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जुलाई 20, 2017

हमारी गाए – मोहम्मद इस्माइल

फ़रवरी 13, 2017

कैसे मुसलमां हो भाई…

मई 31, 2010

हफीज मेरठी : तीन मोती शायर की विरासत से

कुछ लोग शायद परिचित न हों उर्दू के शायर मरहूम हफीज मेरठी और उनकी शायरी से। मेरठ के रहने वाले हफीज साब ने जिन्दगी से जुड़ी हुयी शायरी की। उनकी शायरी को केवल समय बिताने का ख्याल लिये हुये नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि उनके शब्द पढ़ने वाले को अन्दर तक झकझोरते हैं। उनके शब्द पढ़ने वाले की नींद को तोड़ते हैं। अगर व्यक्ति किसी भी किस्म की खुमारी से घिरा हुआ अपना समय व्यतीत कर रहा है तो मरहूम शायर के शब्द उसकी खुमारी तोड़ कर उसे धरती पर जीते आदमी की जिन्दगी की असलियत से वाकिफ करा देते हैं।

जो लोग कभी भी उनकी शायरी से रुबरु नहीं हुये हैं ऐसे लोगों के लिये हफीज साब द्वारा अपने पीछे छोड़े गये शायरी के अनमोल खजाने से तीन रत्न यहाँ पेश किये जा रहे हैं।

दुआऐं तुमको न दूँगा ऐशो इशरत की,
कि जिन्दगी को जरुरत है सख्त मेहनत की।

बस यही दौड़ है इस दौर के इंसानों की,
तेरी दीवार से ऊँची मेरी दीवार बने

कहीं चमन में नई पौध को जगह न मिले
यह सोच असल में अहसासे कमतरी की है

मई 29, 2010

गज़ल क्या है

सुबह के इन घंटों को गुरुदेव चौपाल काल कहा करते हैं। इन्ही घंटों में उनके तमाम शिष्य गण उनके दर्शन कर अपनी जो भी शंकाऐं होते हैं उनके सामने रखते हैं और गुरुदेव अपनी सामर्थ्य भर उनका निवारण करने की कोशिश करते हैं।

आज भी रोजाना उनके दरबार में हाजिरी लगाने वाला एक शिष्य वहाँ पहुंच गया।

गुरुदेव चाय पी रहे थे। आँखें उनकी बंद थीं और वे चाय की चुस्कियों के बीच संतूर वादन का आनंद ले रहे थे। शिष्य चुपचाप बैठ गया। यह तो स्पष्ट था कि उसे कुछ पूछने की जल्दी थी पर वह अपनी बैचेनी पर काबू पाने में सफल रहा। कुछ मिनटों बाद ट्रैक खत्म हुआ तो गुरुदेव ने आँखें खोलीं।

शिष्य ने लपक कर क्षण पकड़ लिये और अपना प्रश्न दाग दिया,” गुरुदेव एक बात बताइये, ये गज़ल क्या है। जिसे देखो गज़ल की बात करता दिखायी देता है“।

प्रिय मित्र, गजल को जानने के लिये कुछ शब्दों का जानना जरुरी है। शे’र नाम से तो तुम परिचित हो ही। चलों यूँ कर लेते हैं कि तुम थोड़ा गृहकार्य ले लो। हफ्ता दस दिन लग कर कुछ शब्दों को अंदर से बाहर तक पूरा निचोड़ कर पी जाओ। इन शब्दों को नोट कर लो”।
अशआर“, “मतला“, “मकता“, “बहर“, “काफिया” और “रदीफ

गुरुदेव मुझे नहीं लगता कि लोग इन बारीकियों  को समझते हैं। वे तो किसी भी गीत को गज़ल की श्रेणी में रख देते हैं“।

मित्रवर अपनी मेहनत के पसीने का एक कतरा बहाये बिना सभी कुछ जान लेने का प्रयत्न न करो। जल्दी क्या है। इन शब्दों को ढ़ंग से जानो तो पहले और उनका गज़ल से सम्बंध जानो पहचानो “। इस मुद्दे पर शास्त्रार्थ तो बाद में हो ही जायेगा और लोगों के सामने“।

ठीक है गुरुदेव मैं इन शब्दों को घोटता हूँ जम कर। पर यह तो बता दीजिये कि क्या गज़ल सिर्फ और सिर्फ उर्दू में बनती है “?

नहीं मित्र, ऐसा भ्रम जरुर फैला हुआ है लोगों में। गज़ल तो एक विद्या है और इसे किसी भी भाषा में गढ़ा और कहा जा सकता है“।

एक बात और बता दूँ कि अभी हमने जिन तकनीकी बातों का जिक्र किया, समय के साथ हरेक विद्या में परिवर्तन आते हैं और लोग ऐसी गज़लें भी कहते रहे हैं जो इन तकनीकी व्याकरणों की हदों से बाहर निकल कर कुलाँचें मारती दिखायी देती हैं“।

और अंत में एक बात कि तकनीक का जानना ही जरुरी नहीं है गज़ल कहने के लिये, उसे गढ़ने के लिये|  उसमें अपने समझे हुये का सत्य नहीं होगा, और उसकी बुनियाद दिल की गहराइयों से आती भावनाओं के मिश्रण से नहीं बनी होगी तो मामला जमेगा नहीं | और यह बात सारे काव्यशास्त्र पर लागू होती है“।

शिष्य को उत्सुकता से अपनी ओर देखता पाकर गुरुदेव बोले,” चलो तुम्हे दो गज़ब की चीजें सुनाते हैं। छोटी हैं पर अर्थ गहरे लिये हुये हैं“।

इश्क को दिल में जगह दे नासिख,
इल्म से शायरी नहीं आती
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अब दूसरा सुनो


जिस्म की चोट से तो आँख सजल होती है,
रुह जब ग़म से कराहे तो गज़ल होती है
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