Posts tagged ‘Videsh’

जुलाई 24, 2011

बूढ़े नीम तले बुदबुदाते बूढ़े होठ

ऊँगली पकड़ कर
चलना सिखाया था
बहुत अरमानों के साथ
तैयार किये थे मज़बूत कँधे
यकीन था एक दिन
यह श्रवण कुमार बनेगा
गर्व से फट रहे सीने ने
सफलता की लाख दुआएं देकर
सात समंदर पार
भिजवाया था उसे
कामयाबी की भूलभुलियाँ
अक्सर,
रास्तों को बेमंजिल कर देती है
हर पारद मरीचिका
प्यास से मुक्ति का
साधन नज़र आने लगती है
वह श्रवण कुमार भी लौटा था
ताजमहल के देश में
गोरी मेंम का हाथ थामे
हनीमून पर
संस्कारों की मौत के गम में
रिश्ते मरते–बिसरते चले गए
दिन वर्ष हुए
वर्षों में उम्र बीती
शरीर हारता गया समय से जंग
जलते-उबलते मस्तिष्क ने
छोड़ दिया होशो–हवास का साथ
फिर ना कोई वर्तमान
ना भूत ना भविष्य रहा
बस टूटती–अटकती सांसे
बिखर गए जिस्म में
जीवन की पहचान बनी हैं
एकटक क्षितिज को तकती
पथराई सी स्थिर आँखों को
किस मंज़र की है तलाश
वृद्धाश्रम के बूढ़े नीम तले
जाने किससे बतियाते हैं
बुदबुदाते होठ।

(रफत आलम)

जुलाई 3, 2011

मैं और मेरी प्रवासी दुनिया

मेरे साथ था एक छोटा-मोटा जुलूस
जब मैंने पहली बार
छोड़ा था देश
नादान दोस्तों से लेकर
दानेदार दुश्मन तक
सभी आये थे
स्टेशन तक छोड़ने मुझे।
आँखों में आँसू
और उनके आगे थी मेरी धुँधलाती दुनिया
जो ट्रेन के चलते ही
दिखने लगी थी साफ-साफ।

फूल मालायें और
बाहों के बंधन
सब कुछ बहुत भावुक
और बहुत करुण था।

मैंने आखिर तक
की भी बहुत कोशिश
कि माँ ने जो
विदा के समय लगाया था तिलक
दही और चावल का
वह पुछ न पाये।

मगर क्या हो पाया वैसा
जहाज में चढ़ने से पहले
बहुत जोर से उठी हूक
उमड़े आँसू और फिर
धूमिल होने लगीं
धीरे-धीरे करुण कठोर स्मृतियाँ।

बरस-दर-बरस
गये बीत
आते जाते हिंदुस्तान
आना जाना मेरा
बन गया एक ढ़र्रा
अब न कोई
एयरपोर्ट आता है
न स्टेशन।

अब नहीं लिखता कोई
मुझे याद करते भीगे पत्र
नहीं भेजता कोई
नव वर्ष का कार्ड
और अपनी ताज़ा तस्वीर।

बरसों बीत गये
यह वक्त्त एक युग से कम तो नहीं!
नहीं मालूम मुझे
कि मैं और मेरी दुनिया में
कौन हो गया है अकेला।

{कृष्ण बिहारी}

मई 4, 2011

अखबारों की सुर्खियां बनते जीवन

पंख उगते  ही उड़ान भर गए बच्चे सब
कोई बताये अब आशियाने का क्या करूँ
अरसे बाद डाकिया आया है घर की तरफ
चिट्ठी मेरी भी आई क्या जा के पता करूँ
…..

बेटे विदेशों से रस्मन लोट कर आये हैं
किसी की भी आँख नीची नहीं है शर्म से
तीये की बैठक ज़रूर ए.सी हाल में होगी
बाप की अर्थी चाहे निकली वृद्धाश्रम से
…..

माँ आया बच्चों की, बाप चौकीदार मकान में
बेटों की जान अटकी है हुस्ने बीबी जान में
दुनिया दिखावे के वक्त ज़रूर होगा दिखावा
चन्दन में फूकेंगे पहुँचा कर इन्हें मसान में
…..

दो बहनों का अखबार में पढ़ा था किस्सा
राखी के रखवाले ने उन्हें भूखा मार दिया
दूध के रिश्ते ही जब इतने ज़हरीले हो गए
पड़ोस की संवेदनहीनता से क्या हो गिला
…..

कल था अखबार में एक बहिन का किस्सा
पागलखाने वाले कहते हैं यह बीमार नहीं
बेचारी पर तकदीर का अत्याचार तो देखिये
सगे भाई भी उसे अपनाने को तैयार नहीं

(रफत आलम)

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