Posts tagged ‘Tasveer’

दिसम्बर 21, 2013

बंद हूँ तेरे ही प्राणों के मद में…

मेरे मन ने देह को त्याग दिया हैavishkar-001

और वह

बिस्तरे के सामने

ठीक सामने तस्वीर टांगने वाली

खूंटी पर जा बैठा है |

करवट पड़ी तुम्हारी आँखें

अब भी खुली हैं

जिनमें मेरे मन के ही प्रश्न हैं

सखे, सुन

मेरी देह से मेरे मन का न ले भान

जब तू मुझमें निमग्न हो

छूएगी अपने ही प्रान

तो पायेगी,

मन तो मेरा चिर तेरा कामी

पर देह अभ्यासी दुनियावी अनुगामी

मैं तो जब तुझमें डूबा था,

उस रात्री प्रथम

तब से,

बंद वहीं हूँ,

डूबता, तिरता, उतराता

तेरी ही साँसों की लय में,

तेरे ही प्राणों के मद में!

Yugalsign1

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नवम्बर 24, 2013

शुतुरमुर्ग ही नियति?

चिंतित मन ने तस्वीर उकेरीbrain-001

चेहरा लगने लगा बूढ़ा सा

दोस्त ने कोसा

‘मूर्ख!

दिमाग को

खूंटी पर टांग कर काम कर

अधिक सोचेगा

तो कष्ट होगा ही’

तो क्या यहीं पर पाते हैं,

जीवन के सब प्रश्न विश्राम?

तो क्या अंततः

सारी सोचों का हश्र

होता है बन जाने में

शुतुरमुर्ग !

Yugalsign1

नवम्बर 6, 2013

अब क्यों आओगी तुम?

कुछ थोड़ी सी चीज़ें तुम्हारी

मेरे पास रह गयीं थी

चार पांच तस्वीरें

एक नीली वाली,

एक लाल-काली वाली

एक वो भी जो मुझे बहुत पसंद रही है

वापिस भेज रहा हूँ

विभिन्न भावों वाली

छवियाँ तुम्हारी

जो अलग-अलग जगह

मैंने उतारी थीं

उंन दिनों

जब आँख में तुम छायी रहती थीं|

दिल में तो तुम अब भी अंकित रह जाओगी|

कुछ ख़त भी थे

पीले पड गये थे

इस अरसे में

और उनकी लिखावट से

सब कुछ जा चुका था

हर्फों के माने भी तो वही नहीं रहे

जो तुमने लिखे थे

यहीं बहा दिया उनको|

अब तो जब अदावत का भी ताल्लुक नहीं

तुम्हारी चीजें तुमको वापस कर दूँ

यही अच्छा है

थोडा कुछ और भी है

पर उतारूंगा तो दीवारें नंगी हो जाएँगी

दिल भी सूना हो जाएगा

आना

और अगर चाहो तो वापस ले लेना

लेकिन अब क्यूँ आओगी तुम?

तुम आओगी क्या?

(रजनीश)

सितम्बर 12, 2011

प्रीत मुझे पहचानेगी ही

आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
लाख गलत तुम कहो मुझे पर तुम्हे गलत वो मानेगी ही

ऐसा कोई दिन जीवन में
अब तक तो मेरे ना आया
संग मेरे तस्वीर तुम्हारी
नहीं रही हो बनकर छाया
मैं हर पल बैचेन रहा जब रुह खाक तो छानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

दोषी सरे आम तुम मुझको
जी चाहे अब कहो जहाँ पर
मैं तो लेकिन साँस आखिरी
लूँगा, नाम तुम्हारा लेकर
हर अवगुन भी यहाँ तुम्हारे मेरी प्रीत बखानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

तू मुझमें मैं तुझमे लय तय था
जीवन, जीवन से परिचित था
फिर अब मुझको तुम्ही बताओ
यह संबंध कहाँ अनुचित था
चलो भरम भी टूट गया ये प्रीत मुझे पहचानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

याद आज भी वह आती है
जब घड़ियाँ गिनते थे
ऐसे नहीं, रहेंगे ऐसे –
कड़ियां सपनों में बिनते थे
आधी रात नींद जो टूटी बैर सुबह तक ठानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

{कृष्ण बिहारी}

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