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नवम्बर 10, 2013

कितना कुछ ज़िंदा रहता

गाल पे गिर आई लट को तर्ज़नी से लपेटतेguru-001
अपनी आँखों की शफक से मेरी पलकों को झपकाते
पूछा था तुमने,
-बहुत दिनों से तुम्हारा लिखा कुछ पढ़ा नहीं
क्या हुआ?
लिखना बंद कर दिया क्या?
क्यों कर दिया?-
चाहा तो बहुत
कह  दूँ
तुम जो नहीं थी…
तुम मेरी प्रेरणा
तुम मेरी कविताओं की  धुरी
तुम जब गयी थी
तब ले गयी थी न
मेरे शब्द
मेरी कलम
मेरी जुबान
मेरे गर्म अहसास
मेरे जीवन का ताप
मेरी साँसों से अपनी महक
मेरे बदन से अपने बदन के  छुअन की दहक
एक बर्फ सी जमी है तब से मेरे वजूद पे
कौन लिख सकता है ठंडी अकड़ी हुयी उँगलियों से?
पिघला दो मुझे अपने आगोश में लेके
रख दो अपने गर्म होंठ मेरे होंठों पे
बदल दो रंग इन का
नीले पड़े होंठो से कविता नहीं निकलेगी
मेरे हाथों को अपने हाथों में लेके
इन्हें इन के ज़िंदा होने का अहसास लौटा दो
अब तुम हो लेकिन शायद
हम दोनों के बीच इस बर्फ के सिवा कोई और भी है
लेकिन सच ये भी है कि
अगर कह पाता तुमसे कुछ
तो ये बर्फ भी नहीं होती
ये तीसरे का अहसास भी न होता
मेरे होंठ नीले न होते
मेरी उंगलियाँ ज़िंदा होती…
(रजनीश)
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मार्च 16, 2013

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

चाहे यह ज़िंदगी खंगालो

या तुम इसकी रूह निकालो

ठंडी आहें नहीं भरूँगा

सब कुछ चुपचाप सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

मैंने कभी विरोध न माना

हर अनुरोध तुम्हारा माना

मान तुम्हारा रख पाऊं

मैं यह कोशिश दिन रात करूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

दुख से मेरा वैर नहीं है

कोई रिश्ता गैर नहीं हैं

यदि वह मेरा साथ निभाए

तो मैं उसके साथ रहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

बहुत मौत से डरते होंगे

वे जीते-जी मरते होंगे

मैं उनमे से नहीं बंधु !

जो समझौतों की मार सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

तुम भटको तो वापस आना

मन में कोई बात न लाना

दरवाजे पर जब पहुंचोगे

तुम्हे द्वार पर खड़ा मिलूंगा

तब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

{कृष्ण बिहारी}

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