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दिसम्बर 11, 2013

जो हो रहा है वह रुकता नहीं, हो ही जाता है : ओशो

Osho-Mahaveer
ओशो सदेह उपस्थित होते तो आज 11 दिसम्बर को अपनी आयु के 82 साल पूरे कर रहे होते| उनकी सदेह उपस्थिति के समय भी कुछ हजारों को छोड़ बाकी संसार का उनसे मिलना उनकी किताबों, ऑडियो टेपों और वीडियो टेपों के द्वारा ही होता था सो उस लिहाज से उनके देह त्याग का उनकी सार्थकता पर कोई असर नहीं पड़ा है और उनकी सार्थकता बढ़ती ही जा रही है| उनसे परिचय न हो तो आदमी केवल नाम और उस नाम की छवि के बारे में प्रचलित धारणाओं से प्राभावित हो कैसे भी विचार उनके बारे में बनाए रख सकता है और रखता है पर देर सिर्फ उनसे एक मुलाक़ात की होती है फिर हरेक व्यक्ति का जीवन दो खण्डों में बंटता है, ओशो से मिलने से पहले ओशो से मिलने के बाद| कोई स्वीकार न करे यह अलग बात है पर ओशो उसे प्रभावित न करें ऐसा संभव है नहीं|

ओशो ने धरती पर मानव जीवन में जो भी और किसी भी काल में श्रेष्ठ घटा या उत्पन्न हुआ उसे समय की गर्त से निकाल आधुनिक मानव के समक्ष आज की समझदारी के हिसाब से रखा और आज की जरुरत के अनुसार अपने अस्तित्व के अंदर से नया भी जन्माया|

जो कार्य शुरू हो गया वह रुकता कभी नहीं| वह क्रिया अपनी पूर्णता को अवश्य ही प्राप्त करती है भले ही शुरू करने वाला व्यक्ति परिदृश्य से अनुपस्थित हो जाए|

एक अन्य महत्वपूर्ण बात वे ज्योतिष को समझाते हुए कहते हैं कि जो हमें अभी दिख रहा है या जैसा हमने विगत में घाटे के अनुसार समझा है केवल वही सत्य नहीं है सत्य तभी पूर्ण होता है जब वह भूत,वर्तमान और भविष्य के तीनों कालखंडों में पूर्ण आकार के साथ देख लिया जाए| भविष्य हमसे अज्ञात है इसलिए हमें पूर्ण सत्य के दर्शन होने बहुत मुश्किल होते हैं| भूत ने ही नहीं वर्तमान को रचा है बल्कि भविष्य में से भी कुछ है जो बात को, घटना को एक निश्चित आकार दे रहा है|

जीवन में बहुत सारी घटनाओं के सन्दर्भ में इस बात को समझा जा सकता है|

ओशो महावीर के जीवन के सहारे अपनी बात कहते हैं|

महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और पाँच सौ महावीर के मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से। महावीर कहते थे जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया है। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए।  अगर आप बूढ़े हो रहे है तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए।

      महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है—वह हो ही गया। महावीर का एक शिष्‍य वर्षा काल में महावीर से दूर जा रहा था। उसने अपने एक शिष्‍य को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्‍य को ख्‍याल आया कि ठहरो, महावीर कहते है—जो हो रहा है वही हो ही गया। तू आधे में रूक जा, चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गयी है—रूक जा।
      उसे अचानक ख्‍याल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हे। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई है। उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौटकर वर्षा काल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते है कि जो हो रहा है, वह हो ही गया। क्‍योंकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है—खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई। तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं। महावीर न उससे जो कहा,वह नहीं समझ पाया होगा, वह बहुत बुद्धि का राह होगा, अन्‍यथा ऐसी बात लेकर नहीं आता।
      महावीर ने कहा, तूने रोका—रोक ही रहा था….ओर रूक ही गया। वह जो चटाई तू रोका—रोक रहा था…रूक गया। तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी,एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गयी। और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी। खुल नी शुरू हो गयी है—खुल ही जाएंगी….तू लोट कर जा वह जब लौटकर गया तो देखा  एक आदमी खोलकर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया।
      महावीर जब यह कहते थे जो हो रहा है वह हो ही गया तो वह हय कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्‍य है। कली खिल रही है। खिल ही गई—खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्‍य में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है। अभी तो कली ही है। जब खिल ही रही है तो खिल ही जाएगी। उस का खिल जाना भी कहीं घटित हो गया।
      अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा।
      हम सदा अतीत से देखते है। कली खिल रही है। हमारा जो चिन्‍तन है, आमतौर से पास्‍ट ओरिएंटेड़ है, वह अतीत से बंधा है। कहते है कली खिल रही हे, फूल की तरफ जा रही है। कली फूल बनेगी…लेकिन इससे उल्‍टा भी हो सकता है। यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्‍के दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है कोई आपको आगे खींच रहा हो। गति दोनों तरफ हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्‍का दे रहा हूं,और आप आगे जा रहे हो।
      ज्‍योतिष का मानना है कि यह अधूरी है दृष्टि कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य हो रहा हे।
पूरी दृष्‍टि यह है कि अतीत धक्‍का दे रहा है और भविष्‍य खींच रहा है। कली फूल बन रही है,इतनी ही नहीं—फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार रहा है। खींच रहा है, भविष्‍य आगे हे। अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्‍का दे रहा हे। खुल जाओ। पूरा भविष्‍य आह्वान दे रहा है, खुल जाओ, अतीत और भविष्‍य दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी।
      अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्‍योंकि भविष्‍य में आकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्‍य में जगह चाहिए स्‍पेस चाहिए। भविष्‍य स्‍थान दे तो ही कली फूल बन पाएगी। अगर कोई भविष्‍य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धक्‍का माने—मैं आपको पीछे से कितना ही धक्‍का मारू, या दूँ।  लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊँ गा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्‍का दूँ और आगे की जगह आपको स्‍वीकार कर ले, आमंत्रण दे-दे कि आ जाओ,अतिथि बना लें, तो ही मेरा धक्‍का सार्थक हो पाए। मेरे धक्‍के के लिए भविष्‍य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है भविष्‍य जगह देता है।
      ज्‍योतिष की दृष्‍टि यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्‍टि अधूरी है, आधी—वैज्ञानिक हे, भविष्‍य पूरे वक्‍त पुकार रहा है, पूरे वक्‍त खींच रहा है। हमें पता नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आँख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्‍टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

ओशो की इस दृष्टि को हम आज के भारत पर लागू करें तो भारत से गलत को, बुराई को, भ्रष्टाचार को हटाने का जो कार्य शुरू हुआ है वह रुकेगा नहीं और अपनी पूर्णता को प्राप्त करके रहेगा| अगर ऐसी संभावना न होती तो इतना भी न होता|

नवम्बर 27, 2013

कगार का पेड़

कगार पर के पेड़ tree wall-001

की सार्थकता

क्या यह नहीं है

कि

टिकी है

एक पूरी दीवार

वर्तमान की,

उसके ऊपर

Yugalsign1

मई 16, 2010

जीवन बस यहीँ अभी

मन ही मन दुखी तो वह पहले से ही रहता था पर जब से उसने सस्ते दामों पर मिल जाने वाली ज्योतिष की एक किताब में पढ़ लिया था कि उस जैसे जातक अपने किये कामों और भूलों के कारण पछताते रहते हैं तब से तो उसने दुख को ही अपने जीवन का ऐसा भाव मान लिया था जो उसके साथ ताउम्र रहने वाला था।

