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अप्रैल 19, 2011

जिंदगी तेरे रूप अनेक

मंदिर की पावन आरती
मस्जिद की अज़ान जिंदगी

मजदूर की सोयी हुई थकन
अमीर की अनिद्रा से परेशान जिंदगी

भूखे पेट की तमन्ना
रोटी के टुकड़े की मुस्कान जिंदगी

विधवा की जवानी
जलता हुआ मसान जिंदगी

बूढ़े की खांसी
पूरी होती दास्तान जिंदगी

संतुष्टि की चरम सीमा
बच्चे की मुस्कान जिंदगी

वेश्या की जवानी
मजबूरी का बयान जिंदगी

नारी का अनमोल आभूषण
सिन्दूर की शान जिंदगी

जिंदगी तू गुल भी तू ही खार
जिंदगी तू बिके तू ही खरीदार

तू लम्हा भी सदी भी है
कहकहों का समंदर कहीं

आँसुओं की नदी भी है
तू ही नेकी तू ही बदी भी है

तू ही शैतान की जननी
तू ही अवतार-पैगम्बर

जिंदगी तेरे रंग हज़ार
जिंदगी तेरे रूप बेशुमार

बावफा इतनी के साँसों में बसती है
बेवफा ऐसी के पल में मौत बनती है

(रफत आलम)

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