Posts tagged ‘Zehar’

नवम्बर 10, 2013

दीवाना फिर पी के आया है…

lovers-001तेरे मिलने की तमन्ना है

लहू में इस तरह कुछ

जैसे गिर गयी हो खुल के

सिन्दूर की डिबिया

दूध भरे बर्तन में…

न अब सिन्दूर है…

न दूध है

ये जो भी है देखने में

गुलाबी है बहुत

लेकिन…

ऐसे जहरीले नशे से भरा…

जो उतरे न फिर

जो चढ़ जाए एक बार…

तेरे गुलाबी नर्म होठों का मधु-विष

पीया था मैंने एक बार बस यूँ ही…

‘प्यास से मरता जैसे कोई जल के धोखे  ज़हर  पी ले’

लड़खड़ा रहे हैं कदम दर-ब-दर अभी तक…

लोग कहते हैं  देखो दीवाना फिर

पी के आया है…

(रजनीश)

अगस्त 23, 2013

मुहम्मद अल्वी : दिल्ली और अन्य कवितायेँ

Muhammed Alviदुनिया में एक से बढ़कर एक गुणी और रचनात्मक व्यक्ति जीते रहे हैं।

बेहतर लिखने वाले किसी शहर पर भी चंद पंक्तियों में ऐसा लिख सकते हैं कि पढ़ने वाला शब्दों के जादू में खो जाए|

शायर मुहम्मद अल्वी साहब की रचनायें भी ऐसी ही आकर्षक हैं कि उन्हें सिर्फ एक बार पढ़ने वाला भी  भूल नहीं पाता|

दिल्ली पर कविता तो लाजवाब है। और बाकी भी ऐसी हैं कि पढ़ते जाओ… डूबते जाओ… उबरो… फिर पढ़ते जाओ|

दिल्ली तेरी आँख में तिनका

कुतुबमीनार

दिल्ली तेरा दिल पत्थर का

लाल किला

दिल्ली तेरे बटुए में

ग़ालिब की मज़ार

रहने भी दे बूढी दिल्ली

और न अब कपडे उतार|

 * * * * * * * * * * *

         सुबह

       . . . . .

आँखें मलते आती है

चाय की प्याली पकड़ाकर

अखबार में गुम हो जाती है

             शहर

        …………

कहीं भी जाओ, कहीं भी रहो तुम

सारे शहर एक जैसे हैं

सड़कें सब साँपों जैसी हैं

सबके ज़हर एक जैसे हैं

       उम्मीद

      …………

एक पुराने हुजरे* के

अधखुले किवाड़ों से

झांकती है एक लड़की .

[हुजरे* = कोठरी]

            इलाजे – ग़म

           …………………..

 मिरी जाँ घर में बैठे ग़म न खाओ

उठो दरिया किनारे घूम आओ

बरहना-पा* ज़रा साहिल पे दौड़ो

ज़रा कूदो, ज़रा पानी में उछलो

उफ़क में डूबती कश्ती को देखो

ज़मीं क्यूँ गोल है, कुछ देर सोचो

किनारा चूमती मौजों से खेलो

कहाँ से आयीं हैं, चुपके से पूछो

दमकती सीपियों से जेब भर लो

चमकती रेत को हाथों में ले लो

कभी पानी किनारे पर उछालो

अगर खुश हो गए, घर लौट आओ

वगरना खामुशी में डूब जाओ !!

[बरहना-पा* = नंगे पाँव]

      हादसा

    …………..

लम्बी सड़क पर

दौड़ती हुई धूप

अचानक

एक पेड़ से टकराई

और टुकड़े-टुकड़े हो गयी

         कौन

      ………

कभी दिल के अंधे कूएँ में

पड़ा चीखता है

कभी दौड़ते खून में

तैरता डूबता है

कभी हड्डियों की

सुरंगों में बत्ती जला के

यूँ ही घूमता है

कभी कान में आ के

चुपके से कहता है

तू अब भी जी रहा है

बड़ा बे हया है

मेरे जिस्म में कौन है ये

जो मुझसे खफा है

         खुदा

      ………

घर की बेकार चीजों में रखी हुई

एक बेकार सी

लालटेन है !

कभी ऐसा होता है

बिजली चली जाय तो

ढूंढ कर उसको लाते हैं

बड़े ही चैन से जलाते हैं

और बिजली आते ही

बेकार चीजों में फैंक आते हैं !

