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सितम्बर 17, 2016

एक अभिनेता की डायरी का पन्ना

तकरीबन  19 बरस की उम्र रही होगी जब मेरी शादी 17 बरस की मेहरुन्निमा के संग हुयी| आजादी के पूर्व के भारत में बड़े होते हुए मैं ब्रितानी संस्कृति से बहुत प्रभावित हो चला था| मैंने बढ़िया तरीके से अंग्रेजी बोलने में पारंगत हासिल कर ली थी, मैंने अंग्रेजी स्टाइल में नफीस सूट पहनने का शौक पाल लिया था, मैंने अंग्रेजों के आकर्षक तौर-तरीके कायदे से समझ कर जीवन में उतार लिए थे| लेकिन मेहरुन्निमा मुझसे एकदम उलट थी – वह एक बिल्कुल घरेलू किस्म की महिला थी| मेरी तमाम सलाहें और चेतावनियाँ उस पर बेअसर रहीं और उसकी मूलभूत प्रकृति में कोई सुधार न आया| वह एक आज्ञाकारी पत्नी थी, बच्चों से स्नेह करने वाली एक बहुत अच्छी माँ थी, और कुल मिलाकर कुशल गृहणी थी| लेकिन मैं तो ऐसी पत्नी नहीं चाहता था|

जितना ही मैं उसे बदलने का प्रयास करता उतनी ही दूरी हम दोनों के मध्य बढ़ती जाती| धीरे धीरे एक खुशनुमा लड़की से वह आत्मविश्वास से रहित खामोश स्त्री में परिवर्तित हो गई| इस बीच मैं अपने साथ काम करने वाली एक अभिनेत्री के प्रति आकर्षित हो गया| वह बिल्कुल वैसी थी जैसी स्त्री को मैं अपनी पत्नी के रूप में देखना चाहता था| विवाह के दस साल बाद मैंने मेहरुन्निमा को तलाक दे दिया और उसे, अपने बच्चों और अपने घर को छोड़कर मैंने अपनी अभिनेत्री साथी के संग शादी कर ली| मेहरुन्निमा और अपने बच्चों की आर्थिक सुरक्षा का इंतजाम मैंने कर दिया था|

6-7 महीनों तक सब सही चला| उसके बाद मुझे एहसास होने लगा कि मेरी दूसरी पत्नी में न तो देखभाल कर सकने की क्षमता थी न ही उसे अपने से इतर किसी से स्नेह था| उसे केवल अपनी खूबसूरती, महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों से मतलब था| कभी कभी मुझे मेहरुन्निमा के लगाव भरे स्पर्श और सदा मेरी और बच्चों की भलाई के लिए उसका प्रयासरत रहना याद आता था| 

जीवन आगे बढ़ता गया| मैं और मेरी दूसरी पत्नी एक मकान में रह रहे थे जहां न जीवंत इंसानों का कोई वजूद था और न ही घर होने का कोई लक्षण| मैंने जीवन में पीछे मुड कर देखा भी नहीं कि मेहरुन्निमा और बच्चे किस हाल में रह रहे थे?


दूसरे विवाह के तकरीबन 6-7 सालों के बाद अचानक एक दिन मैंने एक लेख पढ़ा जो किसी जो कि एक प्रसिद्धि पाती हुयी महिला शैफ के बारे में था, जिसने हाल ही में अपनी व्यंजन विधियों पर किताब लिखी थी| जैसे ही मेरी निगाह, आकर्षक, खूबसूरत, आत्मा विश्वास से लबरेज और गरिमामयी दिखाई देती लेखिका के  फोटो पर पड़ी, मैं स्तब्ध रह गया| मुझे बहुत बड़ा झटका लगा| यह तो मेहरुन्निमा थी! लेकिन यह प्रसिद्द शैफ कैसे मेहरुन्निमा हो सकती थी?