हरदम उसे यही लगता था कि उसने जिन्दगी में हर काम या तो गलत किया है या गलत तरीके से किया है। आशा की इतनी किरण उसके अंदर जरुर थी कि आधे समय वह इस ख्याल से भी भरा रहता था कि यदि उसे मौका मिल जाये तो वह अपनी जिन्दगी में पीछे जाकर इस इस कदम को सुधार ले और अपनी जिन्दगी को खुशहाल बना ले।

उसे लगता था कि यदि उसने वैसा न करके ऐसा किया होता या ऐसा न करके वैसा किया होता तो वह भी आज बहुत सफल और खुशहाल व्यक्तियों की जमात में शामिल होता।

जीवन ऐसे ही निराशाभाव से घिरे घिरे रह कर कट रहा था पर एक दिन चमत्कार हो गया। सोकर उठने पर उसने अपने आप को एक अंजान जगह पर पाया। उसके सामने एक मशीन रखी थी। जैसे ही वह उठ कर मशीन के पास गया, उसे सुनायी दिया।

वत्स यह टाइम मशीन है इसकी सहायता से तुम भूत और भविष्य दोनों में जा सकते हो।

अंधा क्या चाहे दो आँखे। उसे तो अपने कानों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। जिस बात को वह कबसे करना चाहता था उसे करने की सुविधा खुद उसके पास चल कर आयी थी।

उसने भूतकाल वाला बटन दबाया तो स्क्रीन पर लिखा आया, “तुम चाहो तो भूतकाल में जाकर अपने जीवन में उठाये उन कदमों को मनमाफिक सुधार सकते हो जिन्हे तुम आज गलत कदम समझते हो

रोमांच से काँपता हुआ वह आँखे बंद करके मशीन के पास बैठ गया। उसके अब तक जीवन में बीते क्षणों और बीती घटनाओं की यादें उसके सामने से गुजरने लगीं।

कुछ देर बाद उसने आँखे खोलीं पर जाने उसे क्या हुआ उसके हाथ मशीन को छूने के लिये उठे ही नहीं। पहली बार उसे अहसास हुआ कि उसने जैसी भी जी एक घटनाप्रधान जिन्दगी जी जो कि औरों से अलग थी। अगर वह पीछे जाकर कुछ कदम बदल देता है तो वह यही आदमी नहीं होगा जो कि वह अब है। तब वह कोई दूसरा ही आदमी होगा। अगर उसमें इतनी ही खराबियाँ होतीं तो प्रकृति उसे अब तक जिन्दा ही क्यों रखती?

भूत का बोझ हटते ही वह चंचल हो उठा और उसने सोचा कि क्यों न भविष्य में जाकर देखा जाये। पर भविष्य में प्रक्षेपित होने से पहले उसने मशीन पर भविष्य का समय देखने की सुविधा में सौ साल बाद का समय देखने का विकल्प दबा दिया।

स्क्रीन पर दिखते माहौल में उसे सब कुछ अलग सा लगा। लोग और किस्म के लगे। सौ साल बाद जीने वाले लोगों के बीच उसने अपने को चुके हुये जमाने का आदमी पाया। आज का कोई भी परिचित, मित्र, रिश्तेदार या घर के लोगों में से कोई भी उसके साथ नहीं होगा ऐसा खयाल आते ही उसे लगा कि वह निपट अकेला पड़ जायेगा नये जमाने में।

पहली बार उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसका अपने समय के संसार से एक विशिष्ट सम्बंध है और वह अपने युग का प्रतिनिधि है। उसे केवल अभी इसी समय धरा पर जीवित होना था। न पहले न बाद में।

उसने खुशी खुशी टाइम मशीन को त्याग दिया।

वह निद्रा से जागा। अंदर और बाहर दोनों तरफ एक जाग्रति आ गयी। जीवन के प्रति उसकी धारणा ही बदल गयी।

पहली बार उसे “भूतो न भविष्यति” का अर्थ समझ में आया।

पहली बार उसने अपने आप को स्वीकार किया।

पहली बार उसने अपने अंदर आनन्द की झलक देखी।

…[राकेश]

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