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जनवरी 6, 2014

Zen Ikkyu… आह! ये कविता

यह उसका पारदर्शी मन zenikkyu-001

जब पूछा,

उसने दिया उत्तर

ना था प्रश्न

ना था उत्तर

तब गुरु

के पास मन में

न था शायद कुछ भी !

उसका मन सतत

ना था आदि,

न हैं अंत

और मेरा मन

जिसका था जन्म

होगी उसकी मृत्यु

यही है शून्य का सत्व!

सभी पाप सभी कर्म

इन तीनों लोकों के

धुंधलाकर हो जायेंगे लुप्त

मेरे साथ ही!

(Zen Ikkyu की एक कविता का अनुवाद)

Yugalsign1

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जनवरी 4, 2014

शून्य…

दुनियावी झमेलों से शुरू होकरlifeman-001

कभी न खत्म होने वाली भूलभुलैया

के बीच,

रास्ते में एक विश्राम

अब यदि हो बारिश, तो होवे

अब यदि आएं झंझावात, तो आवें!

मेरा बहुत पुराना स्व:

इस अस्तित्वहीन प्रकृति में

जहां,

मृत्यु के बाद न है जाना कहीं

न है कुछ भी !

Yugalsign1

[Zen Ikkyu की एक कविता का अनुवाद …]

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