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सितम्बर 26, 2016

अभी कई बातें …(Sándor Weöres)

sandorअभी तो कहने को कई बातें शेष हैं,

घटनाएं जिन्हें हमने जिया,

बातें जो हमने सीखीं,

वस्तुएं जिन्हें हमने देखा,

और मुलाकातें जो कई बार हुईं

और वे जो हुईं सिर्फ एक बार,

हर फूल इंतजार कर कर रहा है अपना जिक्र किये जाने का,

हर मुट्ठी भर धूल इस लायक है कि उस पर ध्यान दिया जाए,

मगर जब इन पर कुछ कहने का मौक़ा आएगा इनमें से सिर्फ एक,

और उस एक के भी कुछ टुकड़े समा पायेंगें कहने में,

जहां तक स्मृतियों का सवाल है मनुष्य करोड़पति होता है,

मगर जब उन्हें कलमबद्ध करने का वक्त्त आता है तो

वह पाता है खुद को कंगाल,

लगभग हर चीज किताब के बाहर छूट जाती है,

और अंदर रह जाते हैं चंद टुकड़े और स्वप्न|

(Sándor Weöres, हंगेरियन कवि)

प्रस्तुति – साभार विनोद शर्मा

 

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जनवरी 6, 2014

यक्ष प्रश्न

यक्ष प्रश्न हैwomanleavingman-001

क्या पागलपन है?

क्यूँ पागलपन है?

यक्ष प्रश्न है…

उत्तर क्या दें?

उत्तर कैसे दें?

उत्तर किसे दें?

अब न तो शब्द बचे हैं

न जुबां रही है

किस भाषा को वो समझेगा?

अब जुबां क्या बदलेगी हमारी?

न उसका दिल बदलेगा…

प्रश्न बहुत हैं …

उत्तर कम हैं

कम क्या ?

कुछ के उत्तर ग़ुम हैं

जाओ दिल पे बोझ न लादो

अपने मन को मत अपराधो

आज से बस तुम इतना जानो

दोष तुम्हारा तनिक नहीं है

अपना दिल तो है ही पागल

उम्र के साथ नहीं चल पाया

अब तक बचपन में जीता है

टूटे चूड़ी के टुकड़ों को

सिरे गला कर फिर सीता है

दुनियादारी नहीं समझता…

तुमसे आगे नहीं देखता

तुम न होती तब भी इसका

हर हाल में होना ये था

पागल था…पागल है

पागल होना था…

सयानों के साए में इसका

दम घुटता है…

Rajnish sign

दिसम्बर 1, 2013

टूट कर भी मुकम्मल रहूंगा

ख्वाब mirrorwoman-001

न चेहरा होता है

न बदन कभी

अगर

बिखरेगा भी तो

कितना बिखरेगा?

मैं  टूटा भी

सौ हिस्सों में गर

हर हिस्सा  मेरा मुकम्मल ही  रहेगा

मैं आइना नहीं

जो टूटा तो

अक्स  बाँटूगा तेरा टुकड़ों में

मेरे हर हिस्से में

तब भी

तुम पूरा का पूरा ही समा  सकोगी

Rajnish sign

नवम्बर 16, 2013

हर प्रीत नूतन है!

पांच बरस लंबी सड़क पर AB-001

पता नहीं सोता सा चला था शायद !

कि,

हर नया दिन,

पुराने का हिस्सा नहीं लगता|

लगता है, सड़क भी बनी है,

टुकड़ों-टुकड़ों में!

कल की याद ही नहीं कुछ-

बस अहसास भर होता है कि

कुछ गुजरा भर था|

मुझे कुछ याद नहीं है-

न परिणय

न चुम्बन

न कलह

जब तुमसे मिलता हूँ,

लगता है फिर कोंपलें फूट आई हैं

फिर नया सवेरा है

और हर बात,

हर प्रीत नूतन है|

Yugalsign1

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