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जून 23, 2011

प्रेमानुभूति

स्त्री हो या पुरुष
प्रेम में होते ही
उन्हे रुबरु होना
पड़ता है
दुख के।

प्रेम दुख
लाता ही लाता है,
गहन प्रेम
गहरा दुख!

प्रेम परिवर्तित करता ही करता है
मानव को
और खुद के सिवा
और दुख भी
मानव में आंतरिक
परिवर्तन लाने
का एक मुख्य औजार है
प्रेम के लिये।

दुख रुपी छैनी-हथौड़े से
प्रेम
मानव मन को एक सुगढ़ रुप
देता है
उसकी साज-सज्जा करता है,
दुख रुपी जल से
उसके अंतर्मन का शोधन करता है।
मानव जीवन के
आरंभ से ही
इतिहास बनता आया हैसभी जानते हैं
समझते हैं
कि
प्रेम
दुख में भी ले जाता है
पर तब भी मानव
प्रेम में होने को उत्सुक
रहता है
क्योंकि
प्रेम
मानव के जीवन में
घटित होने वाली
सर्वोत्तम अनुभूति है।

…[राकेश]

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