बहरहाल उसके बारे में पता लगाने से मुझे मालूम हुआ कि उसने न केवल दुबारा विवाह कर लिया था बल्कि अपना नाम भी बदल लिया था|

मैं उस वक्त विदेश में फिल्म की शूटिंग में व्यस्त था| मेहरुन्निमा अमेरिका में रहने लगी थी| मैंने अमेरिका जाने के लिए फ्लाईट पकड़ी और मेहरुन्निमा के निवास स्थान आदि का विवरण जुटाकर उससे मिलने उसके घर पहुँच गया| मेहरुन्निमा ने मुझसे मिलने से इंकार कर दिया| मेरे बच्चों, मेरी बेटी 14 साल की हो चुकी थी, और बेटा 12 का, ने मेहरुन्निमा से कहा कि वे एक अंतिम बार मुझसे मिलना और बात करना चाहते हैं|मेहरुन्निमा का वर्त्तमान पति उनकी बगल में बैठा था, वही अब मेरे बच्चों का कानूनी रूप से पिता था|

आज तक भी मैं वह सब नहीं भुला पाता जो मेरे बच्चों ने मुझसे कहा!


उन्होंने कहा – कि उनके नये पिता को सच्चे प्रेम का अर्थ पता है| उसने मेहरुन्निमा को उसके प्राकृतिक रूप में स्वीकार किया और कभी भी उसे अपने जैसा या उसके मूल स्वभाव से अलग स्वभाव का इंसान बनाने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि उसने स्वंय से ज्यादा मेहरुन्निमा से प्रेम किया|  उसने मेहरुन्निमा को सहजता से और उसके अपने तरीके से उसकी अपनी गति से निखरने, खिलने और संवरने का भरपूर मौक़ा दिया और कभी भी उस पर अपनी इच्छा नहीं लादी| उसने मेहरुन्निमा को बिल्कुल उसी रूप में स्वीकार किया और उसे सम्मान दिया जैसी की वह थी| अपने दूसरे पति के निश्छल प्रेम, स्वीकार और बढ़ावा देने से मेहरुन्निमा एक गरीमामयी, स्नेहमयी और भरपूर आत्मविश्वास से भरी हुयी स्त्री के रूप में खिल गई थी|


जबकि मेरे साथ रहने के दौर में मेरे दवारा उस पर अपनी इच्छाएं लादने से, उसके प्राकृतिक स्वभाव और विकास पर हमेशा उंगली उठाने से और मेरी स्वहित देखने की प्रवृत्ति के कारण वह बुझ गई थी और इस सबके बावजूद भी मैंने ही उसे छोड़ दिया था|
शायद मैंने उसे कभी प्रेम किया ही नहीं, मैं तो स्वयं से ही प्रेम करता रहा|

अपने ही प्रेम में घिरे लोग दूसरों से कभी प्रेम नहीं कर पाते!


(अभिनय से जीवन जीता एक अभिनेता) 

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अगस्त 6, 2013

हिरोशिमा-नागासाकी में ट्रूमन का खेल

बहुत बड़ी गलती नहीं की क्या

प्रकृति ने ?

Hiroshima

इंसान तो बनाया ही बनाया

साथ उसे  प्रदान कर दी,

जरुरत से ज्यादा

सोचने और समझने की शक्ति!

प्रकृति बसाती जाती है

इंसान उजाड़ता जाता है,

विध्वंस का प्रयोग करता है

एक इंसान दूसरे इंसान के विरुद्ध

पेड़-पौधे और जानवर तो

अणु बम बनाते नहीं

ये सब कारनामें तो इंसान के ही हैं|

आइंस्टाइन की वैज्ञानिक मेधा का दुरुपयोग करके

जब ट्रूमन ने हिरोशिमा और नागासाकी

में विनाश फैलाने की योजना बनाई

तब उसे पता तो था

कि जापान आत्मसमर्पण के लिए तैयार था

फिर क्यों इतना बड़ा विध्वंस रचा उसने?

क्या उसके दिमाग पर शैतान ने कब्जा कर लिया था?

या उसे बाकी देशों को अपनी शक्ति दिखानी थी?

कारण जो भी रहा हो उसके बोये बीजों से

उपजी फसल धरती पर जीवन को

हमेशा के लिए संक्रमित कर गई है|

जिनके पास अपने नागरिकों को खिलाने के

लिए भोजन तक नहीं है ऐसे

देश भी एटम बम थैले में लिए घूम रहे हैं|

आत्मघाती तो इंसान सदा से ही रहा है-

वरना वह धरती पर प्रकृति की देन का ऐसा नाश न करता रहता-

ट्रूमन के कदम ने

उसे पूरी धरती को नष्ट करने का औजार देकर

भस्मासुर भी बना दिया|

देर-सबेर कोई न कोई

सनकी राजनीतिज्ञ

इस धरती को लील कर ही

अंतिम  शान्ति को प्राप्त होगा|

जून 7, 2013

कार्तिक साहनी चले स्टैनफोर्ड : आई.आई.टी संस्थानों की दृष्टिहीनता

डी.पी.एस, आर.के.पुरम स्कूल में 12वीं कक्षा के 18 साल Kartik

के छात्र – कार्तिक साहनी, ने CBSE बोर्ड की 12वीं की

परीक्षा 95.8 % अंकों के साथ उत्तीर्ण की है|

इसमें खास क्या है, बहुत सारे अन्य छात्रों ने

भी इतने या इससे ज्यादा अंक प्राप्त किये होंगे|

खास दो बाते हैं :-

कार्तिक नेत्रहीन हैं और

– उन्होंने इतने अंक विज्ञान विषय लेकर प्राप्त किये हैं|

इतना बड़ा किला फ़तेह करने के बाद कार्तिक अमेरिका जा रहे हैं| क्यों?

उन्हें Stanford University में दाखिला मिल गया है पूरी छात्रवृत्ति के साथ|

यहाँ तक भी ठीक, आखिरकार अमेरिका को लाख कोसने के बाद भी इस बात को झुठलाना आसान कम नहीं कि वहाँ के शिक्षा संस्थानों में गजब की क्षमता, उदारता, मानवता और दूरदृष्टि है दुनिया भर के श्रेष्ठ दिमागों को अपने यहाँ आकर्षित करने की उन्हें अपने यहाँ पढाने की और ये ही वे दिमाग रहे हैं जिन्होने अमेरिका की उन्नति में दशकों से भागीदारी की है|

अब हिन्दुस्तान का हाल देखिये| पहले तो कार्तिक को सी.बी.एस.ई बोर्ड में विज्ञान विषयों में दाखिला लेने के लिए हजार किस्म की समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि ने केवल भारतीय बल्कि भारतीय संस्थान  भी लकीर के फ़कीर बन चुके हैं और खुली दृष्टि की संभावना यहाँ लगभग मृतप्रायः है| यहाँ कोई भी कर्मचारी सन 1860 में बने किसी घटिया से क़ानून का पीला जर्द पड़ा कागज़ का टुकड़ा लेकर खड़ा हो जाएगा और उस फटीचर कागज़ के बल पर आवेदनकर्ता को बाहर भगाकर मेज पर पैर रखकर या तो सो जाएगा या अपने जैसे ही किसी मूढ़ मगज साथी के साथ क्रिकेट, शेयर बाजार, या आर्तों के बेचने वाले बाजार आदि की चर्चा में मशगूल हो जाएगा|

12वीं पास करके गणित और विज्ञान के  ज्यादातर छात्रों का सपना होता है आई.आई.टी संस्थानों में  अपने मनपसंद इंजीनियरिंग क्षेत्र में दाखिला लेना| पर महामहिम आई.आई.टी कैसे किसी नेत्रहीन छात्र को अपने यहाँ घुसने दे सकते हैं?

उनकी शान में गुस्ताखी हो जायेगी कि उनके दुनिया भर में प्रसिद्द प्रोफेसर्स के चेहरे उस समय अगर छात्र ने देख पाए जब वे क्लास में पढ़ा रहे होते हैं?

पूरी तरह से सरकारी पैसे पर निर्भर आई.आई. टी संस्थानों के गुरुर पर शोध हो सकते हैं कि इतने हवाई संस्थान इतने घमंड का सहारा लेकर ज़िंदा कैसे हैं| इन्हें चलाने का पैसा आ कहाँ से रहा है| हिन्दुस्तानी टैक्स देने वालों से ही न!

दुनिया के श्रेष्ठ सौ संस्थानों में इनका नाम तक नहीं होता पर इनका व्यवहार ऐसा रहता है जैसे हावर्ड, ऑक्सफोर्ड, स्टैनफोर्ड, और एम्.आई.टी आदि तो इनके सामने दूध पीते बच्चे हैं| हालत यह है कि अगर खोज की जाए कि कब किसी आई.आई.टी ने विज्ञान की प्रतिष्ठित नेचर जर्नल में कोई शोध पत्र छापा था तो इनके निदेशकों और प्रोफेसरों को सर्दी में पसीने छूट जायें|

बहरहाल कार्तिक देश में रहकर आई.आई.टी में पढ़ना चाहते थे पर दृष्टिहीन आई.आई.टी ने अपने दरवाजे खोलना तो दूर उन्हें अंदर आने के लिए आवेदन तक न करने दिया|

यह भी तय है कि आई.आई.टी में पढकर शायद कार्तिक और उनके माता-पिता को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता पर अमेरिका के गैर मुल्क होने और भारत से बहुत दूर होने के बावजूद कार्तिक को तमाम सुविधाएँ मिलेंगी स्टैनफोर्ड में जो उन्हें मिलनी चाहिए|

ताज्जुब तो यह है कि न तो आई.आई.टी, न ही मानव संसाधन मंत्रालय, न ही देश के बुद्धिजीवी वर्ग और उन माफिया किस्म के भारी भरकम व्यक्ति, का जो हिन्दुस्तान में उच्च शिक्षा के क्षेत्र को नियंत्रित करते हैं, एक भी हरकत करते दिखाई देते इस खबर पर| लानत ही भेजी जा सकती है ऐसी जड़ मानसिकता पर|

पूर्व राष्ट्रपति ड़ा अब्दुल कलाम आजाद ने कार्तिक से एकदम सही कहा था,

“What is required is a vision and not vision”.

जब तक चल रहा है दृष्टिहीन आई.आई.टी संस्थानों की स्तुति चलती रहे!

मई 6, 2011

मौन के एक क्षण की गुज़ारिश है

एक्टिविस्ट कवि Emmanuel Ortiz की प्रसिद्ध कविता Moment of Silence [A Moment of silence, Before I start this poem] का हिंदी अनुवाद

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुँ
मैं अपने साथ ले चलना चाहता हूँ तुमको
मौन के क्षण में,
उन सब लोगों के सम्मान में
जो मारे गये वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में
और पेंटागन में
पिछले सितम्बर की 11 तारीख को।
मैं गुज़ारिश करता हूँ तुमसे
मौन के क्षण
उन सबको अर्पित करने के लिये,
जिन्हे शोषित किया गया,
कैद में रखा गया,
जो गायब कर दिये गये
जो प्रताड़ित किये गये
जिनका बलात्कार किया गया
जिन्हे मार डाला गया
उस एक घटना के बदले के रुप में,
उन सब लोगों के लिये जो शिकार बने
अफ़गानिस्तान और अमेरिका में।

और अगर मैं जोड़ पाऊँ…

एक पूरा दिन मौन भरा!
उन हजारों फिलिस्तिनियों के लिये
जो मारे जा रहे हैं सालों से
अमेरिका के समर्थन से
इज़रायल के हाथों।
छह महीने मौन भरे!
उन पंद्रह लाख इराकियों के लिये,
जिनमें बच्चे सबसे ज्यादा शामिल थे,
जो कि मारे गये हैं
कुपोषण और भूखमरी से
क्योंकि ग्यारह साल से
अमेरिका ने उनके देश पर
व्यवसायिक एवम व्यापारिक प्रतिबंध
थोप रखे हैं।

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुं।
दो महीने मौन भरे उन काले लोगों के लिये
जिनके जीवन नरक बने रंगभेद करने वाले द. अफ्रीका में,
जहाँ देश की सुरक्षा के नाम पर उन्हे अपने ही देश में
अजनबी बना दिया गया।
नौ महीनों का मौन हिरोशिमा-नागासाकी में मरने वाले लोगों की स्मृति में,
वहाँ मौत ऐसे बरपी कि उसने कंक्रीट, स्टील, धरती और आदमी की खाल की हर परत उधेड़ डाली
और बचने वाले भी जिये नहीं।
एक मौन भरा साल वियतनाम के उन लाखों लोगों के लिये,
जिन पर युद्ध थोपा गया,
जिन्हे आदत हो गयी अपने करीबियों के शव जलने की दुर्गंध सहने की
जिनके बच्चे इस दुर्गंध को सूँघकर ही बड़े हुये।
एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस में मरने वालों के लिये
जो कि एक गुप्त युद्ध का शिकार बने….
श्श्श्श…कुछ मत कहो…
हमें उन्हे नहीं बताना चाहिये कि वे मृत लोग हैं।
दो महीने मौन भरे कोलम्बिया में मारे गये लोगों के लिये
जिनके नाम, उनके शवों के ढ़ेर की तरह,
बढ़ते चले गये हैं और
हमारी ज़ुबान से फिसलते चले गये हैं।

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुं।
एक मौन भरा घंटा एल-सल्वाडोर के लिये…
एक मौन भरी शाम निकारागुआ के लिये…
दो दिन मौन भरे ग्याटेमाल्टेकोस के लिये…
इनमें से किसी के भी नागरिकों ने
शांति के क्षण नहीं देखे जीते जी।
45 सेकेण्ड का मौन आक्टियल,चियापास में मरने वालों के लिये
25 साल का मौन उन करोड़ों अफ्रीकन लोगों के लिये
जिन्हे समुद्र में इतनी गहराई पर कब्रें मिलीं
जितनी ऊँचाई तक कोई इमारत आकाश को नहीं भेद सकती,
कोई डीएनए टैस्ट या दंत परीक्षा नहीं की जायेगी उनके अवशेषों की।
और उन लोगों के लिये
जो लटकाये और झुलाये गये
ऊँचे साइकोमोर पेड़ों से,
दक्षिण में, उत्तर में, पूर्व में और पश्चिम में…

सौ सालों का मौन…
उन करोड़ों मूल निवासियों के लिये
जिनकी जमीन और ज़िंदगियाँ छीन ली गयीं
पाइन रिज, वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फालेन टिम्बर्स, और ट्रेल ऑफ टियर्स, जैसी शातिर योजनाओं के द्वारा
अब तो ये सब स्मृतियाँ हमारी सर्द हो चुकी
संवेदनाओं और चेतना को छू भी नहीं पातीं।

तो तुम्हे एक क्षण चाहिये मौन भरा?
और हमसे कुछ कहते नहीं बनता
हमारी ज़ुबानें लटक रही हैं हमारे मुँह से
हमारी आँखें कर दी गयीं हैं बंद
मौन भरा एक क्षण
और सब कवि मार दिये गये हैं
ड्रम तोड़ कर धूल-धूसरित कर दिये गये हैं।

इससे पहले कि मैं कविता शुरु करुं।
तुम्हे चाहिये मौन भरा क्षण
तुम शोक कर रहे हो
कि अब संसार पहले जैसा नहीं रहेगा
और हम सब भी आशा करते हैं कि
यह पहले जैसा नहीं रहेगा,
जैसा पहले था वैसा तो
बिल्कुल ही नहीं रहेगा।

