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नवम्बर 10, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1)

विरोध की हल्की सी झलक पाते ही लेखिका कम सम्पादक कम विभागाध्यक्ष महोदया – प्रोफ़ेसर कामना बिफर उठीं। चेहरा आवेश में लाल हो गया। मेज पर रखे मोबाइल को उठाकर उसमें कुछ देखा और फिर उसे वापस मेज पर रखते हुये बोलीं,” देखिये अनिल जी, कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी समाज को दर्पण दिखाती है और लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों को प्रकट करते हैं।”

कुछ हद तक आपका कहना ठीक है कामना जी परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आप सोचकर बतायें कि क्या कहानी के पात्र स्वतंत्र होते हैं? कौन उन्हे विचार देता है? क्या वे अपनी मनचाही दिशा में भ्रमण करने के लिये स्वतंत्र होते हैं? या लेखक उन पर उनकी प्रत्येक किस्म की गति, चाहे वह किसी भी दिशा में क्यों न हो, पर अपना पूरा नियंत्रण रखता है?

लेखिका कुर्सी पर बैठे बैठे बिलबिलाने लगीं, उनका क्रोध और बढ़ गया। ऊँचे स्वर में कहने लगीं।

लेखक समाज में से ही तो चरित्रों को लेता है, वह उन्हे संवाद और मनोस्थिति देता है पर वह उन्हे ऐसी दिशा में ही नियंत्रित करता है जिससे समाज को कुछ बातें कह सके।

कामना जी, अगर कहानी समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने का ही नाम है फिर तो यह काम एक साधारण पत्रकार बहुत सस्ते में कर देता है और अपने लिखे पर उसे ऐसा बहुत ज्यादा गर्व भी नहीं होता जैसा कि अपनी एक भी कहानी कहीं छपने वाला लेखक दर्शाने लगता है। पत्रकार के व्यवहार में तो यह चाह भी नहीं दिखायी देती कि उसे चिंता है कितने लोग उसके लिखे को पढ़ेंगे और इस पर उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं।

अनिल जी, मैं आप से फिर से कह रही हूँ कि कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी में जहाँ लेखक का कोई सामाजिक दायित्व नहीं होता वहीं लेख में वह अपने नितांत व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत कर सकता है।

तो फिर कामना जी, डबल स्टैंडर्ड वाली बात कहाँ तक झूठ है? एक तरफ तो आपकी कहानियों के चरित्र खासकर महिला चरित्र विवाहपूर्व और विवाहेत्तर सभी प्रकार के शारीरिक संबंधों में सलंग्न रहते हैं और दूसरी ओर आपके लेख हद दर्जे की चिंता में घुले जाते हैं कि लड़कियों को इन सब तरह के शारीरिक सम्बंधों से दूर रहना चाहिये। आपकी लगभग हर कहानी की नायिका विवाह से पूर्व और विवाह के बाद वैवाहिक जीवन से बाहर शारीरिक सम्बंध बनाने में सलंग्न दिखायी देती है पर वास्तविक जीवन की तरह वह कभी भी गर्भवती नहीं होती। ऐसा क्यों? अब यह मानने का तो कोई कारण है नहीं कि आपकी कहानियों में एकदम से स्थापित इन शारीरिक सम्बंधों की मुठभेड़ों से निबटने के लिये आपके नायक या नायिका अपने साथ गर्भ निरोधक साधन साथ लेकर घूमते होंगे? आपकी कहानियाँ ऐसा तो कोई संकेत नहीं देतीं। क्या किशोर पाठक आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसी प्रेरणा नहीं लेगें कि ठीक बात है कि विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंध हानिकारक नहीं हैं लड़कियों के लिये।

अनिल जी, मेरी नायिकायें पच्चीस की वय को पार कर चुकी वयस्क नारियाँ हैं जो अपना भला बुरा बखूबी समझती हैं।

कामना जी सच पूछें और मुझे सच बोलने की अनुमति दें तो मेरी इच्छा हो रही है कि मैं इस बात का जवाब कुछ यूँ दूँ कि एकदम से हुये इन सैक्स एनकाऊंटर्स में नारी पात्रों की परिपक्वता गर्भ निरोधक का कार्य तो करेगी नहीं। शुक्राणु और अंडाणु को क्या मतलब नर-नारी की मानसिक परिपक्वता से? वे तो मिलन का मौका छोड़ने से रहे और देखा तो ऐसा गया है कि अगर युगल अविवाहित हैं तो इनके मिलन कुछ जल्दी ही हो जाते हैं।