पुनश्चः – मुहम्मद अल्वी के काव्य संगृह ‘चौथा आसमान ‘ को 1992 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला|

फ़रवरी 28, 2012

लिखती होगी नाम मेरा वो

जिन यादों को नींद न आये

उन्हें सुलाना बहुत कठिन है

दिल कि दुनिया जिन्हें बसाए

उन्हें भुलाना बहुत कठिन है|

लिखती होगी नाम मेरा वो

आज भी अपने तकिये पर

यह तो केवल सुई ही जाने

चली वो कितना बखिए  पर |

दोनों की इस व्यथा कथा को

आज सुनाना बहुत कठिन है|

बहुत ज़मीनी दूरी है पर

रहती है वो पास ही मेरे

उसकी यादों में गुजरे जों

वे पल  हैं सब खास ही मेरे|

क्यों मैं उसकी कसमें खाऊं

जिसे बुलाना बहुत कठिन है |

सच कहता हूँ तुमसे यारों

मेरी तरह ही जीती होगी

मेरे बिना ज़िंदगी को वह

ज़हर समझकर पीती होगी|

उसका नाम बता देता पर

सच झुठलाना बहुत कठिन है|

{कृष्ण बिहारी}

 

सितम्बर 13, 2011

ज़हर भी है मुस्कान में

 

काबे में मिले ना हमको सनमखानों
कुछ होश वाले जो मिले मयखानों में

मेरे जुनूं को तलाश जिस होश की है
फरजानों में पाया न मिला दीवानों में

अक्ल के फ़रमान सहन होते किससे
शुक्रिया तेरा जो रखा हमें दीवानों में

हुस्न, इश्क, यारी, ईमान, अकीदे खुदा
क्या नहीं बिकता है आज दुकानों में

मौत को भी जाने ठौर मिले न मिले
जिंदगी तो कटी किराए के मकानों में

कसले दौर में सांस लेने की है सज़ा
कांटे उग आये लोगों  की ज़बानों में

कभी खापों के रुलाते फैसले भी देख
लैला मजनू तो पढ़े तूने दास्तानों में

नर्म मैदान ने गंदा कर के खा लिया
नदी पाक थी जब तक बही चट्टानों में

हँसी की महफ़िल में ज़रा होश आलम
ज़हर का भी पुट होता है मुस्कानों में

(रफत आलम)

फरजानों – बुद्धिमानों , फ़रमान – आदेश

अगस्त 9, 2011

बेटी है गर्भ में, गिरायें क्या?

अँधेरे का जश्न मनाएँ क्या
उजालों में मिल जाएँ क्या

अनगिनत पेड़ कट रहे हैं
कहीं एक पौधा लगाएं क्या

आज बेचना है ज़मीर हमें
तो खादी खरीद लाएं क्या

बामुश्किल है पीने को पानी
धोएँ तो बताओ नहाएं क्या

बहु के गर्भ में बेटी है आई
पेट पर छुरी चलवायें क्या

बेबस हैं बिकती मजबूरियाँ
भूखे बदन ज़हर खाएं क्या

अंधा है क़ानून परख लिया
कोई तिजोरी लूट लाएं क्या

रोने को रो लिए बहुत हम
पल दो पल मुस्कराएं क्या

यारों ने दिल की लगी दी है
यारों से दिल लगाएं क्या

सायों का क़द नापेगा कौन
हम भी घट-बढ़ जाएँ क्या

चुप की बात समझ आलम
और हम हाल सुनाएँ क्या

(रफत आलम)

जुलाई 28, 2011

चिंता जहर, चिंतन संजीवनी (संत सिद्धार्थ)

मित्रों, आज कुछ देर बात हो जाये चिंता पर। चिंता दीमक समान है जीवन के लिये और यह धीरे-धीरे मानव की चेतना को खाकर जीवन को पूर्णतया नष्ट कर देती है। आप गौर से अपने स्वभाव को देखना, अपने आसपास के लोगों के स्वभाव को देखना, चिंता करना धीरे-धीरे एक आदत बन जाती है।

चिंता उपजती है भय से। भय कि कल क्या होगा। चिंता उपजती है अहंकार से जन्मी निराशा से कि जीवन की बागडोर हाथ से निकल रही है… जैसे कि जगत में सब कुछ मानव की इच्छा से हो रहा है! क्या मानव हर बात को नियंत्रित कर सकता है?

