणी से कहा था, ‘आप इस दावे पर पछताएंगे।’ वे अवाक रह गए। मैंने उनसे कहा, ‘आपको उसी भ्रष्ट नौकरशाही, पुलिस बल और राजनीतिक व्यवस्था के साथ काम करना पड़ेगा, जिनके साथ अन्य लोगों ने काम किया है। इसलिए इनके कारण लोगों को जल्दी ही पता चल जाएगा कि भाजपा भी अन्य दलों की तरह ही है।’ यही हुआ भी। मोदी भी खुद को ऐसी स्थिति में पा सकते हैं। अन्य नेताओं जैसा नेता जो अपने वादे पूरे करने में नाकाम रहा। इससे वे तभी बच सकते हैं जब वे ऐसे पहले प्रधानमंत्री बनकर दिखाएं, जिसमें न्यायपालिका सहित देश की सारी संस्थाओं में आमूल-चूल बदलाव लाने का साहस हो। गुजरात जैसे किसी एक राज्य की सरकार थोड़ी बहुत कार्यक्षम बनाकर दिखाने की तुलना में यह बहुत जटिल समस्या है।
जनमत संग्रहों और मीडिया ने मोदी लहर का आभास निर्मित कर दिया है। मैंने भारत में दो चुनावी लहरों को कवर किया है और उनके बाद से कोई लहर दिखाई नहीं दी है। मुझे खासतौर पर 1977 के चुनाव की रिपोर्टिंग याद आती है। तब मैं जहां भी जाता एक नारा हमेशा सुनाई देता, ‘इंदिरा, संजय और बंसीलाल नसबंदी के तीन दलाल।Ó मुझे उस लहर पर कोई शक नहीं था, जिसने बाद में इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। फिर 1984 के चुनाव जो भाजपा के लिए शोक-सभा ही थे। स्पष्ट था कि राजीव गांधी को सहानुभूति लहर का फायदा मिल रहा था। मैंने हाल ही में उत्तरप्रदेश में तीन दिन बिताए हैं और मैं कह सकता हूं कि मुझे बाराबंकी, उन्नाव, फैजाबाद और मोहनलालगंज के मतदाता किसी लहर में बहते नजर नहीं आए। परंपरागत तत्व ही वोटर के दिमाग में सबसे ऊपर नजर आए- जाति, प्रत्याशी और समुदाय। बाराबंकी को ही लीजिए। हालांकि, ज्यादातर विश्लेषकों ने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को खारिज कर दिया है पर बाराबंकी में मैंने पाया कि वहां कांग्रेस के आरएल पूनिया द्वारा किए विकास कार्यों की तारीफ हो रही है। आम राय है चुनाव में उनके लिए अच्छे अवसर हैं।
उन्नाव में चाय की एक दुकान का मालिक स्थानीय भाजपा नेता था। उसने कहा कि पार्टी प्रत्याशी साक्षी महाराज ही माहौल खराब कर रहे हैं। वे कहते फिर रहे हैं, ‘मैं क्यों चुनाव प्रचार करूं? मैं तो साधु हूं। यह तो मोदी का चुनाव है।’ जब मैंने भाजपा के इस नेता से पूछा कि क्या मोदी की कोई लहर है तो उसने जवाब दिया, ‘मोदी लहर है तो सही पर समस्या जाति की है।’
धर्मनिरपेक्षता के अंत के दावे की पुष्टि सत्ता में भाजपा के पुराने रिकॉर्ड से नहीं होती। न इसका औचित्य प्रचार के दौरान मोदी द्वारा कही किसी बात या तोगडिय़ा जैसे अतिवादियों को उनके द्वारा लगाई फटकार से साबित होता है। फिर ऐसा दावा करना भारत की संस्थाओं का अपमान है। क्या सुप्रीम कोर्ट, मीडिया, सिविल सेवाएं धर्मनिरपेक्ष संविधान के उलटे जाने को चुपचाप देखते रहेंगे? यह सही है कि आपातकाल के दौरान उन्होंने यही किया था, लेकिन अब वे कहीं ज्यादा शक्तिशाली और खुले दिमाग वाले हैं। कांग्रेस के इस दावे से कि मोदी की जीत से भारत बिखर जाएगा, अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुस्लिमों में खतरे की घंटी बज जाती है। यह मतदान को प्रभावित करने की जानबूझकर की गई कोशिश है। इसके साथ ही धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा फिर सबसे ऊपर आ जाता है। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने मुझसे चर्चा में माना कि धर्मनिरपेक्षता एक ‘पुराना और घिस’ चुका मुद्दा है।
फिर यह दावा कि इस चुनाव के बाद नेहरू-गांधी परिवार का राजनीतिक अवसान हो जाएगा। लखनऊ में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने मुझसे चर्चा में स्वीकारा कि परिदृश्य काफी निराशाजनक है, लेकिन उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘हम चिंतित नहीं हैं। हम पहले भी ऐसी स्थिति का सामना कर चुके हैं और हम हमेशा इससे उबर आए हैं।’ नेहरू-गांधी परिवार को पहले भी खारिज किया जा चुका है, लेकिन ये चुनाव परिवार की उस अत्यंत महत्वपूर्ण स्थिति को दर्शाते हैं जो उसे भारतीय राजनीति में अब भी हासिल है। यदि कांग्रेस का प्रदर्शन जनमत संग्रहों में उसके लिए बताए सबसे खराब नतीजों जैसा भी रहा तो भी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इस परिवार का राजनीतिक अवसान हो जाएगा। पार्टी को छोडऩे वालों का वही हश्र होगा, जो इंदिरा गांधी को छोड़कर जाने वालों का हुआ था। इसलिए जो सोनिया, राहुल और अब मुझे प्रियंका का नाम भी जोडऩा पड़ेगा, को खारिज कर रहे हैं वे मतदाताओं को धोखा दे रहे हैं।
ये सबसे बदजुबानी वाले और सबसे आवेशपूर्ण चुनाव हो सकते हैं। निश्चित ही ये सबसे खर्चीले चुनाव तो हैं ही। सोशल मीडिया और मतदाताओं को आने वाले मोदी के फोन कॉल और मैसेज जैसे इलेक्ट्रॉनिक साधन पहले की तुलना में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। मगर मुझे भरोसा है कि जब चुनावी धूमधाम की धूल बैठ जाएगी तो जाहिर हो जाएगा कि अतिशयोक्ति फैलाने वालों ने मतदाताओं को धोखा दिया है। यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि ये सबसे महत्वपूर्ण चुनाव भी नहीं थे।
मार्क टली
भारत में बीबीसी के पूर्व ब्यूरो चीफ
marktullydelhi@gmail.com

 

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