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सितम्बर 2, 2011

वह जीवन भी क्या जीवन है

वह जीवन भी क्या जीवन है
जो कि कहीं असमर्थ नहीं है।

मेरा ही प्रतिबंधित, आना
मुझ पर ही आरोप लगाना
चाहत गर जो तुझ तक लाये
प्रश्नों की ही खाट बिछाना

ऐसे प्रश्नों के क्या उत्तर
जिनका कोई अर्थ नहीं है

प्रीत कहीं कैदी हो जाये
सच भी जब बंदी हो जाये
केवल गैरों के कहने से
वैदेही गंदी हो जाये

चाह रहा हूँ पूछूँ तुमसे
बोलो मीत! अनर्थ नहीं है

मुझे प्रीत थी, नहीं वासना
जन्म-जन्म की थी उपासना
माना जग ने प्यार किया है
मैंने तो की एक साधना

तुम्ही नहीं पहचान सके जब
क्या यह परिचय व्यर्थ नहीं है!

{कृष्ण बिहारी}

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अप्रैल 17, 2011

सच्ची इबादत

वो आँख ही क्या जिससे निगाह न हो
वो लब ही क्या जिससे आह न हो
वो दिल ही क्या जिससे चाह न हो
वो जिस्म ही क्या जिससे कराह न हो
वो आदमी ही क्या जिससे गुनाह न हो

मुटठी भर माटी की सजा अभी बाकी है!
…….

मस्जिदों में सर झुकाना ही इबादत नहीं है
मंदिरों में जाना ही इबादत नहीं है
जोड़ की दाढ़ियाँ बढ़ाना ही इबादत नहीं है
लंबी चोटियाँ लटकाना ही इबादत नहीं है
छाप-तिलक लगाना ही इबादत नहीं है

अपने भीतर की खोज सच्ची उपासना है शायद!

(रफत आलम)

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