Posts tagged ‘Udasi’

सितम्बर 4, 2016

किताब का चर्चा … (रमेश गोस्वामी)

मेरी किताब का चरचा
कहीं कहीं पे हुआ
जहाँ उम्मीद थी मुझ को
वहीं वहीं पे हुआ
मेरी उडान भी मंसूब
ना थी चाँद तारों से
तभी तो एहतिराम
सोच की जमी पे हुआ

ना था अलफाज मे
तारीफ का उलझा हुआ चेहरा
मेरे सुखन का अक्स
डूबती नमी पे हुआ
अगर पलट दिया पन्ना
किन्हीं हाथों ने बिन बाँचे
मुझे तो रंज उस पे
तैरती कमी पे हुआ

उदास शाम थी
और जिक्र था उदासी का
मसि का रंग उजागर
मेरी जबीं पे हुआ
मेरी किताब के किरदार
सब मेरे गम हैं
उन से मिलना हुआ जब भी
किसी गमी पे हुआ
(रमेश गोस्वामी)

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जून 4, 2014

प्रेम का वो अदभुत अनुभव

निमंत्रण akhiri-001

…………………..

आओ थोडा प्यार कर लें

चूम लें तुम्हे

आंसुओं से धुली आँखों की

पाक नज़रों में बसी उदासी को

विरह में जलते ह्रदय से उठती भाप

से सूखे पपडाए होंठो को

चूम ले तुम्हारे तपते माथे को

आओ रख दें होंठ अपने

जलते तुम्हारे बदन पे

ख़त्म कर दें खुद को

तुम्हारी तपिश मिटाने में

आओ ना!

… …. …. …. …. ….

प्रणय 

…………………………………………….

 

नीले  नीम अँधेरे उजाले में

आती हो जब दबे पाँव सकुचाई

डरी सहमी हिरनी सी

देखता रह जाता हूँ

तुम्हारे आभूषण जडित रक्तिम बदन को …

जैसे लाल आग  नीली लपटों में घिरी…

तुम्हारे बदन की  लालिमा

जैसे धीरे धीरे

उतरती है मेरी आँखों में…

ये कैसा नशा है?

ये किसका नशा है?

उस मदिरा का जो तुमने पिलाई थी सुराही से

या उस का जो टपक रही है तुम्हारी मद-भरी आँखों से?

 

moonlit-001बहक रहा है सारा आलम चारों ओर

पिरा रहा है बदन कि जैसे टूटना चाहता  हो

उफ़! ये तुम्हारी अंगड़ाई

आकार-प्रकार बदलता तुम्हारा जिस्म

जैसे चुनौती दे रहा हो कि आओ

समेट लो और भींच लो बाँहों में…

बढता ही जाता है शोर साँसों का

अपने आप मेरा बदन

ले  लेता है तुम्हारे बदन को अपने आगोश में

तुम विरोध भी करती हो और

समाती भी जाती हो

मेरे  आगोश में

मदहोश करती जाती है

तुम्हारे बदन की छुअन

दीवाना कर  रही  हैं  तुम्हारी  बाँहें

तुम्हारा  उन्नत  यौवन …

रेशमी  मखमली  बदन …

 

होश  कहाँ   अब  तुम्हे भी …

मैं पढ़ सकता हूँ तुम्हारी आँख के खिंचते डोरे

पता कहाँ चला

कब मेरे होठों ने

बात शुरू कर दी तुम्हारे होठों से

सच मानों

तुम्हारा आज का रूप कुछ और ही है

तोड़ती जाती हो वो बंध जो खुल नहीं पाते

डरी सहमी शर्मीली हिरनी की खाल से

निकल कर सामने आ रही है

कामोन्मत्त  सिंहनी…

जो निगल जाना चाह रही है यूँruhdark-001

समूचा मुझको पिघला के

समो लेना चाह रही मुझ को खुद में

हैरान हूँ मैं

कि कैसे पार कर दी तुमने

उन्मुक्तताओं की सीमाएं सारी

उफ़! ये तुम्हारा शीशे सा पिघलता जिस्म…

और  ये उठता  गिरता साँसों का ज्वार…

इस ज्वार में बह जाने को बेक़रार तुम और मैं…

हो जाते हैं एक …

एक तूफ़ान सा गुज़र जाता है जैसे

होश आता है तूफ़ान के बाद

जो अपने पीछे छोड़ जाता है…

एक डरी सकुचाई हिरनी

लेकिन तृप्त अहसासों से  भरी

मैं आज गवाह हुआ हूँ

हमारे एक सबसे उन्मुक्त देह-संगम का

हिरनी -सिंघनी-हिरनी परिवर्तन का

 

 अभिसार के बाद

………………………………………………………………..

अब जब सब बीत गया है तो मुझे अचरज होता है

न जाने क्या था जो मुझ पे छाया था….

नशा… खुमार…. उन्माद… जूनून…

गर्म अहसास तुम्हारे नर्म जिस्म का

अनावृत जिस्म

विवश करे दे रहा था मुझे

कि खूबसूरती के उदाहरणों को देखूं

या सुखद स्पर्शों का अहसास करूँ

मेरी दुविधाओं को बढ़ातीं

बंद हुयी कभी कभी खुल जाने वाली तुम्हारी आँखें

जो मेरी आँखों में झाँक कर मुझे आमंत्रित करतीं

और फिर मेरा जवाब पा

शर्मीले भावों से भर फिर से मुंद जातीं

सबसे बढ़titan-001कर मुझे मोह रहा था

मेरी ख़ुशी में सुख तलाशता

तुम्हारा समर्पण…

मेरी भावनाओं का ज्वालामुखी तो फटना ही था…

सच है मैंने कुछ किया नहीं था

सारे असर तुम्हारे थे

मैं तो जैसे जी गया था उन लम्हों में

जब तुम्हारे आगोश में सोया था

निश्चिन्त…

निर्द्वंद…

संतुष्ट…

Rajnish sign

 

फ़रवरी 27, 2014

हर सुबह मौत मुझ पे हंसती है

हर शामyadein-001

उदासी भरी आस
दिल के दरवाजे तक

चली आती है यूँ ही
जैसे मौत इक इक कदम कर
और कुछ और करीब आती हो…
चलो आओ तुम अब तो…

के …
अब सहा नहीं  जाता…

इंतज़ार की लंबी रातों का दर्द…

बहुत दुखता है…

बहुत दुखता है…

हर शाम का तेरी यादों को रौशन करना

देहरी तकना…

फिर अँधेरे की चादर भिगोना…

बहुत दुखता है…

देह हर दम जैसे दर्द के बीज बोती है

और अपनी ही फसल के बोझ तले रोती है
आसमां की चादर  हर रोज मुझ पे…

कफ़न होती है …

हर सुबह मौत मुझ पे हंसती है

हर सुबह ज़िन्दगी मुझ को रोती है…

Rajnish sign

जनवरी 11, 2014

तुम हो…तुम रहोगी..

सारी हसरतें सब तमन्नाएँ love story-001

रंगीन उमंगें खो गयीं थी कहीं

तुम नहीं थीं

जब नहीं थी तुम…

तब

कवितायें सो गयीं थी कहीं

दब कुचल कर उदासी के बोझ तले

पलकों पे रखा प्रेम का मोती

पिघल जाता था आंसुओं में…

तुम नहीं थी जब…

बहुत ज़मानों के बाद फिर…

कल याद दिला दिया आकर…

तुमने कि…

है मुझमे कहीं बाकी कुछ

वज़ह मुस्कुराने की मरी नहीं अभी…

सपने फिर जिए जा सकते हैं

तुम थीं नहीं!

तुम हो…

तुम हो

और

तुम रहोगी…

Rajnish sign

दिसम्बर 17, 2013

ज़िंदगी…रूमानी हसरतों का पलना

ज़िन्दगी…Dk-001

कुछ तल्ख़ हकीक़तें

कुछ नर्म खयालात

गर्म रेत पे नंगे पाँव चलने जैसा

बादलों पे तैरना जैसे कभी

रूमानी हसरतों का पलना

परवान चढ़ना

किसी के होने का अहसास

कंधे पे सर रखना

गुलाबी ख्वाब बुनना

उगते डूबते दिन लिखना

चांदनी रात भर तपना

जेठ दुपहरी का गलना

ज़िन्दगी…

मिलना किसी का

ज़िन्दगी…

न रखना खुद को जिंदा

ज़िन्दगी…

ढूंढना ख़ुशी किसी के चेहरे में

रहना डूबे कभी उदासी में

ज़िन्दगी…

आह! ज़िंदगी…

Rajnish sign

जून 1, 2013

थोड़ी और पिला दो भाई

इतना ज्यादा भरा हुआ हूँ

लगता है मैं मरा हुआ हूँ

कोशिश करके धनवन्तरी से

तुम मुझको दिखला दो भाई !

थोड़ी और पिला दो भाई!

अगर इसे मैं पी जाउंगा

शायद मैं कुछ जी जाउंगा

जीवन की अंतिम साँसों को

कुछ तो और जिला दो भाई!

थोड़ी और पिला दो भाई!

खामोशी का टुकड़ा बनकर

एक उदासी बसी है भीतर

सोई हुई झील के जल को

पत्थर मार हिला दो भाई!

थोड़ी और पिला दो भाई!

मांग रहा हूँ मैं आशा से

देह और मन की भाषा से

अमृत की गागर से मुझको

एक तो घूँट पिला दो भाई!

थोड़ी और पिला दो भाई!

मुझे छोड़ जो चला गया है

खुद से ही वह छला गया है

है तो मेरा जानी दुश्मन

पर इक बार मिला दो भाई!

थोड़ी और पिला दो भाई!

{कृष्ण बिहारी}

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