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अगस्त 3, 2017

सौंदर्यबोध

 

अपने इस गटापार ची बबुए के

पैरों में शहतीरें बांधकर

चौराहे पर खड़ा कर दो,

फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,

शायद पेट भर जाए :

दुनिया विवशता नहीं

कुतूहल खरीदती है|

 

भूखी बिल्ली की तरह

अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर

हाथ-पैर पटको,

दीवारों से टकराओ,

महज छटपटाते जाओ,

शायद दया मिल जाए:

दुनिया आँसू पसन्द करती है

मगर शोख चेहरों के|

 

अपनी हर मृत्यु को

हरी-भरी क्यारियों में

मरी हुई तितलियों-सा

पंख रंगकर छोड़ दो,

शायद संवेदना मिल जाए :

दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है

मगर इस आश्वासन पर

कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद

हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|

 

आज की दुनिया में

विवशता,

भूख,

मृत्यु,

सब सजाने के बाद ही

पहचानी जा सकती है|

बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

कफ़न और फूलों का

प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|

ओछी नहीं है दुनिया:

मैं फिर कहता हूँ,

महज उसका सौंदर्य-बोध

बढ़ गया है|

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

अगस्त 12, 2011

श्वेत-श्याम के द्वंद

सफ़ेद और काले रँगों में
ज़न्मों ही से बैर है।

इन्द्रधनुष के घटक अवयवों में
सफ़ेद ही की उलट फेर है
कायनात में जो दिख रहा है,
देखा जा रहा श्वेत की बदौलत है।

फूल-बसंत-धूप-तितली
गुलाबी होंठ-कुंदन से बदन,
असीम शांति-पवित्रता-पाकीजगी
हसीन मंज़र–दिलकश नज़ारे
या फिर हों रोती रुतें
सूखे उड़ते पत्ते–पिंजरों के बेबस पंछी
अंतिम सच की यात्रा के लिए कफ़न
आँखों की तमाम जिंदा रौशनी
सब सफ़ेद की ही दौलत हैं।

जबकि काला रँग
सोच, समझ और बुद्धि को
अन्धकार के फेर में डाल देता है
समस्त तामसिक क्रियाएं जन्माता है
मैले ह्रदयों, कलुषित मस्तिष्कों का चहेता
सदा से दुश्मन है मानवता का।

काले रँग ने सदा फैलाई है
मानवबुद्धि पर जहालत की सियाही
जिसमें डूबती है मानवता सारी
युद्ध-रक्तपात-बलवे-गारतगर्दी
आदमी की आदमी पर बरतरी
मुल्कों, कौमों और नस्लों को
गुलामी की जंजीरों में जकड़े देखा है,
लालच की काली चुडैल की कोख से
घूस–घोटालों और बदनीयती को जन्मते देखा है।

चिरकाल से युद्ध जारी है
भलाई और बुराई के बीच
जिसके प्रतीक ये रँग है काले-उजले
गवाह है समय पुस्तक के फड़फड़ाते पन्ने।

रौशन विचारों से इन्कलाब जागता है
दबे–कुचले-पीड़ितों के लश्कर जब उठ खड़े होते हैं
दुम दबा कर अज्ञान का अन्धकार भागता है
तम कितना ही डरावना हो!
ज़ुल्म ओ सितम काली की रात के बाद
उगता है,
उजला सूरज सुहावना हो!

(रफत आलम)

जुलाई 28, 2011

खुदारा पूछना मत कहाँ थे

सपनों के सजीले शहजादों जैसे कहाँ थे
आपने जो समझा था हम वैसे कहाँ थे

खो गए थे अँधेरे में कहीं शाम के बाद
क्या बताएं रात गये तक कैसे कहाँ थे

रेशमी छोड़ सूती साडी भी ना ला सके
अरमान तो था यार मगर पैसे कहाँ थे

वो कागजी डिग्रियां तो किताबें ले आईं
नौकरी की खरीद के लिए पैसे कहाँ थे

फूल, तितली, बादल, बरखा, धनक, बहार
हसीन थे सब मगर आप जैसे कहाँ थे

गम के सौ समंदरों का निचोड़ हैं आँसू
ये पानी के चंद कतरे ऎसे–वैसे कहाँ थे

शाम हुए घर लौटा है राह भूला आलम
खुदारा कोई ये ना पूछना कैसे कहाँ थे

(रफत आलम)

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