Posts tagged ‘Zakhm’

जनवरी 21, 2014

उधड़ी सीवन…

कुछ ज़ख्म सिले थे

वक़्त ने

नकली मुस्कानों का लेप लगा के

दर्द छुपाया खोखले कहकहों में

कल कुरेद कर देख लिया

सीवन उनकी उधड़ गयी कल

दर्द अभी तक टीस रहा है…

परत जमी भर  थी…

ज़ख्म नहीं भरा था

अभी तक हरा था…

Rajnish sign

अप्रैल 8, 2013

मिटाने वाले …गजल (हंसराज ‘रहबर’)

ज़ख्म हंस हंस के उठाने वाले
फन है जीने का सिखाने वाले
आज जब हिचकी अचानक आई
आ गये याद भुलाने वाले

बात को तूल दिए जाते हैं
झूठ का जाल बिछाने वाले
रहनुमा जितने मिले जो भी मिले
हाथ पर सरसों उगाने वाले

लो चले नींद की गोली देकर
वो जो आये थे जगाने वाले
वे जो मासूम नज़र आते हैं
आग भुस में हैं लगाने वाले

सांच को आंच नहीं है ‘रहबर’
मिल गये हमको मिटाने वाले|

हंसराज ‘रहबर’

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

अगस्त 11, 2011

गम का आसरा : नरेश कुमार ’शाद’

दिले बेमुददाआ दिया है मुझे
देने वाले ने क्या दिया है मुझे

दोस्तों ने दिए हैं ज़ख्म कहाँ
दोस्ती का सिला दिया है मुझे

मुझको दुनिया का तजुर्बा ही नहीं
तजुर्बे ने बता दिया है मुझे

जिंदगी से तो क्या शिकायत हो
मौत ने भी भुला दिया है मुझे

जब भी घबरा गया हूँ मैं गम से
गम ने खुद आसरा दिया है मुझे

…………..
प्रस्तुती : रफत आलम

जून 17, 2011

दिल बहलाने का ख्याल

तन्हाई की घुटन में सन्नाटों से दिल बहलाते रहे
रात भर गिनते रहे करवटों से दिल बहलाते रहे

खुद से भी डर गए जो जानते थे चेहरों का सच
हाँ जो बहरूपिये थे मुखौटों से दिल बहलाते रहे

घर की देहरी इन्तज़ार में पत्थर हो गयी आखिर
एहले-हवस शहर की गुड़ियों से दिल बहलाते रहे

इश्क के रास्ते में मिटने से भला डरता है कौन?
चिरागों के हौसले थे हवाओं से दिल बहलाते रहे

ज़ख्म देने वालों से मरहम की आस थी फ़िज़ूल
कुछ दर्दमंद थे जो मुस्कानों से दिल बहलाते रहे

(रफत आलम)

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