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नवम्बर 29, 2013

अधेड़ ज़िंदगी अब भी हरी है

मेरी शाखों पर बेले लटक चुकीं mantree-001

मेरे तने पर काईयों की परत

सात ऊपर फ़ैली टहनियाँ

और

कगार को धसकती जमीन पर जमी जड़ें

पर

मेरी टहनियाँ अब भी हरी हैं

एकटक आसमान देखती हुई

कौन जाने

कौन सा इसका टुकड़ा हमारा है?

Yugalsign1

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नवम्बर 21, 2013

एक टुकड़ा सच

कल नहीं होंगे विषादvon-001

जब हम-तुम याद करेंगे

कि-

जीवन जितना भी देता है

सहेजने- संजोने को होता है

सखे, पीड़ा का सत्व

सुखकर होगा अवश्य ही|

कल,

जब हम-तुम संधान कर चुकेंगे

कि –

होती है एक छोटी सी मुलाक़ात भी,

सम्पूर्ण

नहीं होता है सब कुछ बेमानी

मौन भी है बोलता कभी-कभी

प्रिये,

अमूल्य हैं पोरों पर अटके ये मोती

कल फिर मिलेंगे हम,

तो जानेंगे कि-

हमने जिया है

एक टुकड़ा सच

साथ-साथ

Yugalsign1

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