आज में न जीकर, अभी न जीकर जब लोग भविष्य में जीना शुरु कर देते हैं, भूत काल के भूतों के साथ रहना शुरु कर देते हैं तब चिंता को उनके अंदर वास करने का मौका मिल जाता है। कभी किसी जानवर को चिंता करते देखा है? अगर कोई खतरा आन पड़ा है तो वे वे बस क्षण में निर्णय लेते हैं। उस खतरे के पूर्वाभास में चिंता में नहीं गले रहते।

एक और बात स्पष्ट कर लें। चिंता और चिंतन एक ही बात नहीं है। चिंता निराशाजनक है…प्राणघातक है, भय में इसका मूल छिपा होता है। चिंता ऋणात्मक भाव है। चिंता सुप्त मस्तिष्क का भाव है। चिंता ऐसे सारी ऊर्जा सोख लेती है जैसे कि बहुत से पेड़ और लतायें भू-जल सोख कर आसपास की जमीन की उर्वरा क्षमता को भी खा जाती हैं। चिंता से होकर जाने वाला रास्ता चिता की ओर ले जाता है। चिंता करने की आदत वाला व्यक्त्ति जीवन में परेशानियों का सामना नहीं करता बल्कि उनके बारे में सोचता रहता है। वह नदी किनारे बैठा रहता है कि अगर पानी में उतर गया तो गीला हो जायेगा, ठण्ड लग जायेगी, बीमार पड़ जायेगा। वह कभी नदी के उस पार नहीं जा पाता और वहाँ क्या क्या बसा है इसे देखने, जाने और समझने से वंचित ही रह जाता है। चिंता करने वाला व्यक्त्ति जीवन के बहुत सारे पहलुओं से अनभिज्ञ ही रह जाता है।

चिंतन के साथ ऐसा कोई ऋणात्मक वातावरण नहीं उपजता। चिंतन का मूल साहस में छिपा होता है। चिंतन चेतन मस्तिष्क की उपज है। कुछ परेशानी आये जीवन में तो चिंतन करने वाला व्यक्त्ति रास्ता खोजता है आगे बढ़ने का। चिंतन करने वाला व्यक्त्ति प्रबंधन करने में कुशल होता जाता है। वह जीना सीख लेता है। वह हर पल भय में नहीं जीता कि कल क्या होगा। वह अपने को तैयार करता रहता है, गुणों से भरता रहता है ताकि जीवन में किसी भी परिस्थिति में वह और उसका मस्तिष्क तत्परता से सक्रियता दिखा सके। हार-जीत, सफलता-असफलता से परे वह जीने में विश्वास करने लगता है।

ऐसा नहीं कि चिंतन करने वाला व्यक्त्ति भविष्य के प्रति उदासीन रहेगा। पर वह चिंता करने वाले की भांति भविष्य का भय वर्तमान पर लाद कर आज और अभी के पलों को नष्ट नहीं करेगा।

चिंता करते वक्त्त मस्तिष्क में बेकार के विचार ही घूमते रहते हैं। मस्तिष्क कोई भी उपयोगी विचार उत्पन्न नहीं कर पाता और चिंतित व्यक्त्ति अंत में हार मानकर बैठ जाता है कि अब उससे कुछ न हो सकेगा।

बहुत से व्यक्त्ति ऐसे भी हैं जो इसलिये चिंता को अपना लेते हैं क्योंकि उन्हे लगता है कि अगर वे चिंता न करें तो वे सक्रिय नहीं रह पायेंगे और चिंता उन्हे हमेशा कुछ न कुछ करने की ओर धकेलती है और वे वे बुरे से बुरे विचार सोचते रहते हैं और फिर चिंता की वर्तुलाकार गति में उलझे रह जाते हैं।

चिंता जीवन में जो कुछ भी अच्छा है उस सबकी ओर से व्यक्त्ति की आँखें बंद करवा देती है। धीरे-धीरे चिंता व्यक्त्ति को अवसाद, उदासी, और तनाव से भरे ऋणात्मक वातावरण में ले जाती है और वह नींद और सुख-चैन से हाथ धो बैठता है। और किस कारण यह सब? सिर्फ मस्तिष्क में ऊट-पटांग सोचते रहने के कारण। चिंता करने की आदत रखने वाला हर बात में चिंता करने की गुंजाइश खोज लेता है। वह हरेक बात से परेशान रहता है।

अगर आपके साथ भी ऐसा होता है। भले ही कभी कभी ही सही तो जागरुक होने की आवश्यकता है। चिंता को चिंतन में बदलने का प्रयास करें। समझ कर प्रयास करेंगे तो धीरे-धीरे ही सही पर आप चिंता से दूर होकर चिंतन की ओर बढ़ना शुरु कर देंगे और जीवन जीना शुरु कर देंगे।

चाहे तो इसे इस तरह से मान लें कि चिंता के साथ हर तरह की हानि आती है जीवन में और चिंतन के साथ लाभ आते हैं। कोई क्यों हानि भरा जीवन जीना चाहेगा?