क्योंकि यह 9/11 की कविता नहीं है
यह 9/10 की कविता है
यह 9/9 की कविता है
यह 9/7 की कविता है
यह 1492 को समर्पित कविता है।

यह कविता उस स्थिति के बारे में है
जो ऐसी कवितायें लिखने के लिये कारण बनती है
और अगर यह 9/11 की कविता है, तब:
यह चिली में 1971 के 11 सितम्बर की कविता है
यह द. अफ्रीका में 1977 के 12 सितम्बर की कविता है
जब स्टीवन बिको मारा गया था।
यह न्यूयॉर्क के आटिका जेल में 13 सितम्बर को मरने वाले ब्रदर्स की कविता है
यह सोमालिया के लिये 14 सितम्बर 1992 की कविता है
यह कविता है हर उस तारीख के लिये
जो राख बना दी गयी
यह कविता है उन 110 कहानियों को समर्पित
जो कभी बतायी नहीं गयीं
वो 110 कहानियाँ जिन्हे टैक्स्ट बुक्स में जगह नहीं मिली
वो 110 कहानियां जिन्हे CNN, BBC, The New York Times, और Newsweek ने नज़रअंदाज़ कर दिया।
यह कविता उस सुनियोजित साजिश को बाधित करने के लिये है।

और तुम्हे अभी भी अपने करीबी की मौत के लिये मौन भरा क्षण चाहिये?
हम तुम्हे दे सकते हैं
जीवन भर का खालीपन:
गुमनाम कब्रें,
लुप्त हो चुकी भाषायें,
जड़ से उखाड़ दिये गये पेड़ और इतिहास,
गुमनाम बच्चों के चेहरों पर मुर्दा भाव,
इससे पहले कि मैं यह कविता शुरु करुँ
हम खामोश करा दिये जा सकते हैं हमेशा के लिये
और भूखे छोड़ दिये जा सकते हैं
ताकि समय खुद ही मार डाले हमें
और तुम अभी भी पूछते हो
हमसे खामोश रहने के लिये।

अगर तुम्हे मौन का एक क्षण चाहिये
तब बंद कर दो तेल का उत्सर्जन
बंद कर दो मशीनें और टेलीविजन
डूबा डालो युद्धपोत
स्टॉक मार्केट को नष्ट कर दो
चर्चों से और हर जगह से
संदेशों को हटा दो
ट्रेनों, और ट्रामों को हटा दो।

अगर तुम्हे एक मौन भरा क्षण चाहिये
तो टैको बैल की खिड़की ईँट से बंद कर दो
और कर्मचारियों को भुगतान करो उनकी हानि के लिये
बंद कर दो शराब की दुकानें
उखाड़ डालो
टाऊनहाऊसेज़, व्हाइट हाऊसेज़, जेलघर, पेंटहाऊसेज़ और प्लेब्वॉयज़।

अगर तुम्हे एक मौन भरा क्षण चाहिये
तो इसे ग्रहण करो
सुपर बाऊल वाले संडे के दिन,
4 जुलाई को,
Dayton की तेरह घंटों की सेल के अवसर पर,
और उस दिन जब तुम्हारे गोरे अंहकार को ग्लानि महसूस हो
मेरी कौम के काले खूबसूरत लोगों की भीड़ को देखकर।

अगर तुम्हे एक मौन भरा क्षण चाहिये
तब इसे अभी ले लो
इससे पहले कि यह कविता शुरु हो।
यहाँ मेरी आवाज़ की गूँज में
कदमताल करते जवानों के दो हाथ उठने के बीच के समय में
आलिंगनबद्ध दो शरीरों के मध्य की दूरी में,
यहाँ तुम्हारे लिये मौन है,
इसे ले लो
पर इसे इसकी सम्पूर्णता में ही लेना
इसकी श्रंखला काट कर नहीं।
अपने मौन को अपराध के शुरुआती चरण से जोड़ दो।
लेकिन हम,
आज की रात भी हम अपने मारे गये लोगों के लिये
गाने के अधिकार को बनाये रखेंगे।

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