Posts tagged ‘Zulf’

जनवरी 8, 2015

नये गीत लाता रहा…साहिर लुधियानवी

साथियों ! मैंने बरसों तुम्हारे लिए
चाँद तारों बहारों के सपने बुने
हुस्न और इश्क का गीत गाता रहा
आरजुओं के ऐवां सजाता रहा
मैं तुम्हारा मुगन्नी तुम्हारे लिए
जब भी आया नए गीत लाता रहा

आज लेकिन मेरे दामने चाक में
गर्दे राहे सफ़र के सिवा कुछ नहीं
मेरे बरबत के सीने में नगमों का दम घुट गया है
तानें चीखों के अंबार में दब गयी हैं
और गीतों के सुर हिचकियाँ बन गए हैं

मैं तुम्हारा मुगन्नी हूँ, नगमा नहीं हूँ
और नगमे की तखलीक का साज़ो सामां
साथियों आज तुमने भसम कर दिया है
और मैं अपना, टूटा हुआ साज़ थामे
सर्द लाशों के अम्बार को तक रहा हूँ

मेरे चारों तरफ मौत की वह्शतें नाचती हैं
और इंसान की हैवानियत जाग उठी है
बरबरियत के खूंख्वार अफरीत
अपने नापाक जबड़ों को खोले हुए
खून पीपी के गुर्रा रहे हैं

बच्चे माओं की गोदों में सहमे हुए हैं
इस्मतें सर बरहना परेशान हैं
हर तरफ शोरे आहो बुका है
और मैं इस तबाही के तूफ़ान में
आग और खून के हैजान में
सरनिगूं और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों पर
अपने नगमों की झोली पसारे
दर ब दर फिर रहा हूँ

मुझको अमन-ओ-तहजीब की भीख दो
मेरे गीतों की लैय, मेरे सुर मेरे नै
मेरे मजरूह होंठों को फिर सौंप दो

साथियों! मैंने बरसों तुम्हारे लिए
इंक़लाब औ बगावत के नगमे अलापे
अजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव में
सरफरोशी के ख्वाबीदा जज्बे उभारे
इस सुबह की राह देखी
जिसमें मुल्क की रूह आज़ाद हो
आज जंजीरे मह्कूमियत कट चुकी है
और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर
अजनबी कौम के ज़ुल्मत अफशां फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं

खेत सोना उगलने को बेचैन हैं
वादियाँ लहलहाने को बेताब हैं
कोहसारों के सीने में हैजान है
संग और खिश्त बेख्वाबो बेदार हैं
इनकी आँखों में तामीर के ख्वाब हैं
इनके ख़्वाबों को तकमील का रूप दो

मुल्क की वादियाँ, घाटियाँ, खेतियाँ
औरतें, बच्चियां
हाथ फैलाए, खैरात की मुन्तजिर हैं
इनको अम्न-ओ-अमन तहजीब की भीख दो

माओं को उनके होंठों की शादाबियाँ
नन्हे बच्चों को उनकी ख़ुशी बख्श दो
मेरे सुर बख्श दो, मेरी लय बख्श दो

आज सारी फिजा भिखारी खड़ी है
और मैं इस भिखारी फिज़ा में
अपने नगमों की झोली पसारे
दर-ब-दर फिर रहा हूँ

मुझको मेरा खोया हुआ साज़ दो
मैं तुम्हारा मुगन्नी तुम्हारे लिए
जब भी आया, नए गीत लाता रहूँगा|

(साहिर लुधियानवी)

(बंटवारे के वक्त क्षुब्ध होकर 1947 में)

दिसम्बर 19, 2013

चश्म मीठे पानी का रेगिस्तानी सफ़र में आएगा

रात भर नज़र में सपने भीगते रहे desert-001
हर आती जाती सांस में तुम थे
खुश थे हम

के…

इंतज़ार मक़ाम पायेगा…
जिसके अरमां में नींदें कुर्बान की
वो रुख बा-नकाब सही…

आएगा,
नज़र झुकाए शरमाया शरमाया सा
ज़ुल्फ़ चेहरे पे गिराए हुए आएगा
अल-सुबह से दिल में सुकून सा था
हर आहट ने कहा “लो आ गए वो”
थक गए तो मेरे ही कन्धों पे सो गए
तारे तमाम रात मेरे साथ जागे थे
आ भी जा के यकीन हो चले…
इंतज़ार के बाद सही
एक चश्म मीठे पानी का

रेगिस्तान के इस सफ़र में आएगा

Rajnish sign

नवम्बर 9, 2013

निर्मोही तेरी याद में

दिल तो बहुत किया न कुछ कहूँ तुझेnadira-001

न याद करूँ…

न पुकारूं…

न ख्वाबों में तेरी जुल्फ सवारूँ

तेरी अहम् की दीवार बहुत ऊंची है

क्यूँ अपने को उसके पार उतारूँ

क्यूँ आखिर सौंप दूँ कमान

अपने दिल को तुझ जैसे

बेहिस पत्थर दिल को

क्यूँ करूँ रातें सियाह तेरी खातिर तू बता!

बहुत दिल करता है कि न कुछ कहूँ लेकिन

ये दिल ही है जो हर लम्हा तेरी याद

में धडकता है…

रखता है दहका के मुझे

हर शाम तेरी याद में मचलता है

और फिर फिर फिसल जाता है

हाथों से…

(रजनीश)

अक्टूबर 7, 2011

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले

एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

प्यार से कोई मेरी ज़ुल्फ को संवार दे
बोझ सभी ज़िंदगी के प्यार से उतार दे
हाथ मेरा थामकर हर सफर में वो चले
इस चमन से जो गई वही मुझे बहार दे

प्रसून सा कहीं खिलूँ फिर कोई निहार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

मेरे नयनों में फिर सपने वो जागने लगें
तस्वीर दिल में फिर वही हम टांगने लगें
मंदिरों में, मस्जिदों में मौन होके या मुखर
साथ उम्र भर का झुके माथ मांगने लगें

घाटियों में प्रेम की, फिर कोई उतार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले…

नज़र मिला नज़र गिरा, ओट में ही मुस्करा
खुले बहुत मगर फिर भी लाज हो ज़रा-ज़रा
इस तरह लगे कि जैसे अंग-अंग भर उठे
धरा अगर लगे परी तो आसमां भरा-भरा
मन के तार छेड़ दे फिर कोई सितार ले
एक बार फिर कोई प्यार से पुकार ले

{कृष्ण बिहारी}

%d bloggers like this: