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सितम्बर 4, 2016

किताब का चर्चा … (रमेश गोस्वामी)

मेरी किताब का चरचा
कहीं कहीं पे हुआ
जहाँ उम्मीद थी मुझ को
वहीं वहीं पे हुआ
मेरी उडान भी मंसूब
ना थी चाँद तारों से
तभी तो एहतिराम
सोच की जमी पे हुआ

ना था अलफाज मे
तारीफ का उलझा हुआ चेहरा
मेरे सुखन का अक्स
डूबती नमी पे हुआ
अगर पलट दिया पन्ना
किन्हीं हाथों ने बिन बाँचे
मुझे तो रंज उस पे
तैरती कमी पे हुआ

उदास शाम थी
और जिक्र था उदासी का
मसि का रंग उजागर
मेरी जबीं पे हुआ
मेरी किताब के किरदार
सब मेरे गम हैं
उन से मिलना हुआ जब भी
किसी गमी पे हुआ
(रमेश गोस्वामी)

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जनवरी 1, 2015

नए साल की शुभकामनाएँ!

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं!

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएँ!

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

दिसम्बर 5, 2013

मुसकराहट का मंत्र

रात ने फिर से पुकारा manmoon-001

खिड़की पर पड़ा पर्दा हल्के से हिला

तारों की रौशनी में यात्रा करते चन्दा ने

झांका खिड़की से भीतर

“हैलो “!

चन्दा मुसकराया,

मैं नहीं!

फिर गुजरी रात –

और रातें गुजरती रहीं…

आज फिर,

रात ने पुकारा

पर्दे ने ज़रा सा सरककर फिर बनाई जगह

चाँद ने फिर झांका

“हैलो”!

“हैलो, आज भी नहीं मुसकराओगे?

सार्थकता की तलाश की राह में

छाती पर पत्थर रखे,

कब तक चलोगे?

देखो-

मैं विश्व घूम आया

बंद कमरों में झाँक-झाँक कर

मुस्कराहट देने का मंत्र लेकर!”

Yugalsign1

नवम्बर 10, 2013

मजनूँ कहीं के

crescent
कल शाम चाँद देखा

वही,

कालिमा पर

रेखाओं की

सुनहली छटा बिखेरता|

प्याले सा चन्दा

तारों की सोहबत में

बिगड सा गया है

मुसकराता है,

मुझे मुँह चिढ़ाकर

मेरी खिड़की के पार

जब तकिये में सिर घुसा,

फिर सिर उठाकर

मैं देखता हूँ उसे

कहता है,

भंवे

टेढी करके

बाईं आँख दबाकर-

“मजनूँ कहीं के”

Yugalsign1

अक्टूबर 3, 2011

तारों पार कोई रोया

कमरे की दीवारों के
सो जाने के बाद
करवटों से उकताई हुई आंखें
छत को तक रही थीं
यूँ ही जाने क्यों ढ़लके
दो आंसू
जैसे कहते गए
तू ही नहीं दुखी
दूर तारों के पार
कोई तुझको रोता है
सुबह फूलों पर पड़ी शबनम
गवाह थी
दूर तारों के पार
ज़रूर कोई रोया था

(रफत आलम)

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