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मई 8, 2011

एक रचना: निर्णायक प्रसंग

तर्पण करना ही होगा
किसी गया में
अपने भीतर
जली चिता का अस्थिकलश
शायद तब यह प्रेत योनि छूटे
विष पीकर पचाने का
यह दंभ छोड़ना होगा
मैं शंकर भगवान नहीं हूँ
विश्वनाथ कहलाने का
हर भरम तोड़ना होगा
ज़िंदगी के लिये…
क्योंकि ज़िंदगी
सिर्फ यादों की
कोठरी नहीं है।

{कृष्ण बिहारी}

एक रचना: पहला प्रसंग
एक रचना : दूसरा प्रसंग

एक रचना : तीसरा प्रसंग

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