Posts tagged ‘Teer’

नवम्बर 19, 2013

युवा मन बूढ़े क़दम

तीर पर ganga-001

शोर है –

लहरों का

पीछे छूट गये शहरों का

मन के खुलते बंद होते पहरों का!

तीर पर

छोर  है –

आशाओं का

निराशा लाती विलासिताओं का

डगमगाते पदों से भरी प्रत्याशाओं का!

तीर पर

अशांति है-

सुनहरे सपनों की

ठहराव चाहते अपनों की

युवा मन से तालमेल बिठाते बूढ़े क़दमों की!

Yugalsign1

नवम्बर 12, 2013

गंगा@वाराणसी

बहुत मुश्किल हैBenaras

गंगा तीर पर बैठकर

गंगा पर कुछ लिखना !

शरद की सांझ की सिमटी नवयौवना

या कि ग्रीष्म की सुबह की सकुचाती ललना

और या भादों की उफान भरी कामातुरा

घाटों पर आए न आए

मसि-कागद समेत मन को बहाए ले जाती है!

आप छंदों में उसे बाँधने को कहते हैं

या कि कटोरा भर पानी से उसे परखने को

और या मेरी क्षुद्रता से उस असीम को तौलने को

समझ में आए न आए

शुभ्र-कलुष समेत मन को बहाए ले जाती है!

Yugalsign1

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

%d bloggers like this: