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दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

जुलाई 31, 2011

अंत का प्रारंभ (रघुवीर सहाय)

सुप्रसिद्ध कवि स्व. रघुवीर सहाय ने मनुष्य के जीवन की गति और दिशा और जीवन-दर्शन और जीवन के प्रति समझ में आने वाले उतार-चढ़ाव पर बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी।

मधुर यौवन का मधुर अभिशाप मुझको मिल चुका था
फूल मुरझाया छिपा कांटा निकलकर चुभ चुका था
पुण्य की पहचान लेने, तोड़ बंधन वासना के
जब तुम्हारी शरण आ, सार्थक हुआ था जन्म मेरा
क्या समझकर कौन जाने, किया तुमने त्याग मेरा
अधम कहकर क्यों दिया इतना निठुर उपलंभ यह
अंत का प्रारंभ है यह!

जगत मुझको समझ बैठा था अडिग धर्मात्मा क्यों,
पाप यदि मैंने किये थे तो न मुझको ज्ञान था क्यों
आज चिंता ने प्रकृति के मुक्त्त पंखों को पकड़कर
नीड़ में मेरी उमंगों के किया अपना बसेरा
हो गया गृहहीन सहज प्रफुल्ल यौवन प्राण मेरा
खो गया वह हास्य अब अवशेष केवल दंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

है बरसता अनवरत बाहर विदूषित व्यंग्य जग का
और भीतर से उपेक्षा का तुम्हारा भाव झलका
अनगिनत हैं आपदायें कहाँ जाऊँ मैं अकेला
इस विमल मन को लिये जीवन हुआ है भार मेरा
बुझ गये सब दीप गृह के, काल रात्रि गहन बनी है
दीख पड़ता मृत्यु का केवल प्रकाश स्तंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

(रघुवीर सहाय)

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