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नवम्बर 17, 2013

देह की भाषा

मौन नहीं हुआ करती है देह की भाषाgustav-001

बहुत मुखरित हुआ करती है देह की भाषा

व्यक्त हो जाया करती है देह की भाषा…

उठती गिरती साँसों में

कंपकपाते  होठों में

हृदयों के स्पंदन में

बोली की  लरजन में

कांपती पिंडलियों में

आरक्त हुए कानो में

धमनियों के रक्त दबाव में

आखों के झुकने में

संवेदित होते अंगो में

पास आ पढ़ लो

मेरी देह की भाषा को

तुम मौन भी रहो,

कोमल हाथों  की छुअन से

हौले से सहला कर

देह तुम्हारी समझ लेगी इसे…

रख दो इसे बस पास इसके

स्वयं समाहित हो जाएँगी ये एक दूसरे में

आओ आज समा जाने दो मुझ को तुम में…

(रजनीश)

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