अनिल ने लेखिका की ओर देखा तो वे गुस्से से उसकी ओर ही देख रही थीं और उनके इर्द गिर्द बैठी और खड़ी उनकी शिष्यायें भी गुस्से से भरी साँसें और क्रुद्ध दृष्टिपात उसकी ओर फेंक रही थीं।

उन्हे हल्के मूड में लाने के लिये अनिल ने मुस्कुराते हुये कहा।

आपने देखा ही होगा प्रकाश झा की राजनीति में कि भारत में स्त्री-पुरुष की फर्टीलिटी पॉवर कितनी ज्यादा है! इस फिल्म की तीन स्त्रियाँ एक ही बार के संसर्ग में गर्भवती हो गयीं और विवाह पूर्व बनाये ऐसे संबध ने कितना बड़ा हत्याकांड करवा दिया। प्राचीन काल से ही महाभारत आदि भी इस बात की गवाही देते रहे हैं।

अनिल के इस उदाहरण से न चाहते हुये भी लेखिका और उनकी शिष्य मंडली के मुख मंडलों पर तिर्यक रेखायें खिंच गयीं पर वे ढ़ील देना नहीं चाहती थीं सो गम्भीर मुद्रा ही बनाये रहीं।

…जारी

…[राकेश]

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

मार्च 9, 2013

अद्भुत औरत

Maya Angelou की प्रसिद्द कविता Phenomenal Woman का हिन्दी अनुवाद

औरतें उत्सुक रहती हैं  

जानने को कि कहाँ छिपे हैं

मेरे चुम्बकीय व्यक्तित्व के रहस्य?

 

खूबसूरती की उनकी परिभाषा की समझ से

मैं किसी भी हिसाब से खूबसूरत नहीं हूँ

न ही मैं फैशन माडल्स जैसे आकार प्रकार वाली हूँ

लेकिन जब में उन्हें अपनी गोपनीयता बताना शुरू करती हूँ

तो वे सोचती हैं

मैं झूठ बोल रही हूँ |

 

मैं कहती हूँ

रहस्य मेरी बाहों के घेरे में है

मेरे नितंबों के फैलाव में है

लंबे-लंबे डग भरती मेरी चाल में है

मेरे होठों के घुमावों और कटावों में है|

  

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

मैं प्रवेश करती हूँ किसी कक्ष में

जैसी मैं हूँ

अपने सारे वजूद को साथ लिए

और पुरुष,

वे सब खड़े हो जाते हैं

या अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं

वे मेरे इर्द गिर्द

ऐसे एकत्रित हो जाते हैं

जैसे छत्ते के करीब मधुमक्खियाँ

मैं कहती हूँ

रहस्य छिपा है

मेरी आँखों में बसी आग में

मेरे दांतों की चमक में

मेरी कमर की लचक में

मेरे पैरों के जोश में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

पुरुष खुद अचरज करते हैं

कि वे क्या देखते हैं मुझमे

वे कोशिश तो बहुत करते हैं

पर कभी छू नहीं पाते

मेरे अंदुरनी रहस्य को

जब मैं उन्हें दिखाने की कोशिश करती हूँ

वे कहते हैं –

वे देख नहीं पा रहे अभी भी|

मैं कहती हूँ,

रहस्य तो छिपा है

मेरी रीढ़ की चाप में

मेरी मुस्कान के सूरज में

मेरे वक्षों के उठान में

मेरे मनोहरी सलीके में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

अब तुम्हे समझ में आ गया होगा

क्यों मेरा सिर झुका हुआ नहीं रहता है

मैं शोर नहीं मचाती,

कूद-फांद नहीं मचाती

अपने को जाहिर करने के लिए

मुझे प्रयास नहीं करने पड़ते

पर जब तुम मुझे देखो

पास से जाते हुए

तुम्हारे अंदर मुझे लेकर गर्व का भाव जगना चाहिए|

 

मैं कहती हूँ,

मेरे चुम्बक का रहस्य  

छिपा है –

मेरे जूते की हील की खट-खट में

मेरे बालों की घुंघराली लटों में

मेरे हाथों की हथेलियों में

मेरी देखरेख की जरुरत में,

‘क्योंकि’ मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत,

हाँ वह हूँ मैं |

[Maya Angelou]

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