Posts tagged ‘Tarang’

जनवरी 22, 2014

सर्दी के सफ़ेद बादल और रक्तिम लौ

सर्दी में बादल fireplace-001

पुकार लगाते तो हैं

पर बहुधा बिन पानी चले आते हैं

आते हैं

तो हर चीज को सफेदी से ढक देते हैं

चारों ओर ऐसा प्रतीत होता है

जैसे धुंध ने घर कर लिया हो

शामें धुंधला जाती हैं

मेरे कमरे में अंधियारा बढ़ जाता है

मैं गमन कर जाता हूँ

बीते काल में –

मोमबत्ती के हल्के प्रकाश से

भरे कमरे में!

जब आतिशदान में लकडियाँ जलती हैं

तो कभी भी बोल नहीं पाता हूँ

बस खो जाता हूँ

आग की लपटों से बनती बिगड़ती आकृतियों में|

तुम्हारी त्वचा का गोरापन ओढ़ने लगता है

हल्का लाल-गुलाबी रंग

जब तपन की गहन तरंगें

और लालसा घेर लेती है

तुम्हारा खूबसूरत चेहरा

दमकने लगता है ऐसे

जैसे तालाब से कमल खिलकर निकलना शुरू करने लगता है

जिस्मानी  उतार चढ़ाव

चमकने लगते हैं

और एक गर्म एहसास चारों ओर बहने लगता है

और तुम्हे और मुझे अपने पंखों में समेट लेता है

सब कुछ उड़ने लगता है

ऐसे जैसे सब कुछ बादल ही हो गया है

कमरे में निस्तारित होने लगता है

श्वेत धीरे-धीरे लाल में

ऐसा लगने लगता है

हमारे जिस्म पिघल जायेंगे

मोमबत्ती की लौ

मोटी हो और तेजी से जलने लगती है

बादल रक्तिम लाल हो जाते हैं

और मुझे प्रतीत होता है

कि सर्दी के बादल लाल तप्त हो गये हैं

और वास्तव में

वे बिन पानी के ही हैं!

Yugalsign1

दिसम्बर 22, 2013

मेरा ये नशा…

नशाlovers-001

चढ़ता है जब हौले हौले

सब कुछ रंगीन लगता है

मन में तरंग

तन में उमंग

आँखों में सपने

लाल डोरे खिंचते से

रक्त-शिराएँ तनती सी

उष्ण उत्तप्त कल्पनाएँ…

सब कुछ अपना

खुद जहाँपनाह

केवल मैं…

और केवल मैं….

अपने में ग़ुम…

सुबह से शाम

बस…नशा… नशा

और नशा…

नशा और उसका असर…

जब हो तो…

और जब ना हो तो

टूटने लगता है…

ऐंठने लगता है…

ये तन…ये मन…

बिखरने लगता है अपना साम्राज्य

शीशमहल जैसे चूर…

किरच किरच…

चुभता है सब कुछ…

धूप भी…

अँधेरा भी…

जलाता है सब कुछ

तपता दिन भी…

ठंडी रात भी

शराब मगर बेखबर…

कोई जिए

कि कोई मरे…

कोई जले

कि कोई फूंके…

कोई बिखरे

कि कोई तडपे…

बहुत कुछ तोड़ जाता है मगर ..Rajnish sign

दिसम्बर 13, 2013

देखें सूरज को मिलते हुए प्रेयसी रात्रि से

बैठे रहें पास पासsunset1-001

चुपचाप

न हम बोलें ना तुम कुछ,

उठती हुयी तरंगें तुम में

गुज़र जाएँ मुझ में हो कर

बस देखते रहें बेचैन सूरज को

मिलते हुए प्रेयसी रात्रि से,

कितने अधूरे हैं ये उजाले-अँधेरे

एक दूसरे के बगैर

जैसे…हम-तुम…

बस चुपचाप ही समझें इशारे,

 रंग बदलती शाम के

लाल होते आसमान के

घर लौटती चिड़ियों के

झुकती आँखों के

बहकती हुयी साँसों के

दहकते हुए होठों के

कंपकपाती  उंगुलियों के…

बस चुपचाप…

बैठे रहें पास पास

मैं और तुम…

पीते रहें हवा में घुली शराब को

उतर जाए लाल शाम हम में

उतर जाए बुखार साँसों का

बस बैठे रहें सर टिकाये एक दूसरे से

चुपचाप

पास पास  बस बैठे रहें…

Rajnish sign

नवम्बर 27, 2013

रोऊँ या गाऊं…

तुमको पाने की ख़ुशी मनाऊंjohn-001

या ना छू पाने को

अभिशाप कहूँ?

बिलकुल अपने पास बिठा के

अपने आवेग रोकने को अभिशप्त मैं

अनुनाद से कम्पित ह्रदय में

उठती उत्ताल तरंगो को समेटने को

अभिशप्त मैं…

मैं क्या करूँ?

रोऊँ या गाऊं…

तुमको पाने की ख़ुशी मनाऊं?

मुझसे बस कुछ दूरी पर

हाथ बढ़ा तो छू लूँ जैसे

फिर भी कितनी दूर क्षितिज के पार!

सच है यह

बात

लो कह ही दूँ तुमसे ही-

गर्म रेत पे चल के भी

क़तरा क़तरा पिघल के भी

जो

तुम को पा जाऊं तो

ख़ुशी मनाऊं…

Rajnish sign

नवम्बर 13, 2013

कुछ कुछ होता है!

तरंगों के कंपनlovers-001

पोरों के स्पर्श

सुकुमार वक्ष की कोमलता…

श्यामवर्णी चादर ओढ़े सांस

चुनरी की रेशमी ओट

संगीत भरे चित्रालय में

आँखों-आँखों के संवाद में

झुककर पांवों, तलुओं का स्पर्श

बांह को पकड़ कर भींच देना

गोद में रखे पॉपकार्न को टूंगना

कपोलों का चुम्बन

चेहरे पर भावों के इन्द्रधनुष

तुमने कहा…

कुछ कुछ होता है

Yugalsign1

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