जगत से भयभीत न हों। जीवन से भय न रखें। जीवन के उतार-चढ़ावों से न घबरावें। जीवन में मौसम के बदलाव से चिंतित न हों। जीवन की अनिश्चितता से भयभीत होकर जीवन में घुन न लगा लें।

जब एक घंटे का या कुछ घंटों का खेल खेलते हो तो क्या इस बात से भयभीत होकर मैदान से बाहर ही बैठे रहते हो कि हार जाओगे? या हे भगवान चोट लग जायेगी या कैसे सब कुछ होगा।

नहीं आप मैदान में उतरते हो…खेल खेलते हो और जैसी परिस्थितियाँ खेल के दौरान सामने आती हैं उसी के अनुरुप प्रदर्शन करने की कोशिश करते हो। बस यही जीवन का भी खेल है।

जैसे खेल के लिये अपने को गुणी बनाते हो, तैयार करते हो, वैसे ही जीवन में भी करने की जरुरत है।

गौर से देखना आप विचारों को रोक सकते हो, उनकी दिशा बदल सकते हो। जब तक आप रेडियो ऑन नहीं करते तब तक कोई स्टेशन नहीं लगता और यह आपके हाथ में है किस स्टेशन को आप सुनना चाहें, कहीं गीत आ रहे हैं, कही वार्ता चल रही है, कहीं नाटक चल रहा है। आप जो चाहते हो सुनते हो। मानव मस्तिष्क भी कुछ कुछ ऐसा ही है। हजारों-लाखों तरह के स्टेशन रुपी विचार तैर रहे हैं और मानव मस्तिष्क उन्हे पकड़ लेता है। अभ्यास से अपने मस्तिष्क को ऐसा बनायें कि यह उपयोगी बातें विचारने लगे।

विचार को रोकना या बदलना सीखें। जब आपको लगे कि चिंता आपको ग्रसित कर रही है। कुछ शारीरिक काम ही करने लग जायें, या कुछ भी और करें… ध्यान बँट जायेगा…विचार दूसरी ओर केंद्रित हो जायेंगे। ऊर्जा सही रुप में उपयोग होने लगेगी। धीरे-धीरे आपको विचारों पर नियंत्रण करना आ जायेगा।

ध्यान रखें हमेशा कि जीवन तो चुनौतियाँ देता रहेगा। और यह मानव को सोचना है कि वह क्या करना चाहता है नयी परिस्थितियों के साथ?

अगर जीना है तो उसे कमर कसनी होगी कि रास्ते खोजे आगे बढ़ने के और मस्तिष्क का सही प्रयोग करेगा तो रास्ते मिल ही जायेंगे।

जीवन को चिंता से दूर ले जाकर चिंतन की ओर मोड़ें। यही एकमात्र वास्तविक प्रबंधन है जीवन में।

जून 29, 2011

प्रेम जीवन का द्वार

प्रेम में
छिपी होती है
एक आग
जो तपा कर
सोने को कुंदन बना देती है।

प्रेम के
स्वादिष्ट भोज
में
समाविष्ट
रहते हैं
मीठे,
खट्टे,
कड़वे,
और कसैले
भाव रुपी
व्यंजन भी।

प्रेम के
अमृत रुपी
कलश में
ही बसा होता है
मीठा जहर भी।

प्रेम
अस्तित्व में
पूरकता भी लाता है
और यह
एक बहुत बड़े अभाव
की ओर इशारा भी कर देता है।

प्रेम के
साथ आने वाला सुख
गुलज़ार कर देता है
गुलशन
तो इसके साथ आने वाली
पीड़ा
उपजा देती है
एक नासूर भी
जो रिस रिस कर
जीवन को
एक लुभावनी मौत की
ओर खींचता ले जाता है।

प्रेम में
आपस में गुथे होते हैं
हार और जीत
इन्हे अलग नहीं किया
जा सकता।

प्रेम
जीवन की
निजता है
अस्मिता है।

प्रेम कर पाना,
प्रेम में होना,
जीवन जीने की,
जीवन जी पाने की,
जीवन से तारतम्य
बैठा पाने की
कसौटी है।

…[राकेश]

टैग: , , , , , , , ,
%d bloggers like this: